हवा – लात की याद में ....
हवा की जमाखोरी भी एक दिन जुर्म बन जाएगी, ऐसा कभी सोचा नहीं था |
जुर्म भी वो संगीन कि हवालात की सैर करा देगी ,सपने में आया नहीं था |
काश ये मालुम होता ....?
हम आक्सीजन पैदा करने वालो की मैय्यत में नहीं जाते |
मरहूम आक्सीजन वाले माथुर साहब के इन्तिकाल की खबर मिली |
बेचारे निहायत शर्मिंदगी पसंद इंसान थे |
न किसी के लेने में न देने में, कभी लोचा करते पाए गए |
उनकी बंद होती कर्ज दबी फेक्ट्री को हमने मेनेजर बन के सम्हाल लिया | उन दिनों फेक्ट्री में बने आक्सीजन को दैनिक उपयोग में कोई खरीदता नहीं था | नेचरल हवा पे लोगों का भरोसा जादा था | भूले से कोई ठेले पर आक्सीजन ले लो की गुहार लगाता मिल जाता तो उसे चाय- भजिये खरीदने लायक आमदनी नहीं हो पाती | चंद लोहे वाली इकाइयों के भरोसे आप कितना कमा लोगे , वाले वे दिन थे |
माथुर साहब इन्ही का रोना , गला तर होते ही, आये दिन किया करते थे | उनको तरह – तरह से सिश्वास – दिलासा दिलाये जाने का नुस्खा यार – दोस्तों में आजमाया जाता मगर निराश – डिप्रेशन के नजदीक जाते लोगों के लिए , शब्दों के बाँध में बिना बरसात हुए , पानी सहेज कर रखने जैसा प्रयास कहा सकता था ....? लिहाजा वे बीमार इकाई के साथ खुद बीमार रहने लगे |
इधर हमने अपनी देखरेख और दोस्ती की हिमायत में, निस्वार्थ फेक्ट्री को पटरी पर ला दिया |
माथुर भाई , मुझे अचानक अविश्वास की नजर से देखते का शौक पालने लगे , उनके भीतर का भय , कहीं ये सारा हडप न ले , से भी मै वाकिफ था | उन्हें जितना विशास दिलाता वे उतने अपने प्रति हिसक हो जाते | तबियत बिगाड़ बैठे | उन्ही दिनों ,तब आक्सीजन की मांग पीक पर आ चुकी थी फेक्ट्री के दिन यूँ फिरे कि गेट से लेकर छत दीवार जिन्हें रंग –रोगन प्लास्टर की वर्षो से दरकार थी आनन फानन में पूरी हो गई | आस-पास की दूसरी इकाइयों में जलन की बू तारी होने लगी | वे इस तरक्की को बर्दाश्त करने की क्षमता रखने में नाकाम रहे |
माथुर साहब को करोना पाजिटिव की शिनाख्ती पर निकट के अस्पताल में भर्ती किया गया , आक्सीजन सिलेंडर की डिमांड की गई , अस्पताल को जरूरत से भी ज्यादा सिलेंडर भिजवा दिया गया | वे तब भी बच नहीं सके |
जाते-जाते पता नहीं वे किस इरादे से मेरे खिलाफ रिपोर्ट लिखा गए,वक्त रहते मैंने उनके लिए हवा का इंतजाम नहीं किया | फेक्ट्री में मुनाफे के लिए वाजिब दाम से अधिक में आक्सीजन की बिक्री की |
पुलिसिया जाँच जारी है |
हवा बेचने पर ‘लात’ की व्यवस्था इस जमाने के उसूलो में जब शमिल हो तो कोई क्या कर सकता है ?
चलूं , माथुर साहब के लिए ,चार कन्धों , कफन , दाह- संस्कार का मानवीय फर्ज अपनी तरफ से कर दूँ |
सुशील यादव
२०२ श्रीम सृष्टि
शालिग्राम , अटलाद्ररा
वडोदरा ३९००१२
मोबाइल 7000226712
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