मालूम किसे....
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माथे शिकन, या चेहरा चाहे
तनाव आ जाये
सच को कभी ना बेचिये
लाखों का भाव आ जाये
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लोगों को तुम हो तौलते
अपनी गरज से आए दिन
मकसद बिना कब पूछते,
जब ना चुनाव आ जाये
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उनके इशारों में फिजूल
लाखों लुटा रहे हो क्यूं?
है बात तब,
घर,ईंट, पत्थर से लगाव आ जाये
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क्या छोड़ क़े कुनबा,
जियोगे जिंदगी, फकीरो की
अब सोचना, इन फैसलों में
फिर कसाव आ जाये
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बारिश भरोसे ये नदी तो,
उफनती रही हरदम
मालूम किसे किस तरफ ढाल
कहां रिसाव आ जाये
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सुशील यादव दुर्ग
न्यू आदर्श नगर,जोन 1 स्ट्रीट 3 A
दुर्ग छत्तीसगढ़
मोबाईल :7000226712
बात तल्ख़ सी
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मेरी जुबां जब भी फ़िसल जाती है
कुछ बात तल्ख़ सी बस निकल जाती है
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खामोश हो जीने का मकसद भी क्या
खामोशियाँ गम में बदल जाती है
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बैसाख या आषाड़ सावन भादो
मजबूरियां मौसम निगल जाती है
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उसको तराशे थे हमी जी जान से
हीरे की सूरत अब तो खल जाती है
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लाखों की चाहे हो कमाई दौलत
सरकार की नजर आजकल जाती है
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सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर,जोन 1 स्ट्रीट 3 A
दुर्ग छत्तीसगढ़
मोबाईल :7000226712
आजकल जाने क्यों.....
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एक गलत सोच, आखों की स्याही बदल देता है
समूचे शहर को बारूदी , तबाही बदल देता है
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फर्क पड़ता नहीं तुम्हारे ऐशो- आराम में तनिक
आंकड़ो की मुनादी ही बस गवाही बदल देता है
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रिश्तों को निभाना इतना नहीं आसान आपस
जुबान की जरा तलखी आवाजाही बदल देता है
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मजबूरी ये कि हम बदल नहीं सकते खुद पडोसी
सामने का मुल्क बातों की कड़ाही बदल देता
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छीन कर ले जाता था कोई मेरा चैन -करार वही
आजकल जाने क्यों तरीका उगाही बदल देता है
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उम्र क़े इस पड़ाव में.....
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दर्द जहाँ मैं टांगा करता, टूटी आज वो खूंटी लगती
सारे संबल सभी आसरे,बिना असर की बूटी लगती
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लेकर चलना उसी गली में,यादों का भरता हो मेला
बचपन खेल घरोंदे वाले,नाव डूबता रहूँ अकेला
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अब उम्र क़े इस पड़ाव में, कितनी बातें छूटी लगती
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अरमानों जब पँख नहीं थे, आकाश लगा करता छोटा
उड़ने की जब ताकत आई,व्यवधानो ने अक्सर टोका
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शेष नहीं कुछ कहने जैसा,गुम नगीना अंगूठी लगती
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इन बाजुओं का दम है,पहले जैसा आज भी क़ायम
आज भी मिलने की चाहत,रत्ती भर उत्साह नहीं कम
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चाहत की अब दुनियां तुझ बिन खाली - खाली झूठी लगती
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उमंग उजालों की सजती,सदा रहे पहचान दिवाली
मुस्कान बांटते जाना यूँ,तमाशबीन बजा दे ताली
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मंहगाई की हाथ थमी हो ,विपदा की लो सूटी लगती
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सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर,जोन 1 स्ट्रीट 3 A
दुर्ग छत्तीसगढ
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