Friday, 15 July 2022

मेरे शहर me

 


मेरे शहर में

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दूध का मेरे शहर क़ोई धुला नहीं है

आदमी सा आदमी मुझको मिला नहीं है

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यों कभी देखे ज़रा आता क़रार तुझे

और से तू मानता हूँ ख़ुद जुदा नहीं है

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आसमां से खींच कैसे बाँट दूँ तुझे भी

मेरे हिस्से और तो हासिल अब हवा नहीं है

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हो क़फ़स में क़ैद रहते हम घरों में यूं

आदमी होने का सपना जो बुना नहीं है

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बाद जाने के बहुत तू याद भी रहे यूँ

क्या कहूँ जाना दिलो -जा अखरा नहीं है

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हो गए हालात काबू से हमारे परे

तजुर्बे में और बड़ा सा आकड़ा नहीँ है

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क्यूँ उठा लाई हो खुशबू में पुराने दिन

मैंने जिसको आदतो क़ोई गिना नहीँ है

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भाइयों से ख़ूब लड़ के थक गया इसीसे

सोचता हूँ अब अदावत से फ़ायदा नहीं है

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पाँव भारी ये अंगद क़े जिधर भी बढ़ चले

शक की बुनियादें हिली हमको पता नहीं है

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बारूदी धुए में शहर को बाँट दो तुम

मैं रहूँ बीमार मेरी मेरी दवा नहीं है

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सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर दुर्ग छत्तीसगढ़

मोबाइल 7000 226 712

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