मेरे शहर में
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दूध का मेरे शहर क़ोई धुला नहीं है
आदमी सा आदमी मुझको मिला नहीं है
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यों कभी देखे ज़रा आता क़रार तुझे
और से तू मानता हूँ ख़ुद जुदा नहीं है
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आसमां से खींच कैसे बाँट दूँ तुझे भी
मेरे हिस्से और तो हासिल अब हवा नहीं है
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हो क़फ़स में क़ैद रहते हम घरों में यूं
आदमी होने का सपना जो बुना नहीं है
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बाद जाने के बहुत तू याद भी रहे यूँ
क्या कहूँ जाना दिलो -जा अखरा नहीं है
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हो गए हालात काबू से हमारे परे
तजुर्बे में और बड़ा सा आकड़ा नहीँ है
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क्यूँ उठा लाई हो खुशबू में पुराने दिन
मैंने जिसको आदतो क़ोई गिना नहीँ है
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भाइयों से ख़ूब लड़ के थक गया इसीसे
सोचता हूँ अब अदावत से फ़ायदा नहीं है
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पाँव भारी ये अंगद क़े जिधर भी बढ़ चले
शक की बुनियादें हिली हमको पता नहीं है
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बारूदी धुए में शहर को बाँट दो तुम
मैं रहूँ बीमार मेरी मेरी दवा नहीं है
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सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग छत्तीसगढ़
मोबाइल 7000 226 712
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