Thursday, 14 July 2022

 

कातिलों क़े शहर में.....
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फूल की खुशबू  वफा में चमक क़े लिए
हो नहीँ बस जंग आपसी नमक क़े लिए
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वक़्त ने देखा जहर नफ़रत का घुलता
बोलते क्या- क्या रहे तुम सनक क़े लिए
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आज भी तेरी कहीं से याद आती
छोड़ती है  रात  लम्बी कसक क़े लिए
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एक हम  जो दे रहे हैँ आज  दस्तक
यूँ सभी लापता हैं शफक क़े लिए
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कहने को  बाक़ी बचा  क्या पास मेरे
कातिलों क़े इस शहर में रमक़ क़े लिए
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रहगुजर में बैठ कर यूँ देखता रहा
आस तो मिटती कहां इक झलक क़े लिए
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मयकदे में जो नसीहत पी गया हो
खैर उसकी क्या मनाएं शतक क़े लिए
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शफक = क्षितिज की लाली
रमक़ = रही सही जान, थोड़ी सी जिंदगी
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सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर,जोन 1 स्ट्रीट 3 A
दुर्ग छत्तीसगढ़
मोबाईल :7000226712

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