रहबर से......
जाने कब से तू, कानो में रुई डाल के बैठा है
हरसत- आरजू कहीं, फुर्सत निकाल के बैठा है
यूँ किस्से रोम जलने के, हैं किताबों में मशहूर
लिए ,वही रुतबा वही तेवर, कमाल के बैठा है
अब दुअन्नी -चवन्नी के दिन, कब से लद गए
कीमतों को, आदमकद बड़ा उछाल के बैठा है
हर नुमाइश में जरूरी नहीं, बोले तूती जूतियां
स्लीपरों के इश्तिहार पे, दिल उबाल के बैठा है
लोगों के पूछने पर, जवाबदेही तो बनती मगर
लगता है इन दिनों, बिना सवाल के बैठा है
रहबर -रहनुमा अब यहाँ, राहजनी में मशगूल
खौफ की, खबर -सनसनी सम्हाल के बैठा है
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर
जोन १ स्ट्रीट ३ दुर्ग
छत्तीसगढ़
9408807420
Susyadav7@gmail.com
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