खुली जीप में...
#
वादों की रस्सी में तनाव आ गया है
मंदिर के चर्चे हैं,चुनाव आ गया है
#
खुली जीप में सवार हैं इल्लियाँ
मिया की दौड़ में कसाव आ गया है
#
रोगग्रस्त थीं उफ ये नदी पांच साल से
अब क़े बारिश कैसा बहाव आ गया है
#
गुस्ताख़ स्वागत माफ करना हुजूर
चेहरे में मसलन खिचाव आ गया है
#
जा रहा था लादेन अपने पाँव चल क़े
पुतिन क़े घर फिर ठहराव आ गया है
#
हुकूमत की ऐसी क्या लगी है आदत
सच बेच दें बोलो,भाव आ गया है
#
कुछ लोग उठाने को कतरा रहे परचम
इरादों में इनके बदलाव आ गया है
#
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर जोन 1स्ट्रीट 3
दुर्ग छत्तीसगढ़
Vnnvv
किसी को खाली जुबान मत दो
सवईया ###
7भगण स
8सगण, सवईया
112 112 112 112 112 112 112 112
मन प्राण बचा तब जान सका दुविधा दिन बीत गए अब से
सब ने परवा कर ली अपनी सुविधा सब बैठ गए कब से
हम साथ न मंजिल पा सकते अकुलाहट में फिरते तब से
जिनको लगता अब जीवन सूतक लाश बने रहते जब से
अपनी पहचान लिए फिरता पर हाथ नहीं मिलता कुछ भी
दुखिया जग में कठनाई कहें कुछ मांग नहीं सकते रब से
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर जोन 1स्ट्रीट 3
दुर्ग छत्तीसगढ़
112 112 112 112 112 112 112 112
अपनी पहचान बना मत बोल कहीं
साथ नहीँ निभता खुद ही
##
क़ीमत आज बढ़ी लगती हमको इसको रखना मन में
@
7भगण+ ss सवईया
#
211 211 211 211 211 211 211 22
#
दीपक ज्ञान कहीं जलता मन आँगन रोशन रोशन होता
जो तुम साथ निभा सकती दिल यौवन सा खिलता नभ सोता
जान रहे हम ताकत से तलवार उठा कब वार करे हैं
रोज तनाव थके उलझे रह,जीवन सागर पार करे हैं
हूक उठी रहती मन में हर ओर लगा पहरा मन माना
ख्याल करे अब कौन यहाँ किसका सच गौरव गान बजाना
##
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर जोन 1स्ट्रीट 3
दुर्ग छत्तीसगढ़
और नहीं तब कौन उठा सकता हित गौरव राहत बीड़ा
@@
नाव सवार ज पूछत है हम नीक लगी कब पार
@@@p@
देश बचा सकते हम भी सह दूभर पीठ म खाकर गोली
रंग भरी रख गागर आँगन फाग डिगा रखती सब होली
@
क्षमता की तौल....
*
जीवन की कुछ मर्यादा समझो
कम बोलो और ज्यादा समझो
तल्ख हकीकत के आगे भाई
पूरी क्षमता भी आधा समझो
*
समय नदी पर विपरीत दिशा में
तैरने वाले बहुधा कम होते
पाषाणों पर कितने ,बीज डाल
बिन बारिश की हैं फसलें बोते
धरा बोझ बन इतराने वालो
खुद को तौलो या बाधा समझो
*
पीठ दिखा तुम, कब आए रण से
ले वीरोचित व्यवहार डटे थे
मां बहनों की इज्जत -आबरू
सिंदूर- महावर की लाज ढके थे
आए कालजयी से टकराने
तुच्छ सभी सब को सादा समझो
*
मौके सभी को बराबर आते
लेकिन भुना कुछ लोग ही पाते
अवसर पर गांठ लगाने वाले
रस्सी अक्सर मजबूत बनाते
सीखो तो हर मजबूरी हममें
भर देती जोश - इरादा समझो
*
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर जोन 1स्ट्रीट 3
दुर्ग छत्तीसगढ़
9408807420
मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 83, अप्रैल(द्वितीय), 2020
तेरे कत्ल का इल्जाम........
सुशील यादव दुर्ग
मैं उसके बाद नहीं,उसके पेश्तर भी नहीं था
मेरे मिजाज में तल्ख कोई तेवर भी नहीं था
मेरे वजूद को लोग नकार देते हैं अक्सर
मेरे वजूद में नौलखा जेवर भी नहीं था
एक तेरा एहसास रहता था मेरे आस-पास
मगर कुछ दिनों से ऐसा मंजर भी नहीं था
जाने क्यों तेरे कत्ल का इल्जाम है 'सुशील'
मेरे घर से बरामद कोई ख़ंजर भी नहीं था
लोग यहां अपनी तारीफों के इश्तिहार बांटते
मुझमे वो हौसला- हुनर, इस कदर भी नहीं था
@@
😢मुझे जो लूट ले……
पुराना वो समय-शहर कहाँ है
मुझे जो लूट ले रहबर कहाँ है
दुआ बुजुर्ग की होती साथ कभी
बता दो अब वही गुहर कहाँ है
बहुत कमजोर सायकल का पहिया
समझ-सोच कहना पंचर कहाँ है
फकीरों की सुनो आयेगा कल
गये-बीते की अब फिकर कहाँ
अनारकली झुका दे सल्तनत को
सितम ढाने बचा अकबर कहाँ है
सुशील यादव
2.6.17
कविता · Reading time: 1 minute
इस तरफ आएगा कौन…..212 212 212
सब के आगे उदासी न रख
तलब को और प्यासी न रख
है मुझे रात भर जागना
जुगनुओं की तलाशी न रख
इस तरफ आएगा कौन अब
मुल्तवी और फांसी न रख
इश्क मुश्क छुप जाए भला
कोशिश खारिश-खांसी न रख
इत्र शीशी हो सिरहाने में
खुशबु अपनी दवा सी न रख
सुशील यादव
3.6.17
118 Views
कविता · Reading time: 1 minute
भूल गये तुमको …..
भूल गये तुमको, यूँ बातों ही बात में हम
इतने भीगे तनहा बारिश,-बरसात में हम
ज़ुल्म -सितम क्या जानो, सहना पड़ता जब भी
फिर छोटी कुटिया,फिर वो ही औकात में हम
जिस हाल में हम हैं, सहने की क्षमता टूटी
क्षीण हुए भीतर ,सदमो की हालात में हम
एक कहर लगती, आज सजा सौ-सालो की
काटें कैदे-उमर कैसे हवालात में हम
बचपन नावें, कागज़ की क्या तैरा करती
उस पर बहतेे ,कोरे- कोरे जज्बात में हम
दरख्त सुखों से फूला- फलता दिखता
काट-गिराने को रहते अक्सर घात में हम
सुशील यादव
४.६. १७
75 Views
धुँआ-धुँआ
धुआं -धुआं ,है शहर में, हवा नहीं है
मैं जो बीमार हूं ,मेरी दवा नहीं है
तलाश उस शख्स की, है अभी जारी
जिसके पांव , छाले -छाले जो थका नहीं है
कहां तक लादकर, हम बोझ को चले
बनके श्रवण, मां-बाप को पूजा नहीं है
दंगो के शहर, दहशत लिए जीता हूं मैं
कोई हादसा करीब से, छुआ नहीं है
लहरो से मिटी रेतों की इबारत
सीने लिखा नाम तो ,मिटा नहीं है
सुशील यादव दुर्ग छत्तीसगढ़
58 Views
गज़ल/गीतिका · Reading time: 2 minutes
किस दिन मैं छिपा करता हूँ
करोड़ बारह सौ फूंके हैं ,बांटे मोबाइल सरकार
गंवार-अपढ़ जनता होवे,मोबाइल की क्या दरकार
जिन गावो में भूखा प्यासा,खेती करता दिखे किसान
मोबाइल उन हाथो देकर,तुम समझो खुद धन्य महान
नक्सलवादी वहीँ जमे हैं ,ले पैसा इस नाम अकूत
रोजाना ताबूत भेजे जाते ,भारत वीर जवान सपूत
किस मिटटी के तुम हो माधो ,ह्रदय तुम्हारा हाय कठोर
विपदा- संकट रखते साथी ,नेता- अफसर चिन्दी चोर
कौन योजना के बलबूते ,होगी अब की नैय्या पार
जनता और भरम में डालो ,कर लो फिर से छल व्यापार
विकास मुद्दे चुनाव गायब , कहो राज के तारणहार
मोबाइल दे के लूट रहे , सरकारी संचित भंडार
पढ़ने वाले बच्चो को देकर ,करते यहां गहन अपराध
भटकाने-दौड़ाने पथ में ,छोड़ दिए हो क्रोधित बाघ
जनमत को अब मत भटकाओ,देना होगा सभी हिसाब
बन्द करो ये दारू खाने, मुफ्त बांट चुनावी शराब
सुशील यादव दुर्ग
धुआं धुआं है शहर में हवा नहीं है
मैं जो बीमार हूं मेरी दवा नहीं है
तलाश उस शख्स की है अभी जारी
जिसके पांव में छाले छाले जो थका नहीं है
कहां तक लादकर हम बोझ को चले
बनके श्रवण मां-बाप को पूजा नहीं है
दंगो के शहर दहशत लिए जीता हूं मैं
कोई हादसा करीब से छुआ नहीं है
लहरो से मिटी है रेतों की इबारत
सीने से मिटे नाम जो लिखा नहीं है
मैं सपनों का ताना-बाना यूँ अकेले बुना करता हूं
मंदिर का करता सजदा मस्जिद भी पूजा करता हूं
जिस दिन मिलती फुर्सत मुझको दुनिया के कोलाहल से
राम रहीम की बस्ती , अलगू जुम्मन ढूंढा करता हूं
जब-जब बादल और धुएं में गंध बारूदी मिल जाती है
उस दिन घर आंगन छुपके पहरों पहरों रोया करता हू
मजहब धर्म के रखवाले इतने गहरे उतर न पाते
मैं सुलह की गहराई से मोती सांफ चुना करता हूं
आओ हम अपना उतारे ,ओढा पहना बेसबब नकाब
मेरी शक्ल से वाकिफ तुम,मैं किस दिन छुपा करता हूँ
सुशील यादव
न्यू आदेश नगर दुर्ग छत्तीसगढ़
64 Views
नाव को फेंक
2122:1212: 2211: 2122: 2 फर्क पड़ता नही…ं
sushil yadav
sushil yadav
कविता
July 7, 2017
नाव को फेंक, पाँव में, जो भँवर बाँध लेते हैं
लोग नादान जीने का अजब हुनर बाँध लेते हैं
फर्क पड़ता नही जमाने को मेरे होने का शायद
एवज मेरे यहां घरो में जानवर बाँध लेते हैं
देख बारिश संभावना, परिंदे अपनी समझ से ही
आप तिनका उठा कहीं पास शजर बाँध लेते हैं
जो निवाले तलाशते, बीता बचपन उसे ढूढते
खौफ चलते हमी सरीखे लो शहर बाँध लेते हैं
लोग चुप हैं, कि हादसा छूकर निकला नही वरना
एहतियातन वही गठरियों पत्थर बाँध लेते हैं
सुशील यादव::: न्यू आदर्श नगर दुर्ग : ५.७.१७
65 Views
सीने में लिखा नाम
सीने में लिखा नाम
धुआँ-धुआँ है शहर में, हवा नही है
मै जो बीमार हूं ,मेरी दवा नहीं है
तलाश उस शख्श की, है अभी जारी
जिसके पावों छाले-छाले, जो थका नहीं है
कहाँ तक लाद कर हम ,बोझ को चलें
बनके श्रवण माँ –बाप को पूजा नहीं है
दंगो के शहर दहशत लिए फिरता हूँ मै
कोई हादसा करीब से बस छुआ नहीं है
लहरों से मिटी है , रेतो की इबारत
सीने में लिखा नाम तो मिटा नहीं है
Sushil Yadav,09426764552,
कोई दीवार तो ढूढ….
रोने की बात पर कहकहा लगा भाई
समय के साथ ही निशाना लगा भाई
तबीयत पूछता है कौन बीमार की
टिफिन है सामने खाना लगा भाई
नदारद हुए किसी पे अब यकींन के दिन
कोई सूरत फिर भरोसा लगा भाई
जिदों से चल नहीं पाती कभी दुनिया
किनारे करीब चल नौका लगा भाई
मचाये रहती है जो पेट में खलबली
सभी बातों बहस-छौका लगा भाई
कोई दीवार ढूढ ‘सुशील’कद माफिक
मुझे दीवार फिर ज़िंदा लगा भाई
सुशील यादव
गज़ल/गीतिका ·
किताबों में दबे फूल का मौसम ..
रवानी खून में ,ख्यालो मे ललक नहीं है
तेरी आँखों में पहले की चमक नहीं है
कभी आती दूर से आवाज तेरी सी
वहां देखू कोई वैसी गमक नहीं है
खुली है खिड़कियां खामोश दरबाजे
लिफाफे गलत पते के हो शक नहीं है
किताबों में दबे फूल का न हो मौसम
रिवाजो में खिले फूल में महक नहीं है
मेरी नाकामियां घेरे रही मुझको
मगर आँखों हया दिल में झिझक नहीं है
सुशील यादव
71 Views
बात पहुचानी है सुशील जी ….2122, 2212, 2212,2122
आँख में आंसू, तलब का जखीरा ले के क्या करोगे
अश्क पीछे
जखीरा ले के
क्या करोगे
बात पहुंचानी हैं, सुशील जी......
2212 2212 2212 222
उम्मीद का भाई जखीरा ले करोगे तुम क्या
आगे किसी के सिर्फ रोना ले करोगे तुम क्या
हो _पाँव में जंजीर तो वाजिब कहाँ ये सोच
बस हाथ -ढपली या मंजीरा ले करोगे तुम क्या
कितने सितम के मायने होते किसे था मालूम
फतवों तराशा आदमी हीरा ले करोगे तुम क्या
बाजार में,बलिदान में,वो याद आते भी रहे
अब सूर मीरा ,ya- कबीरा ले करोगे तुम क्या
मानो किताबों के सभी खुद आप थे योद्धा सजग
चाहें अगर दर्जा वही -रुतबा ले के करोगे
तुम क्या
उँटों को पहुचानी है अपनी बात जो कि सुशील जी
कहने को मुट्ठी भर ये जीरा ले करोगे तुम क्या
सुशील यादव
१३.१.१७
_पाँव में हो जंजीर तो वाजिब नहीं सोचना ये
_ढोल-ढपली या हाथ मंजीरा ले के क्या करोगे
सितम के कितने मायने होगे किसे था पता तब
फकत फतवों में आदमी हीरा ले के क्या करोगे
_लेखनी मे ं ,बाजार में,बलिदान में, याद आते
_सूर-मीरा,संत-सजग कबीरा ले के क्या करोगे
वो किताबों के लोग थे इतिहास के सब पुरोधा
असल में वो दर्जा वही -रुतबा ले के क्या करोगे
ऊँट तक पहुचानी है तुमको बात अपनी सुशील जी
मुठ्ठियों कहने भर बोलो जीरा ले के क्या करोगे
सुशील यादव
१३.१.१७
102 Views
/गीतिका · Reading time: 1 minute
जिसे सिखलाया बोलना…..2122 १२२२ 2212
चश्म नम और दामन तर होने लगा
जिन्दगी सादगी से बसर होने लगा
जो निचोड़ के रखा है अपना आस्तीन
अब पसीने से नम कालर होने लगा
दाउदों के पते पूछो तो हम कहें
पाक-दोहा कभी तो कतर होने लगा
बाज आऊं बुरी हरकत से मै कभी
मय नशी में इधर-ऊधर होने लगा
अब मेरी मंजिलो के मिलते हैं निशान
पांव के छालो का असर होने लगा
बेजुबां बुत जिसे सिखलाया बोलना
पलटते ही मेरे पत्थर होने लगा
सुशील यादव
55 Views
ज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute
बस ख़्याले बुनता रहूँ…………सुशील यादव
बस ख़्याले बुनता रहूँ…………सुशील यादव
अँधेरे में दुआ करूँ, ऐ ख़ुदा परछाई दे
बेख़्याली में निकले, जो नाम सुनाई दे
करवट न बदलूँ, कोई ख़्वाब न देखूँ
नीद से उठते तेरी, याद जुम्हाई दे
क़समों का क़सीदा हो, कहीं वादों का हो ताना
ख़्याले बुनता रहूँ, बस यूँ तन्हाई दे
उजड़े गुलशन में, सब्ज़-शजर देखूँ
हो तब्दील क़िस्मत, जन्नत ख़ुदाई दे
रिश्तों की अदालत, बेजान हलफ़नामे
या मुझे ज़िंदा रख, या मेरी रिहाई दे
-सुशील यादव
गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute
आम आदमी …..
221 1221 1221 122
आम आदमी …..
हमने तुमको नोट बदलते नहीं देखा
काले-उजले फेर में चलते नहीं देखा
तुम सितमगरों की दुनिया,रहने के आदी
चट्टान दबे नीचे, निकलते नहीं देखा
जो आज कमा ली,हो गया बसर के लायक
हो ईद- दिवाली कि, उछलते नहीं देखा
टूटे हुए लगते हैं सभी चाँद सितारे
किस्मत की बुलन्दी को निगलते नहीं देखा
पानी की तरह हो गया है खून तुम्हारा
खूं जैसे इसे हमने उबलते नहीं देखा
सुशील यादव
२६.११.१६
गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute
खिले-खिले फूल ….. नींद में कोई चल के देखे काले…
खिले-खिले फूल …..
नींद में कोई चल के देखे
काले नोट बदल के देखे
एक नटनी रस्सी पे चलती
यूँ भी कोई सम्हल के देखे
कोई सूरत नजर न आती
छुपे चेहरे असल के देखे
जुम्मन मिया की बोलती बंद
अलगु खौफ़ अजल के देखे
हर आहट जो नोट छुपाते
गायब नखरे अकल के देखे
इच्छाओं को मारने निकले
खून-खराबे मक़तल के देखे
एक गरीब की आस था पैसा
अमीर फंसे दलदल के देखे
जाने क्या कल अंजाम हो साथी
खिले-खिले फूल कमल के देखे
सुशील यादव
65 Views
कहते हैं आजकल …..
नासूर का होता अगर…..
नोटबन्दी शायद कहीं हथौड़ा सा बन गया
कोई उठा के फायदा थोड़ा सा बन गया
मार्केट जिसकी थी नहीं वेल्यु किसी प्रकार
वो हिंनहिनाता दौड़ता घोडा सा बन गया
नालायक गिने जाते थे जो हरेक काम मगर
घर छोड़ के वो सुर्ख़ियों भगोड़ा सा बन गया
दिखने में थी वो शक्ल से सुन्दर सी छोकरी
अब नाक देखो आप ही पकोड़ा सा बन गया
इल्जाम थे खून के तो कोई बात भी न थी
नीयत से वो बदमाश ही छिछोड़ा सा बन गया
कब बाप को बेहाल जाता छोड़ कर बेटा
कहते हैं पर आजकल वो भगोड़ा सा बन गया
नासूर का होता अगर वक्त में मुआइना
कोई नहीं कहता कभी ,फोड़ा सा बन गया
@@
Sushil Yadav
Durg Chhatisgarh
81 Views
-सियासत ….. सुशील यादव
२१२२ २१२२ २१२
तुम नजर भर ये, अजीयत देखना
हो सके, मैली-सियासत देखना
ये भरोसे की, राजनीती ख़ाक सी
लूट शामिल की, हिमाकत देखना
दौर है कमा लो, जमाना आप का
बमुश्किल हो फिर, जहानत देखना
लोग कायर थे, डरे रहते थे खुद
जानते ना थे , अदालत देखना
तोहफे में ‘लाख’, तुमको बाँट दे
कौम की तुम ही, तबीयत देखना
अजीयत =यातना ,जहानत = समझदारी
80 Views
Like Comment
/गीतिका · Reading time: 1 minute
जीने का मजा नहीं है
२१२२ २१२२ २१२१ २२
सुशील यादव
साथ मेरे हमसफर वो साथिया नही है
लुफ्त मरने में नहीं ,जीने का मजा नहीं है
रूठ कर चल दिए तमाम सपने- उम्मीद
इस जुदाई जिन्दगी का जायका नहीं है
साथ रहता था बेचारा बेजुबान सा दिल
ठोकरे, खामोश खा के भी गिना नहीं है
आ करीब से जान ले, खुदगर्ज हैं नही हम
फूल से न रंज, कली हमसे खपा नहीं है
शौक से लग जो गया, उनके गले तभी से
लाइलाज ए मरीज हूँ, मेरी दवा नही है
78 Views
गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute
समझौते की कुछ सूरत देखो
समझौते की कुछ सूरत देखो
है किसको कितनी जरूरत देखो
ढेर लगे हैं आवेदन के अब
लोगो की अहम शिकायत देखो
लूटा करते , वोट गरीबों के
जाकर कुनबो की हालत देखो
भूखों मरते कल लोग मिलेंगे
रोटी होती क्या हसरत देखो
फैला दो उजियारा चार तरफ
एक दिए की कितनी ताकत देखो
सुशील यादव
दुर्ग
58 Views
गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute
बिना कुछ कहे....
122 122 122 12
*
बिना कुछ कहे सब अता हो गया
हंसी सामने चेहरा हो गया
*
दबे पाँव चल के,गया था जहाँ
शिकारी वहीं , लापता हो गया
*
मुझे देख , ‘फिर’ गई निगाहें जनाब
गुनाहों जुड़ा कुछ नया हो , गया
*
नही बच सका, आदमी लालची
भरे पाप का जब , घडा हो गया
*
छुपा सीने में राज रखता कई
सयाना था मुखबिर, बच्चा हो गया
*
लुटी आम राहों में अस्मत जहाँ
सियासत वहीं बे- सदा हो गया
*
कहीं मातमी धुन. सुना तो लगा
अचानक शहर में.दंगा हो गया
*
सुशील यादव
दुर्ग
**
ये कैसा धुँआ हो गया
3
१२२ १२२ १२२ १२ सुशील यादव ….
शहर में ये कैसा धुँआ हो गया
कहीं तो बड़ा हादसा हो गया
किसी जिद, न जाने, वहां था खड़
शिनाख्त, मेरा चेहरा हो गया
हुकुम का गुलाम, जिस की जेब हो
शह्र का वही, बादशा हो गया
हमारे वजूद की, तलाशी करो
ये खोना भी अब, सिलसिला हो गया
ये चारागरों जानिब खबर मिली
मर्ज ला इलाज-ऐ- दवा हो गया
अदब से झुका एक, मिला सर यहाँ
‘सलीका’ ‘सुशील’ का , पता हो गया
सुशील यादव
64 Views
गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute
ग़ज़ल
1
२२१ २१२१ १ २२१ २१२
यूँ आप नेक-नीयत, सुलतान हो गए
सारे हर्फ किताब के, आसान हो गए
समझे नहीं जिसे हम, गुमनाम लोग वो
हक़ छीन के हमी से , परेशान हो गए
कुनबा नहीं सिखा सकता बैर- दुश्मनी
नाहक ही लोग , हिंदु-मुसलमान हो गए
सहमे हुए जिसे ,समझा करते बारहा
बेशर्म- लोग जाहिल – बदजुबान हो गए
एक हूक सी उठी रहती,सीने में हरदम
बाजार में पटक दिए, सामान हो गए
एक पुल मिला देता हमको, आप टूटकर
रिश्तों की ओट आप, दरमियान हो गए
@@@
2.
२१२२ १२१२ २२
सुशील यादव
तेरी दुनिया नई नई है क्या
रात रोके कभी, रुकी है क्या
बदलते रहते हो,मिजाज अपने
हर जगह बोल , दुश्मनी है क्या
जादु-टोना कभी-कभी चलता
याद जनता की चौंकती है क्या
तीरगी , तीर ही चला लेते
जिंदगी! पास रौशनी है क्या
सर्द मौसम, अभी-अभी गुजरा
ख्वाब दुरुस्त कहीं जमी है क्या
सुशील यादव
४.१२.१५
98 Views
· Reading time: 1 minute
छन्न पकैया ….
छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या, चिर्पोटी बंगाला
अमसुर होवत राज तुंहरे ,हमरो देश निकाला
छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या, राजनीति खपचल्हा
दिन बहुरे काखर हे देरी ,होवय नकटा- ठलहा
छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या, होवय नेता लबरा
सपनावत रहिबे बाँध-बनही ,खनाय रहिथे डबरा
छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या, दोनों हाथ म लाडू
सूट- पेंट पहिरे खातिर अब , दिल्ली मारो झाड़ू
छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या,सीखो गा बदमाशी
दारु दुकान खोले मिलही ,परमिट बारामासी
छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या,गुरतुर जेखर बोली
मिलही रंग ऐसो सब्सीडी ,खेलेबर जी होली
सुशील यादव
111 Views
मुक्तक
2122 2122 2122
गलत राय गलत मशवरा देने वाले
मुंसिफी की आड़ फतवा देने वाले
बिजलियाँ सौ सौ गिरे तेरे घरों में
जन्नते काश्मीर जला देने वाले
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग छत्तीसगढ़
5.7.17
पारस कहु ले लान के…. छतीसगढ़ी दोहे
लोकतंत्र के नाम ले ,पार डरो गोहार
कुकुर ओतके भोकही ,जतके चाबी डार
लहसुन मिर्चा टोटका,मिझरा डाल बघार
जतका झन ला नेवते,चांउर पुरत निमार
लोकतंत्र सुन्दर बिगुल,बजवइय्या हे कोन
अड़सठ-सत्तर साल के ,गणतंत्र हवे मौन
पारस कहु ले लान के ,छुआ दो एखर गोड़
माटी बनतिस सोन कस,गुन लोहा के छोड़
सुशील यादव
26.1.2017देख तुम्हारी सादगी ,
अपने-अपने दंभ को ,भूल-बिसर के आज
शामिल होली में रहो ,जुड़ता दिखे समाज
#
फागुन-फागुन सा हुआ ,सावन बिछुड़ा मीत
छोड़ अधर की बासुरी ,राधा विरहा गीत
#
कायरता की राह में ,हद से निकले पार
माया जननी मोह की,देख यही संसार
#
पद प्रतिष्ठा वो छोड़ के ,सड़कें नापे रोज
कीचड़-कीचड़ में खिले ,पंकज,कमल,सरोज
#
देख तुम्हारी सादगी , हाथो बचा गुलाल
जीवन सारा काट दे ,इतनी सोच मलाल
सुशील यादव,दुर्ग
7.3.17
राजनीति के छल-कपट,
संग तुम्हारा छोड़ के,कहीं न जाती नाथ
गठबन्धन निभती रहे ,राजनीति के साथ
भरसक अपना है अभी,इतना महज प्रयास
रूठी जनता से मिले ,वोट हमी को ख़ास
कल थे वे जो रूबरू ,ज
आज अपनी नीयत से,बन बैठे हैं नीच
रेखा कभी- कहाँ खिंची,परंपरा के खेल
देखो जला मशालची,जितनी-जी भर तेल
अवगुन पीछे छोड़ कर ,गुन की करे बखान
राजनीति के छल-कपट, लंपट खुली दुकान
सुशील यादव
मंजिल तेरी पास है ,ताके क्यूँ है दूर
चुपड़ी की चाहत करे , ज्ञान जला तंदूर
$
जिससे भी जैसे बने ,ले झोली भर ज्ञान
चार दिवस सब पाहुने ,सुख के चार पुराण
$
तीरथ करके लौट आ,चार देख ले धाम
मन भीतर क्या झांकता ,जहाँ मचा कुहराम
$
तीरथ सारे देख ले, चार देख ले धाम
भीतर मन मत झाँकना, जहाँ मचा कुहराम
$
मिल जाये जो राह में, साधू -संत -फकीर
चरण धूलि माथे लगा ,चन्दन-ज्ञान-अबीर
$
आस्था के अंगद अड़े ,बातों में दे जोर
तब -तब हिले पांव-नियम ,नीव जहाँ कमजोर
$
खींच तान देखो कहीं, किस्मत लेख लकीर
दस्तानो मेँ जो छिपी, पाप -पुण्य तकदीर
#
No comments:
Post a Comment