Tuesday, 13 November 2018

221 2122 221 2122
वरना कहाँ -चलोगे ...?
हम बेवजह ,जहां में  भटके गुमान लेकर
कोई जरूर आएगा नव-विहान लेकर

कुछ दाग आज भी  बाकी है, जिसे मिटाने
बरसो लगे, पुराने- बीते, निशान  लेकर

इतराये जो पड़ौसी उसको तमीज दे-दो
आदत सुधार लें वो अमिट पहचान लेकर

मजबूत हैं इरादे तो बात ही नहीं है
वरना कहाँ -चलोगे अपनी थकान लेकर

कोशिश करें  सभी जन ,ऊंचा ललाट पाएं
गौरव पलों में झूमे  सब , हिन्दुस्तान  लेकर

सुशील यादव
१३.६.१८/ ३०.९.१८

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