Saturday, 13 May 2023

 

रोने की हर बात पे

सुशील यादव

रोने की हर बात पे कहकहा लगाते हो
ज़ख़्मों पर जलता, क्यूँ फाहा लगाते हो

गिर न जाए आकाश, से लौट के पत्थर
अपने मक़सद का, निशाना लगाते हो

हाथों हाथ बेचा करो, ईमान-धरम तुम
सड़कों पे नुमाइश, तमाशा लगाते हो

फूलो से रंज तुम्हें, ख़ुशबू से परहेज़
बोलो किन यादों फिर, बग़ीचा लगाते हो

छन के आती रौशनी, बस उन झरोखों से
संयम सुशील मन, से शीशा लगाते हो

 

रूठे से ख़ुदाओं को

सुशील यादव

२२१ १२२२ २२१ १२२२

हर बात छुपाने की हम दिल से निभायेंगे
जिस हाल में छोड़ा वो, हालात भुलायेंगे

मालूम न था, तुझको बस हम से, शिकायत है
तस्वीर जुदा होगी, दर-असल सुनायेंगे

वो जिन के इशारों हो रहती है तरफ़दारी
म्ज़बूत इरादे उनको राह हटायेंगे

इस तरह कोई अपनों से रूठ नहीं जाता
रूठे से ख़ुदाओं को बेफ़िक्र मनाएँगे

गुत्थी जो सुलझती सी, दिखती जब भी हमको
ये राज़ के खुलने पे तफ़सील बतायेंगे

मुफ़लिस के भरोसे चल जाती अगरचे दुनिया
हम जन्नत दरवाज़े तक दरबार लगायेंगे

होगा कल तेरा इत्मीनान ज़रा रख ले
सुलगे से सवालों को आसान बनायेंगे

 

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सुशील यादव

२२१२२ २२१२ २

 

ये ज़ख़्म मेरा, भरने लगा है
शहर इस नाम से, डरने लगा है

विष के प्याले, हाथों नहीं थे
'
नस' ज़हर कैसे, उतरने लगा है

हाथ किस के आया, बीता जमाना
'
पर' समय कौन, कुतरने लगा है

भूल रहने की, टूटी कवायद
रह-रह के अक़्स उभरने लगा है

 

ये है निज़ाम तेरा

सुशील यादव

२२१२   २२१२   २२१२   १२१२

दरवेश के हर हुजरे से अब मेहमां हटाइए
जो लाश ले चलती ग़रीबी, दरमियाँ हटाइए

बार-ए-गिरेबां को कलफ़ न मिले जहाँ नसीब में
तहज़ीब की अब उस कमीज़ से गिरेबां हटाइए

ये है निज़ाम तेरा, सफ़ीना सोच कर उतारना
चलती हवा दरिया से बे-मकसद तुफ़ां हटाइए

उनको बिछा दो मखमली कालीन मगर साहेब
उम्मीद की बुनियाद हों काँटे, वहाँ हटाइए

जाने कोई क्यों खटकता है आँख में दबा-दबा
अब हो सके मायूस नज़रें अँखियाँ हटाइए

 

दरवेश = संत
हुजरे= निजी कमरा
बार-ए-गिरेबाँ- कमीज़ के कॉलर का वज़न
नि्ज़ाम = व्यवस्था, सफ़ीना=नाव

 

यूँ भी कोई

सुशील यादव(अंक: 174, फरवरी प्रथम, 2021 में प्रकाशित)

अँधेरे में यादों की परछाई रखता है
यूँ भी कोई  दूर की बीनाई रखता है
 
जिसके हाथ खुले  पैर मगर  हो ज़ंजीरें
बातें माकूल कहाँ जग- हँसाई रखता है 
 
देख फटे हाल उसे  कोई कहता भी क्या
वो जेबों की यूँ  नादान सिलाई रखता है
 
हमको भी आता था हुनर सीने-पिरोने का
पर वही यक़ीनन वाजिब तुरपाई रखता है
 
हम तो ढूँढ़ रहे, टूटे रिश्तों के वजूद 
मन ये कबाड़ बुनी चारपाई रखता है
 
सब ने उनको देखा है, दूर शहर से आते 
कहने को सरमाया फ़कत चटाई रखता है

 

1.    नेक-नीयत

यूँ आप नेक-नीयत

सुशील यादव

२२१  २१२१  १२२१  २१२

यूँ आप नेक-नीयत, सुलतान हो गए
सारे हर्फ़ किताब के, आसान हो गए

समझे नहीं जिसे हम, गुमनाम लोग वो
हक़ छीन के हमीं से , परेशान हो गए

कुनबा नहीं सिखा सकता बैर-दुश्मनी
नाहक़ ही लोग, हिंदु-मुसलमान हो गए

सहमे हुए जिसे, समझा करते बारहा
बेशर्म-लोग जाहिल - बदज़ुबान हो गए

एक हूक सी उठी रहती, सीने में हरदम
बाज़ार में पटक दिए, सामान हो गए

एक पुल मिला देता हमको, आप टूटकर
रिश्तों की ओट आप, दरमियान हो गए

 

मैं सपनों का ताना बाना

सुशील यादव

मैं सपनों का ताना बाना, यूँ अकेले बुना करता हूँ
मंदिर का करता सजदा, मस्जिद भी पूजा करता हूँ

मिलती फुरसत, मुझको जिस दिन, दुनिया के कोलाहल से
राम रहीम की बस्ती, अलगू जुम्मन ढूँढा करता हूँ

जब-जब बादल और धुएँ, बारूदी ख़ुशबू मिल जाती
उस दिन घर आँगन, छुप-छुप पहरों मैं रोया करता हूँ

मज़हब-धर्म के रखवाले, इतने गहरे उतर न पाते
जिस सुलह की गहराई से, मैं मोती साफ़ चुना करता हूँ

हम सब ले कर चलते, तर्कों के अपने-अपने मुखड़े
मेरी शक़्ल से तुम हो वाक़िफ़ किस दिन मैं छुपा करता हूँ


 13-04-2013