Thursday, 2 March 2017


२.  घनाक्षरी
छ्तीसगढ़ी...

 सुशील यादव

गुरतुर  रेहे  भाई ,तैं  कईसे अमटागे
बईहा जस कमाए ,गोंदा सही निछागे

 जगाए फिरत रेहे,अबड़ देवता-धामी
  लुवते-लुअत कांदी  ,जिनगानी  पहागे

 सियान के सियानी ले ,गोठे-बात नइ माने
बिन पानी जेला बोए ,  उही बीजा भथागे

जोता- सुमेला संग तें ,बईला ल फान्देस
मडई कोती काबर ,जी-जीवरा ढीलागे

रिसइया संगवारी , कस  नखरा ल झेले
अन्ते-तन्ते  डोंगा ,   'जतन' के बोहागे

काबर बड़का देखे ,महल के रे सपना
छोट्किन छान्ही के, जी खपरा उड़ा गे

 मिठलबरा के  गोठ ,लागे होही अंगाकर
थोरको  भुखाय बिन ,कतकोन  खवागे

सिताय असन लागे ,तब ले, माचिस-काड़ी
जड-जुरहा अंगना  ,भुर्री सिप्चागे

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