Thursday, 2 March 2017

४. बिछल्हा रद्दा.....(छ्तीसगढ़ी)

समधिन के गाँव ,चिखलाय असन जी
बिछल्हा रद्दा , आगी-लगाय असन जी

-नहाय नइये समधी, बसियाय असन वो
 छान्ही के बेदरा, खिसियाय असन वो

 बात-बात समधिन पारे
 एके ठन हाना
 चिक्कन चिक्कन सब ला परसे
 मोर थारी  ताना

ठेगा दिखावे , मेछराय   असन जी
बिछल्हा रद्दा , आगी-लगाय असन जी

बात-बात  समधी घलो ,
मारत रहिथे ताना
मुड-पीरवा घेरी-बेरी
किंजरे.. कछेरी-थाना

अपन 'बही' ले दीखे, असकट़ाय असन वो
छान्ही के बेदरा, खिसियाय असन वो

बड़े उमर के समधन तैं,
झन पारे कर हाना
 पाके चुंदी म बरोबर
 इतर-तेल  लगा-ना

कतको में अक्केला, महमाय असन वो
 ऐ गाव में तहिंच ,रखियाय  असन  वो

डोकरा होगेस समधी तें
तोर माडी-गोड पिराथे
एको कनी चलय नइये
रद्दा चिखला बताथे

मोर गाव के रद्दा, रेगाय असन जी
उतरत जवानी ते , डोकराय असन जी
२१.१२.१५

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