Sunday, 12 August 2018

किरीट सवैया

किरीट सवैया नामक छंद आठ भगणों से बनता है।
इसमें 12, 12 वर्णों पर यती होती है।

तीरथ जाकर लौट गया वह,बीन रहा अब चांवल कंकर
जो मन में प्रभु वास रहे तब ,छीन सका उर से कब शंकर

महाभुजंगप्रयात आठ सगण| :सुशील यादव
यहां तो न बाकी रहा चाहतो का, इलाका जिसे  याद  तूने किया है
न आबाद है वो जमीने जहां तू ,उगा बालियां खेत में जी लिया है

बचा कोहरा-धूल-माटी निहारो ,जिसे चाहते हो उसे ही  पुकारो
सभी तो कहीं जा चुके हैं यहां से ,तु बीमार कैसे जिया है

वो आजकल इन दिनों

वो कुछ दिनों से ....
२२१२    २२१२  2२1२  1२
अपनी जुबा से, बात मन की  खोलता नहीं
वो कुछ दिनों से, आजकल फिर बोलता नहीं

खामोशियाँ उसकी, इशारा क्या करे बता
टूटे परो से, आसमा जो  तौलता नहीं

दिल टूटने की हर अदा में सादगी रखे
पी ले ज़हर चुपचाप, ज़हर वो घोलता नहीं

पानी सा हो, उस खून का, क्या करता वो भला
घिर के मुसीबत- आफतो में खौलता नहीं

सुशील यादव

गुमान लेकर

221 2122 221 2122
हम जगह-जगह, दुनिया भटके गुमान लेकर
कोई जरूर आएगा नव-विहान लेकर

कुछ दाग जहन में बाकी है, जिसे मिटाने
जख्मो सहित निकल भी दौड़ो, निशान लेकर

इतराये जो पड़ौसी उसको तमीज दे-दो
आदत सुधार लें वो अमिट पहचान लेकर

मजबूत हैं इरादे तो बात ही नहीं है
वरना चले-चलोगे कैसे थकान लेकर

कोशिश करे सभी जन ,ऊंचा ललाट पाये
गौरव पलों में घूमे सब , हिन्दुस्तान  लेकर
सुशील यादव
१३.६.१८

दुनिया रंग -बिरंगी


२*८ दुनिया रंग-बिरंगी

दुनिया रंग-बिरंगी देखो
फिर से चाल फिरंगी देखो
हम हैं अपने सूबे में खुश
बारा- मासी तंगी देखो
#
आज यही केवल सच्चाई
है भाई का नाम कसाई
हम ख़र्चे हैं आना जिस पे
वो छोड़े न हिसाबी पाई
#
#
हम पर आग बबूला होते
हम क्या सावन झूला होते
मौसम की है मार सभी को
सब को परखो सब से सीखो
#

पीतल को समझा था सोना
मिटटी को था मिटटी होना
लाख सजा लो घर को चाहे
प्यार बिना चमके कब कोना

#

 

१५.६.१८

वीरांगना लक्ष्मीबाई


वीरांगना रानी लक्ष्मी बाई के  बलिदान दिवस १८जून पर
##

तुम रक्षक हो सीमा-प्रहरी ,पथ में आगे बढे चलो
पहाड़ दुर्गम  को लाघों,दुरूह घाटी चढ़े चलो
मानवता के तूल तुम्ही  ,मिट्टी के हो कारीगर
बिन मन्दिर पूजे जावो ,मूरत वो भी  गढ़े चलो
#
एक दिया तम में रखना ,एक जले  आंधी  आगे
हो अडिग विश्वास तुम्हारा ,सर-पैर ले दुश्मन भागे
सीमा से जब वापस आओ ,माँ के लाल बहन-वीरा
हर  सुहागन दृग देखना , कैसे सोये दिन जागे
#
शांति जिसने जकड़ लिया, 'पर' अहिंसा के हैं काटे
मक्कारी  चादर ओढ़े ,परचम जिहाद के  बांटे
मजहब के चण्डालों का,मखौल क्यों नहीं  उड़ाये ,
इनकी मकसद के जड़ को,क्यों न अभी कतरें- छांटे
#
लक्ष्मी-बाई सा साहस ,अपने भीतर आप भरो
जीवन शब्दकोश निकालो ,कायरता से काश डरो
लोहा लेने की बारी , कतार पीछे  क्या रहना
जन-जन में चिश्वास जगे ,आपतकाल   तुझे    लड़ना
#
मर्दानों की शक्ति लेकर , एक रानी  रण में आई
उम्र की कोमल काया थी ,उतरी न थी  तरुणाई
अंग्रेजो को रण में तब ,कैसे  खूब छकाती थी
वो थी  रानी झाँसी या ,संदेश भरी  पाती थी
सुशील यादव
16.6.18

है कौन जो

2212 2212 1222 2
अहसास ....!

है कौन,जो तन्हाई को सदा देता है
मुझको कभी,बन के सबा हिला देता है

मैं सुनने का आदी नहीं,मगर कानो में
सुर-ताल-नगमा सा कहीं,सुना देता है

हिलती रही दीवार पर,तेरी परछाई
अहसास, अक्स कई तरह,बना देता है

जिस राह पर होती रही मुलाकाते,आज
उस रास्ते पहरा कोई बिठा देता है

गुमनाम से अँधेरे हम निकल भी आये
हालात जीना, हाल हर सिखा देता है

अंजान सा बैठा छिपा हुआ नासूर अब
खुद हरकतों अपनी कभी डरा देता है

मत सोचना, मेरे कदम के नक्शो चलना
जंगल करीब यकबयक पहुचा देता है

है तलब हमको तेरी किया क्या जाए
ये नाव गलत सुराख ही डुबा देता है

मजबूरियां है या समय फरेबी जाने
दीवार साझा बीच में उठा देता है

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग
10.7.17


मश्वरा


गलत राय गलत मशवरा देने वाले
मुंसिफी की आड़ फतवा देने वाले
बिजलियाँ सौ -सौ गिरे तेरे घरों में
ओ जन्नते काश्मीर जला देने वाले
सुशील यादव

दहशत ,दीवारें और  अदावत केवल
सीख लिए होते काश  बगावत केवल
माथा सहजादों का है  झुकते देखा
जिनका  मकसद होता मोहब्बत केवल
##

खोज लिया जिसने

 लिया जिसने .....

जब दुश्मन जाने पहचाने हैं
यारो हम भी बहुत सयाने हैं

लेकर अपनी बस राम-कहानी
समझौतों के सहज निशाने हैं

मुस्कान मिली तो जीवन छलका
यूँ गम के सौ-सौ अफसाने हैं

जग को दे न सके अपना परिचय
कहने के कई लाख बहाने हैं

किसने हमको कब तौला-परखा
हम बीते इतिहास पुराने हैं

खोज लिया जिसने दिल को भीतर
पाए असल 'सुशील' खजाने हैं

सुशील यादव
14.7.17

सुशील जो भुला

'सुशील' जो भूला ....

दिल रखने को तुझे दिया क्या है
तू ही बता कि फ़ायदा क्या है

यारा बुझा दिया चिरागो को
जलता हुआ यहाँ बचा क्या है

मुहताज हैं खुदा यहाँ हम भी
ये मुफलिसी सिवा मिला क्या है

अब तिलस्मी लगी हमे दुनिया
देखे ये  फैलता नशा क्या है

चारो तरफ है भीड़ का उन्माद
नारो के बीच निकलना क्या है

मजबूरियों 'सुशील' जो भूला
अब तो बता सही पता क्या है

सुशील यादव दुर्ग

लोग कहते अब

लोग कहते अब.....

अब यहां ना आशियाँ- परिंदा बचा
यार बारूद का धुँआ बस धुँआ बचा

ले गया फिर  छीन बस्ती कोई अमन
डबडबायी आँख आँगन कुँआ बचा

कौन सूरत  आप  पहचानता यहाँ
पास किसके आजकल  आइना बचा

वो सभी पल याद हमको  करीब से
वो जहां बस  आदमी  झुनझुना बचा

हाँ मुझे भी लौटना है 'सुशील' पास
लोग कहते अब वहीँ मन 'घना' बचा

सुशील यादव दुर्ग
2122   2122  1212

शब्द

शब्द ....

जाने किन पैरों पर
खड़ा रहता है
आसमान
दिन रात
बिना थके हुए ....?
मेरे
तुम्हारे
शब्दों को अब
बैसाखी की
जरूरत
महसूस होती है ...
हम आहत-
अपाहिज मन से
बोलते हैं या
सहानुभूतियों की किताब
उस जगह से खोलते हैं
जहां पृष्ठ भर
हाशिये के सिवा
होता नहीं कुछ
#
हम सिद्धार्थ की तरह
खोजने
निकल पड़ते हैं
यथार्थ ...
मगर हमारा
'यक्ष -प्रश्न'

हमे
घेरता है
बरबस

हम आकाश की बैसाखी
उसके पांव
उसकी जमीन को
तलाशने में जुट जाते  हैं,
न जाने किन पैरों पर खड़ा रहता है
आसमान ...?
#
काश ,
हमे पहले
बता दिया गया होता
आसमान कुछ नहीं
एक हवा है
धुँआ है
शून्य  है
और
हवा को
धुँआ को
शून्य  को
बैसाखी की जरूरत नहीं होती
वह अपने
शास्वत वजूद पर
स्वयं चलता है
दिन -रात बिना थके हुए
#
काश हमारे शब्द
यूँ ही
हवा की तरह
धुँआ की तरह
शून्य की तरह
बिना पैरों
चलते
तैरते
अनवरत
लगातार
संप्रेषित होते
बिना किसी बैसाखी के

सुशील यादव दुर्ग

समझौते की सूरत

222222222

समझौते की कुछ सूरत देखो
है किसको कितनी ज़रूरत देखो

ढेर लगे हैं आवेदन के अब
लोगों की अहम शिकायत देखो

लूटा करते, वोट गरीबों के
जाकर कुनबों की हालत देखो

भूखों मरते कल लोग मिलेंगे
रोटी होती क्या हसरत देखो

फैला दो उजियारा चार तरफ़
एक दिए की कितनी ताक़त देखो

साहित्य शिल्पी में


मुहब्बत में गर

१२२ १२२ १२२ १२२
सदी एक लगे है
मुहब्बत में गर ये तल्खियाँ न होती
जमाने में उडती तितलियाँ न होती

नहीं रोकता राह, बादल उजाला
सुर्ख़ियां सुबह की बदलियाँ न होती

इसी घर अहाते में छुप कर रहा है
जहाँ अब जरूरत बिजलियाँ न होती

ख्यालों में आने लगे आजकल वो
भुला बैठने जिसको खुशियाँ न होती

कमा के रखे माल असबाब सारे
सदी एक लगे है, गिनतियाँ न होती

सुशील यादव दुर्ग

आम आदमी की नजर

२१२२ २१२२ २ १२ २ २
चेहरे क्यों हैं मलीन,.....
जिन्दगी को आदमी, आम की, नजर देखो
रख कभी सीने , वजन कोई , पत्थर देखो

डूबने लग जाए, स्वयं ही वजूद कभी
लहर उठती,रह किनारे, समुंदर देखो

आग नफरत की लगाकर, जो छिपा करते
उतरता 'खूनी' वहां कब , खंजर देखो

जो हमे बेख़ौफ़ मिलते, हर-कहीं हरदम
चेहरे क्यों हैं मलीन, आँखे भी अन्दर देखो

एक तमाशा सा, हुआ तेरे शह्र में कल भी
आज की, ताजी फिजा क्या है ,खबर देखो
@@@१८.१२.१५ ....सुशील यादव ..

कभी नींद कभी

१२२ १२२ १२२ १२२
कभी नीद तो कभी ख़्वाब छिनता है
वो खिलने से पहले गुलाब छिनता है

मेरी उतरन कभी पहनता रहा जो
वही मुझसे मेरा नकाब छिनता है

कहाँ क्या बुरा जो मेरे नाम जुड़ता
जमाना मुझी से खिताब छिनता है

अगर तू कहे आसमा ला के दे दूँ
हथेली कोई आफताब छिनता है

बुझे लोग, बदहाल बस्ती बीच लगता
यहाँ याद का हर हिजाब छिनता है

सुशील यादव

रंगों में बनत गया


रंगों में बट गया...
#
दर्द का दबाव
बढ़ गया ऐ दोस्त
पहले सा
खुशियों का
आयतन नहीं है
#
लुप्त हो गई
पवित्र पूजा की थाली
मन की श्रद्धा
अक्षत कुमकुम लाली
शेष कहें क्या बच पाया
केवल कांसा
बर्तन नहीं है
#
न बदली हवा
न मौसम का मिजाज
वही जगह वही जमीन
लोग वही ,
मगर जब से बदली
'रंगों'  की परिभाषा
क्यूँ लगता मेरा
वतन नही है ?
##
सुशील  यादव
  

मसखरी युग

मसखरी युग

निगाहें हटा के ज़माना चला है
गरीबो यही तो बहाना चला है

बताओ कि है आदमी का वजूद क्या
घिरा आप ही खुद निशाना चला है

बचा के रखें क्या विरासत की खातिर
कगार आजतक आब-दाना चला है

मुकदमो में जीतें कि हारें बराबर
घड़ी-फैसला मुंसिफ-थाना चला है

हमे गुदगुदा के छिपा कौन बोलो
कहीं मसखरी युग पुराना चला है
सुशील यादव
१३६१८

कहाँ तक छुपाएं

कहाँ तक छुपाये,,,?

कहाँ तक छुपाएं ,किस किस से छुपाएं
फटी कमीज हो गई ,तार-तार जिंदगी

  याचना में जब भी
हाथ ये उठाये
लोग हमें शातिर
चोर ही ठहराए

कहाँ तक बताये किस किस को बताये
पार पर ही डूबी , बार -बार जिंदगी

हौसलो की पतंग
जब से कटी है
राहगीरों ने डोर
आस्था लुटी है

कहाँ  तक मनाएं किस -किस को मनाएं
बची कहाँ है अब , सार -सार जिंदगी

पिछले कुछ दिन से
मन को हम झांकते
ईमान  की तुला में
कद- वजन नापते

कहाँ तक बचाये, किस -किस को बचाएं
चक्रव्यूह में घिरी ,धार-धार जिंदगी

कलयुग में होता
हमको  पछतावा
दुष्कर्मो का जब
फूटता है लावा

कहाँ तक हटाएँ, किस-किस को हटाएँ
ईंट-रोडे ये हैं बने ,द्वार-द्वार जिंदगी

सुशील यादव
१६.जुलाई १८

बुन रहे केवल अनुभव

बुन रहे केवल अनुभव

मेरी नियति का नीड़ न जाने
पायेगा कब प्रिय कलरव ...?
तुम प्रकृति या भीड़ से जाने
लौट आओ कब बन उत्सव ..?

मेरी दुविधा हरदम
चर्चित रहती है |
कोलाहल की बाढ़ लिए ,
अधमरी
नदिया बहती है |
पीड़ा ऐसी मन की मानो
हो जननी उद्धत  प्रसव ...

प्रयोग कितना चल पायेगा
जगत को धोखा छल पायेगा
मर्यादा ,लाज बचाने खातिर
शब्द सार्थक, निकल पायेगा ...?

संयोग के ताने-बाने में बुन रहे केवल अनुभव |

नहीं शिकायत कुछ भी लेकिन
बात तो पूरी कर जाते .
गुम हुए थे मेले में
मिलन बेला क्या  मुकर जाते
अगर आता सुधरना हमको
अभिनय नहीं करते अभिनव

सुशील यादव
१६.जुलाई १८
 

आँखी के कोन्टा


आखी के कोंटा लुकाय होबे ना
पीरा ल अंगना सुताय  होबे ना

कहाँ बिलम गे मोर सुघ्घर परेवा
जाते जावत, कहु, बताय होबे ना
तोर चिन्हारी देखत ले रोवव्

नइ भावे परसे परसाए  जेवना
बरा सोहारी तैं, अघाय होबे ना
  कहाँ बिलम गिस  .....
पीरा ल अंगना सुताय  होही ना
आखी ल कोंनटा , लुकाय होही ना

कहाँ बिलम गिस  तोर सुघ्घर परेवा
जाते जावत, कछू , बताय होही  ना

तोला नइ भावे  परसाए  जेवना
खावत सोहारी वो ,अघाय होही  ना

बोहे हस, अक्केला, संसो के टुकनी
संग देवैय्या, दुआरी  आय होही ना

लबरा के गोठ म, ‘कबरा’ ल चिन्ह ले
अन बन के गारा, मताय होही ना

ये बच्छर  देवारी, “टिकली फटाका”
महंगाई टोनही फुस्फुसाय  होही ना

सुशील यादव
     
 

कबीरा

2122 2212  2212  2122
हर किसी के आगे ....

आँख में आंसू ,तलब का जखीरा ले के क्या करोगे
हर किसी के आगे अपना, रोना ले के  क्या करोगे

पाँव में हो जंजीर, तो वाजिब नहीं सोचना ये
ढोल-ढपली, या हाथ मंजीरा ले के क्या करोगे

सितम के कितने मायने होंगे, पता था किसे तब
महज फतवो में आदमी, हीरा ले के क्या करोगे

लेखनी में, बाजार में, बलिदान में याद आते
सूर- मीरा, या सिरफिरा  कबिरा, ले के क्या करोगे

वो किताबो के लोग थे, इतिहास के सब पुरोधा
दरअसल वो रुतबा ,वही दर्जा ले के क्या करोगे

हो नहीं चरित्र में कोई बदलाव जब आदमी के
घर दिखावा तुलसी कहीं चौरा ले के क्या करोगे

ऊंट तक पहुँचानी है तुमको बात अपनी  सुशील जी
मुठ्ठियों बोलो कहने भर जीरा ले के क्या करोगे

सुशील यादव दुर्ग

आजादी के क्या माने...?

साया हट गया है फिर नया बरगद तलाशिये
मेरी सरकती, हुई है जमी, सरहद तलाशिये

माहिर घूंट कडुए पीने में, सुकरात चल दिया
पीता आदमी है खून महज,शहद तलाशिये

है कारीगरी का ये नमूना साफ जान लो
ये मंदिर ढके या मस्जिद ढके गुंबद तलाशिये

उनके पांव न उठाए उठेंगे अब जमीन से
कलयुग में सियासी अमन के अंगद तलाशिये

लिए परचम जिहादी घूमता चारों तरफ यहां
आजादी के क्या माने भला मकसद तलाशिये
सुशील यादव

धुआं -धुआं ,है शहर में, हवा नहीं है
मैं जो बीमार हूं ,मेरी दवा नहीं है

तलाश उस शख्स की, है अभी जारी
जिसके पांव , छाले छाले जो थका नहीं है

कहां तक लादकर, हम बोझ को चले
बनके श्रवण, मां-बाप को पूजा नहीं है

दंगो के शहर, दहशत लिए जीता हूं मैं
कोई हादसा करीब से, छुआ नहीं है

लहरो से मिटी रेतों की इबारत
सीने से मिटे नाम जो लिखा  नहीं है


1413 characters
258 words