Sunday, 12 August 2018

मुहब्बत में गर

१२२ १२२ १२२ १२२
सदी एक लगे है
मुहब्बत में गर ये तल्खियाँ न होती
जमाने में उडती तितलियाँ न होती

नहीं रोकता राह, बादल उजाला
सुर्ख़ियां सुबह की बदलियाँ न होती

इसी घर अहाते में छुप कर रहा है
जहाँ अब जरूरत बिजलियाँ न होती

ख्यालों में आने लगे आजकल वो
भुला बैठने जिसको खुशियाँ न होती

कमा के रखे माल असबाब सारे
सदी एक लगे है, गिनतियाँ न होती

सुशील यादव दुर्ग

No comments:

Post a Comment