१२२ १२२ १२२ १२२
कभी नीद तो कभी ख़्वाब छिनता है
वो खिलने से पहले गुलाब छिनता है
मेरी उतरन कभी पहनता रहा जो
वही मुझसे मेरा नकाब छिनता है
कहाँ क्या बुरा जो मेरे नाम जुड़ता
जमाना मुझी से खिताब छिनता है
अगर तू कहे आसमा ला के दे दूँ
हथेली कोई आफताब छिनता है
बुझे लोग, बदहाल बस्ती बीच लगता
यहाँ याद का हर हिजाब छिनता है
सुशील यादव
कभी नीद तो कभी ख़्वाब छिनता है
वो खिलने से पहले गुलाब छिनता है
मेरी उतरन कभी पहनता रहा जो
वही मुझसे मेरा नकाब छिनता है
कहाँ क्या बुरा जो मेरे नाम जुड़ता
जमाना मुझी से खिताब छिनता है
अगर तू कहे आसमा ला के दे दूँ
हथेली कोई आफताब छिनता है
बुझे लोग, बदहाल बस्ती बीच लगता
यहाँ याद का हर हिजाब छिनता है
सुशील यादव
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