Sunday, 12 August 2018

मसखरी युग

मसखरी युग

निगाहें हटा के ज़माना चला है
गरीबो यही तो बहाना चला है

बताओ कि है आदमी का वजूद क्या
घिरा आप ही खुद निशाना चला है

बचा के रखें क्या विरासत की खातिर
कगार आजतक आब-दाना चला है

मुकदमो में जीतें कि हारें बराबर
घड़ी-फैसला मुंसिफ-थाना चला है

हमे गुदगुदा के छिपा कौन बोलो
कहीं मसखरी युग पुराना चला है
सुशील यादव
१३६१८

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