मसखरी युग
निगाहें हटा के ज़माना चला है
गरीबो यही तो बहाना चला है
बताओ कि है आदमी का वजूद क्या
घिरा आप ही खुद निशाना चला है
बचा के रखें क्या विरासत की खातिर
कगार आजतक आब-दाना चला है
मुकदमो में जीतें कि हारें बराबर
घड़ी-फैसला मुंसिफ-थाना चला है
हमे गुदगुदा के छिपा कौन बोलो
कहीं मसखरी युग पुराना चला है
सुशील यादव
१३६१८
निगाहें हटा के ज़माना चला है
गरीबो यही तो बहाना चला है
बताओ कि है आदमी का वजूद क्या
घिरा आप ही खुद निशाना चला है
बचा के रखें क्या विरासत की खातिर
कगार आजतक आब-दाना चला है
मुकदमो में जीतें कि हारें बराबर
घड़ी-फैसला मुंसिफ-थाना चला है
हमे गुदगुदा के छिपा कौन बोलो
कहीं मसखरी युग पुराना चला है
सुशील यादव
१३६१८
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