Sunday, 12 August 2018

शब्द

शब्द ....

जाने किन पैरों पर
खड़ा रहता है
आसमान
दिन रात
बिना थके हुए ....?
मेरे
तुम्हारे
शब्दों को अब
बैसाखी की
जरूरत
महसूस होती है ...
हम आहत-
अपाहिज मन से
बोलते हैं या
सहानुभूतियों की किताब
उस जगह से खोलते हैं
जहां पृष्ठ भर
हाशिये के सिवा
होता नहीं कुछ
#
हम सिद्धार्थ की तरह
खोजने
निकल पड़ते हैं
यथार्थ ...
मगर हमारा
'यक्ष -प्रश्न'

हमे
घेरता है
बरबस

हम आकाश की बैसाखी
उसके पांव
उसकी जमीन को
तलाशने में जुट जाते  हैं,
न जाने किन पैरों पर खड़ा रहता है
आसमान ...?
#
काश ,
हमे पहले
बता दिया गया होता
आसमान कुछ नहीं
एक हवा है
धुँआ है
शून्य  है
और
हवा को
धुँआ को
शून्य  को
बैसाखी की जरूरत नहीं होती
वह अपने
शास्वत वजूद पर
स्वयं चलता है
दिन -रात बिना थके हुए
#
काश हमारे शब्द
यूँ ही
हवा की तरह
धुँआ की तरह
शून्य की तरह
बिना पैरों
चलते
तैरते
अनवरत
लगातार
संप्रेषित होते
बिना किसी बैसाखी के

सुशील यादव दुर्ग

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