Sunday, 12 August 2018

कबीरा

2122 2212  2212  2122
हर किसी के आगे ....

आँख में आंसू ,तलब का जखीरा ले के क्या करोगे
हर किसी के आगे अपना, रोना ले के  क्या करोगे

पाँव में हो जंजीर, तो वाजिब नहीं सोचना ये
ढोल-ढपली, या हाथ मंजीरा ले के क्या करोगे

सितम के कितने मायने होंगे, पता था किसे तब
महज फतवो में आदमी, हीरा ले के क्या करोगे

लेखनी में, बाजार में, बलिदान में याद आते
सूर- मीरा, या सिरफिरा  कबिरा, ले के क्या करोगे

वो किताबो के लोग थे, इतिहास के सब पुरोधा
दरअसल वो रुतबा ,वही दर्जा ले के क्या करोगे

हो नहीं चरित्र में कोई बदलाव जब आदमी के
घर दिखावा तुलसी कहीं चौरा ले के क्या करोगे

ऊंट तक पहुँचानी है तुमको बात अपनी  सुशील जी
मुठ्ठियों बोलो कहने भर जीरा ले के क्या करोगे

सुशील यादव दुर्ग

आजादी के क्या माने...?

साया हट गया है फिर नया बरगद तलाशिये
मेरी सरकती, हुई है जमी, सरहद तलाशिये

माहिर घूंट कडुए पीने में, सुकरात चल दिया
पीता आदमी है खून महज,शहद तलाशिये

है कारीगरी का ये नमूना साफ जान लो
ये मंदिर ढके या मस्जिद ढके गुंबद तलाशिये

उनके पांव न उठाए उठेंगे अब जमीन से
कलयुग में सियासी अमन के अंगद तलाशिये

लिए परचम जिहादी घूमता चारों तरफ यहां
आजादी के क्या माने भला मकसद तलाशिये
सुशील यादव

धुआं -धुआं ,है शहर में, हवा नहीं है
मैं जो बीमार हूं ,मेरी दवा नहीं है

तलाश उस शख्स की, है अभी जारी
जिसके पांव , छाले छाले जो थका नहीं है

कहां तक लादकर, हम बोझ को चले
बनके श्रवण, मां-बाप को पूजा नहीं है

दंगो के शहर, दहशत लिए जीता हूं मैं
कोई हादसा करीब से, छुआ नहीं है

लहरो से मिटी रेतों की इबारत
सीने से मिटे नाम जो लिखा  नहीं है


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