Sunday, 12 August 2018

आँखी के कोन्टा


आखी के कोंटा लुकाय होबे ना
पीरा ल अंगना सुताय  होबे ना

कहाँ बिलम गे मोर सुघ्घर परेवा
जाते जावत, कहु, बताय होबे ना
तोर चिन्हारी देखत ले रोवव्

नइ भावे परसे परसाए  जेवना
बरा सोहारी तैं, अघाय होबे ना
  कहाँ बिलम गिस  .....
पीरा ल अंगना सुताय  होही ना
आखी ल कोंनटा , लुकाय होही ना

कहाँ बिलम गिस  तोर सुघ्घर परेवा
जाते जावत, कछू , बताय होही  ना

तोला नइ भावे  परसाए  जेवना
खावत सोहारी वो ,अघाय होही  ना

बोहे हस, अक्केला, संसो के टुकनी
संग देवैय्या, दुआरी  आय होही ना

लबरा के गोठ म, ‘कबरा’ ल चिन्ह ले
अन बन के गारा, मताय होही ना

ये बच्छर  देवारी, “टिकली फटाका”
महंगाई टोनही फुस्फुसाय  होही ना

सुशील यादव
     
 

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