Sunday, 12 August 2018

बुन रहे केवल अनुभव

बुन रहे केवल अनुभव

मेरी नियति का नीड़ न जाने
पायेगा कब प्रिय कलरव ...?
तुम प्रकृति या भीड़ से जाने
लौट आओ कब बन उत्सव ..?

मेरी दुविधा हरदम
चर्चित रहती है |
कोलाहल की बाढ़ लिए ,
अधमरी
नदिया बहती है |
पीड़ा ऐसी मन की मानो
हो जननी उद्धत  प्रसव ...

प्रयोग कितना चल पायेगा
जगत को धोखा छल पायेगा
मर्यादा ,लाज बचाने खातिर
शब्द सार्थक, निकल पायेगा ...?

संयोग के ताने-बाने में बुन रहे केवल अनुभव |

नहीं शिकायत कुछ भी लेकिन
बात तो पूरी कर जाते .
गुम हुए थे मेले में
मिलन बेला क्या  मुकर जाते
अगर आता सुधरना हमको
अभिनय नहीं करते अभिनव

सुशील यादव
१६.जुलाई १८
 

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