रंगों में बट गया...
#
दर्द का दबाव
बढ़ गया ऐ दोस्त
पहले सा
खुशियों का
आयतन नहीं है
#
लुप्त हो गई
पवित्र पूजा की थाली
मन की श्रद्धा
अक्षत कुमकुम लाली
शेष कहें क्या बच पाया
केवल कांसा
बर्तन नहीं है
#
न बदली हवा
न मौसम का मिजाज
वही जगह वही जमीन
लोग वही ,
मगर जब से बदली
'रंगों' की परिभाषा
क्यूँ लगता मेरा
वतन नही है ?
##
सुशील यादव
No comments:
Post a Comment