Sunday, 12 August 2018

रंगों में बनत गया


रंगों में बट गया...
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दर्द का दबाव
बढ़ गया ऐ दोस्त
पहले सा
खुशियों का
आयतन नहीं है
#
लुप्त हो गई
पवित्र पूजा की थाली
मन की श्रद्धा
अक्षत कुमकुम लाली
शेष कहें क्या बच पाया
केवल कांसा
बर्तन नहीं है
#
न बदली हवा
न मौसम का मिजाज
वही जगह वही जमीन
लोग वही ,
मगर जब से बदली
'रंगों'  की परिभाषा
क्यूँ लगता मेरा
वतन नही है ?
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सुशील  यादव
  

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