Thursday, 15 September 2022

अलगू जुम्मन का rona


122२    1222  1222
वही बस्ती, वही टूटा  खिलौना है
वही अलगू,मिया जुम्मन का रोना है
#
बना जाते सलीके से मुझे लायक
ये मिटटी अगरचे ढूढो कि सोना है

कहाँ बनते यहाँ रिश्ते सलीके  से
किसे मोती कभी आया पिरोना है
#
वफा के बीज डालो ये पता तो चले
खफा मौसम रहा या नसीब बौना है
#
उसे पैगाम दे दो, खैरियत है मेरी
मिसाल के तौर सुइयां जिसे  चुभोना है
#
तरीके से मिला करती खुशी कल तक
अभी उस दौर का ख़्वाब ही सलोना है
#
सुशील यादव दुर्ग छत्तीसगढ़

वादों की रस्सी

 

वादों की रस्सी मे तनाव आ गया है
मंदिर के चर्चे हैं चुनाव आ गया है

गुस्ताख स्वागत  माफ करना हुजूर
चेहरे पे मसलन खिचाव आ गया है

रोगग्रस्त थी उफ ये नदी पांच साल से
अब की बारिश कैसा बहाव आ गया है

ये लोग उठाने से कतरा रहे परचम
इरादों मे इनके  बदलाव आ गया है

खबर हमें भी थी कोई लहर उठेगी
समुन्दर के रस्ते कटाव आ गया है

लादेन जा रहा था अपने पैरो चल के
पुतिन जो मिला ठहराव आ गया है
😁
हुकूमत की ऐसी लग गई है आदत
सच लगे बेचने कि भाव आ गया है
##

चौपाई

 चौपाई :बरसात में ....


पानी-पानी, आया पानी |

 गर्मी दूर भगाया पानी ||

सबने खूब निकाले छाते |

 रंग-बिरंगे, काले छाते ||


सुख की गिनती कौन करेगा,

अब जो भीतर भीग डरेगा | 

यूँ ना देखी  होगी बारिश ,

सहमी-विनती और गुजारिश |


लो कृषको का मन हर्षाया,

मेघ-घटा, उमड़- घुमड़ आया |  

हल लेकर ये  खेतों निकले,

मिटटी कोना- सोना पिघले |


हो जाती हर शाम-सुहानी,

देखो छेड़  अतीत कहानी |

बचपन की नावों का मिटना ,

भीगे-भीगे  आकर  पिटना | 


बारिश पानी बहता जाता ,

सूखा-नाला भी उफनाता |

किन्तु हमी-हम  ठहरे होते ,

नम रिश्ते भी गहरे होते |


सुशील यादव दुर्ग

खजाना

 

1222 1222 1222 22
गज़ल
#
जमीनों में छिपा रक्खा खजाना मिल जाए
जुदा बरसों कोई साथी पुराना मिल जाए
#
हमें ख़त क़े नहीं मिलते पढ़े होने का सबूत
फकत मजनून भाँपे हों,हर्जाना मिल जाए
#
नहीं मिलते कभी शहरों सहज रिश्ते जन्मों क़े
बनावट क़े विज्ञापन कुछ बहाना मिल जाए
#
गली में जो गुजरती शाम क्या कहने उनके
मेरी तकदीर मौसम वो सुहाना मिल जाए
#
मुकम्मल ही नहीं खाना -बदोशी क्या कीजे
खुदा की बारहा रहमत ठिकाना मिल जाए

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग छत्तीसगढ़
7. 6.22

इस जंगल मैं

 इस जंगल में आग न लगती

**

ये दिन काश हमारे होते

हम आंखों के तारे होते


दूर न होती मंजिल अपनी

पास कहीं दिल हारे होते


बचपन जाओ ढूंढ के लाओ

अक्ल के दुश्मन सारे होते


अधिकार बिना अब क्या जीना

छीन झपट के चारे होते


तुम भी अफसोस किया करती

दांव लगा जब हारे होते


हमको डूबना आ ही जाता

यदि मालूम  किनारे होते


निकले थे घर छांव छोड़कर

ऐसे ही बंजारे होते


खुली किताब समझ के पढना मन 

चाहे वारे न्यारे होते 


इस जंगल में आग न लगती

कुछ दिन और गुजारे होते


खौफ जदा पेशानी में भी

मानिंद बर्फ   नजारे होते


हमको लगता तेरी खातिर

हम नजदीक सहारे होते


@@@

वो जो

 

2122 2122 1222
वो जो मोहब्बत की तकदीर लिखता है
किसी-किसी के हाथ जागीर लिखता है
#
कोई चाहे कुछ गरम कोई ठंडा यूं
मांग के माफ़िक वो तासीर लिखता है 
#
साथ चलते भाँप लेते हवा का रुख
नाम उनके वक़्त ही समीर लिखता है
#
  हो जिसे अँधेरे का खौफ जीवन भर
  बस खुदा ही समझ तनवीर लिखता है  
#
हम रहें जिसे पाने आवेग  से आतुर
ये जमाना अब हमें अधीर लिखता है
#
दर्द के हर कोण की नाप ले जीता
वो ख़लाओ तेरी तस्वीर लिखता है

सुशील यादव

 नज्म : :हर्फ -हर्फ फूल 


अब तो वो कतरा  के निकल जाता है

जाने क्यूँ खुद शरमा के निकल जाता है


अब काटता  चक्कर  नहीं कहीं गली के

अगर मिले नजर चुरा के निकल जाता है


उसकी हालत पे मै तरस खाऊं या वो 

लम्हा लम्हा  सता के निकल जाता है


काटने दौड़ती है रात अजीब तन्हाइयाँ 

जो सिल्वट बिछा के निकल जाता है


मुझे मालुम है अपनी खता खामियाँ

यादें यूँ जंगल ऊगा के निकल जाता है


किताब मे नजर गड़ाऊं भी  मैं कहाँ

हर्फ हर्फ फूल दबा के निकल जाता है


@@#