Wednesday, 20 June 2018

.एक एकलव्य
##
अँधेरे में मैं अब भी
तीर चला लेता हूँ
और सही मानो तो सही
निशाना लगा लेता हूँ |
तुम्हे जरूरत होगी
या तो मेरे अंगूठे की या
पूरा हाथ मांग लोगे ..?
***
तुम नहीं थे मेरे आदर्श
नहीं झुकाया था सर तुम्हारे आगे
तुमने नहीं दी थी मुझे दिशाएँ
तुम्हारी उंगली थाम के भी एक पग
चला नहीं था मैं...
नहीं किया था अनुशरण
तुम्हारे किसी दिकबोध का
तुम्हारे पग चिन्हों को ढूढते
नहीं गया था दूर अरण्य, दलदल  में
पता नहीं क्यों
बावजूद इसके
तुम्हे लगता रहा
मेरी उपलब्धियों में कहीं न कहीं हो तुम
केवल तुम
**
अपनी इस सोच के दायरे से
जरा भी नहीं डिगते तुम
साधिकार
आ जाते हो
सुबह -शाम  दरवाजे पर
इस तगादे में कि,
तुम्हे काट कर दे दूंगा
मैं
अपना अंगूठा
**
मेरे पिता ,
तुम्हे मालुम है आदमी जब
भूख की
अहम् की
अस्तित्व की
लड़ाई में
जब होता है
उसके सामने बौने हो जाते हैं
सभी किरदार
वे खुद लिख लेता है
अपने भोगे
यथार्थ का इतिहास
उसे याद हो आये
पुराने लनम की कोई बात
खून से लथपथ अंगूठा
अंगूठे के बीच
प्रत्यंचा में अब -तब छूटने को
तीर की नोक पर उसकी
अपनी आजीविका ...
***
सुशील यादव


२. ये वो सुबह तो नहीं ,
**
ये वो सुबह तो नहीं ,
जिसकी बांग
किसी मुर्गे ने दी हो
और
जाग गया हो
सोते से
सारा गाँव ..
वो सुबह ,कि
घण्टियाँ बजाते
चल रहे हो बैल
किसी खेत की पगडंडियों पर
और हुर्र की आवाज से चौंक कर
उड़ गई हो चहचहाट करती चिड़ियाएं
वही मस्जिद की किसी मीनार पर जा बैठते
बरबस गूंज गई हो अजान
वो सुबह जब
शब्द -कीर्तन की आवाज संग उठने को
आतुर हुई हो
सूरज की पहली आभा वाली किरणे
या जाड़े में ठिठुरते
रामायण की चौपाई बांचता
बगल से गुजर गया हो
कोई पण्डित
ये सुबह वो तो नहीं
जब
अलगू और जुम्मन
एक ही छाते में
कुछ भीगते, कुछ भागते
पड़ौस के गाँव से
बुला लाये हो डाक्टर
और बचा ली हो
प्रसव वेदना से कराहती किसी
गऊ माता की जान
ये वो सुबह भी नहीं
जब
झुर्रियों भरे चरहरों से
पर्दा करती
चुपचाप निहरे
पानी भरने
निकल रही हो औरतें
या पीछे ,नँगे-अधनंगे बच्चे
रात की बासी रोटियां लिए
माँ की घुड़कियों सुन
खपरैल के घरों को लौट रहे हो
***
शायद गाँवों में
इन दिनों भी
ऐसी सुबह हुआ करती हो
अम्न,चैन ,भाई चारे की
पर रोना तो ये है
मेरी नींद
इन दिनों
देर से खुलती है
***
सुशील यादव


२१22 २१२२   २१२
अब यहां ना आशियाँ परिंदा बचा
धूल के  साये बचे,या धुँआ बचा

ले गया छीन कर बस्ती से अमन
आंसुओ खारा-सफेद कुँआ बचा

कौन वाकिफ है भली  सूरत यहाँ
किसके पास कहो  आइना बचा

है अदावत की खड़ी दीवार बस
आखिरी पहचान मानो निशा बचा

बीते कल को तुम भुला बैठे कैसे
स्लेट-माजी खूब सारा लिखा बचा



२ २ १ २   २ २ १ २  २1२
वो कुछ दिनों से ....
वो कुछ दिनों से इधर नहीं बोलता
मुझे चाहता है मगर नहीं बोलता

खोया रहे अपनी धुनों में मगन
उसपे नशा कोई जहर नहीं बोलता

शायद चली तलवार किसी बात पर
अपना कभी ख़ंजर नहीं बोलता

कितनी कवायद की तुझे भूलने
हमसे हमारा जिगर नहीं बोलता

तेरी  महक रहती है फूलो यहाँ
यूँ खिल के तो इतर नहीं बोलता

कुछ समझ में आने लगी बात फिर
तुमसे भले बेहतर नहीं बोलता
सुशील यादव


12२ 12२   12२ 12२
कहीं चोट  खाए सवालो घिरे हैं
बंधे हम  मुस्काए सवालो घिरे हैं

जनाजा किसी गैर का और शामिल
रहे मुह  छिपाए सवालो घिरे हैं

नहीं बात बनती दिखे तो समझिये
बुद्दू लौट  आए सवालो घिरे हैं

जिसे नींद में चलने की आदत नहीं
तजुर्बे भुनाए, सवालो घिरे हैं

जनाजे को उनके कंधा क्या दिये हम
रहे  सर चढ़ाए ,सवालो घिरे हैं

नहीं जानता  था सबूतों में शामिल
दस्ताने छुपाए ,सवालो घिरे हैं
सुशील यादव
२. ४. १८
12२ 12२   12२ 12२
कहीं चोट  खाए हैं मेरी तरह वो
बंधे हाथ  मुस्काय हैं मेरी तरह वो

  जनाजा किसी गैर का और शामिल
  रहे मुह  छिपाए हैं मेरी तरह वो

नहीं बात बनती दिखे तो समझिये
बुद्दू लौट  आए हैं मेरी तरह वो


जिसे नींद में चलने की आदत यहाँ
तजुर्बे भुनाए हैं  मेरी तरह वो

@@
जनाजे को उनके कंधा क्या दिये हम
बेजा  सर लगे  खाये हैं  मेरी तरह वो




1222  1222 २१2

नफरतो के घने जंगल
 मुहब्बत या  जंग बराबर सा लगा
 पड़ौसी फिर  मुझे रहबर सा लगा

यकीन के बाजुओं सर पटका किए
अचानक वो कड़ा पत्थर सा लगा

लकीर जिसे नसीब कहे आदमी
कहीं वो  बेसबब अजगर सा लगा

नफरतो के घने जंगल क्या घिरे
दुआ भी पलट ढाई अक्षर सा लगा

हमेशा सावधानी की सोचिये
भले ही सांप मोम-रबर सा लगा
सुशील यादव
21.7.17


२१22  2१22    2१22
सच कहो तो आजकल दर-ब-दर हैं हम
दस्त बस्ता  शहर में बे-हुनर हैं हम

नोचता है  चेहरा मासूम कोई
अब किसे बतलाय कितने निडर है हम

ये अमानत सौप जानो- जिस्म देकर
ढूढने को निकले क्या-क्या  गुहर हैं हम

हम कहानी किस्से की बुनियाद हो गए
सोचते हैं खलवतों  जादुगर हैं हम

खबर ये   वादा खिलाफी की उड़ा दे
जग ने जाना सच,चलो बे फिकर हैं हम

पुल बना कर आप चलना चाहते हो
ये हकीकत जान लो  पुरखतर हैं हम

अब न रूठती है अनारकली यहां पर
नए जमाने खैरख्वाह  अकबर हैं हम


घनाक्षरी गजल // दिल चीर के दिखाऊं

सिरफिरा सा अजीब ,मै सपना लिए रहा
अंधों के शहर ख़ास, आइना लिए रहा

तमाम उम्र मुझे ,मंजिलें ढूढती रही
मै कातिलों के घर पे ,बसेरा लिए रहा

वो छुप के अब वार, करने लगे मुझपे
जिनके सामने कभी, तमंचा लिए रहा

गांधी की शक्ल यहाँ ,कोई आए तो आदमी
दिल चीर के दिखाऊ ,अहिसा लिए रहा

अब नहीं होती किसी, फूल इतनी महक
दबा के किताबों में जो, तनहा लिए रहा

/// सुशील यादव


@@


करोड़ बारह  सौ फूंके हैं ,बांटे मोबाइल सरकार
गंवार-अपढ़  जनता होवे,मोबाइल की क्या दरकार

जिन गावो में भूखा प्यासा,खेती करता दिखे किसान
मोबाइल उन हाथो देकर,तुम समझो खुद धन्य महान

नक्सलवादी वहीँ जमे हैं ,ले पैसा इस नाम अकूत
रोजाना ताबूत भेजे जाते ,भारत वीर जवान सपूत

किस मिटटी के तुम हो माधो ,ह्रदय तुम्हारा हाय कठोर
विपदा- संकट  रखते साथी  ,नेता- अफसर चिन्दी चोर

कौन  योजना के बलबूते ,होगी अब की नैय्या पार
जनता और भरम में डालो ,कर लो फिर से छल व्यापार

विकास मुद्दे चुनाव गायब , कहो  राज के तारणहार
मोबाइल दे के लूट रहे , सरकारी संचित भंडार

पढ़ने वाले बच्चो को देकर ,करते यहां गहन अपराध
भटकाने-दौड़ाने  पथ में ,छोड़ दिए हो क्रोधित बाघ

जनमत को अब मत भटकाओ,देना होगा सभी हिसाब
बन्द करो ये दारू खाने, मुफ्त बांट चुनावी शराब

सुशील यादव दुर्ग
१ जून १८


वज़्न---1222---1222---1222-1222

गली तेरे करम.की ..

मैं तुझसे मिलने का कोई बहाना ढूढ़  लेता हूँ
घने-जंगल, गड़ा-भूला, खजाना ढूढ़ लेता हूँ

गली तेरे करम की,दूर तक है अधबनी चाहे
नसीबो में लिखा अपना ,जमाना ढूढ़ लेता हूँ

न भाये है,जिसे तारीफ के पुल से गुजरना भी
उसी लम्हा झुका दूँ सर ,बहाना ढूढ़ लेता हूँ

मेरे नजदीक आके दूर मालिक था अगरा जाना
हकीकत सा ख्यालो में ,फसाना ढूढ़ लेता हूँ

जिगर में ,बात की तल्खी, लिये जीना 'सुशील'आया
तभी चुपचाप हटने का ,ठिकाना  ढूढ़ लेता हूँ

सुशील यादव दुर्ग

@@


चौपाई :बरसात में ....

पानी-पानी, आया पानी |  गर्मी दूर भगाया पानी ||
सबने खूब निकाले छाते | रंग-बिरंगे, काले छाते ||

सुख की गिनती कौन करेगा, अब जो भीतर भीग डरेगा |
यूँ ना देखी  होगी बारिश , सहमी-विनती और गुजारिश |

लो कृषको का मन हर्षाया, मेघ-घटा, उमड़- घुमड़ आया |
हल लेकर ये  खेतों निकले ,मिटटी कोना- सोना पिघले |

हो जाती हर शाम-सुहानी, देखो छेड़ अतीत कहानी |
बचपन की नावों का मिटना ,भीगे-भीगे  आकर  पिटना |

बारिश पानी बहता जाता ,सूखा -नाला भी  उफनाता |
किन्तु हमी-हम  ठहरे होते ,नम रिश्ते भी गहरे होते |

सुशील यादव दुर्ग


पिता  की अस्थियां ....
@@
पिता ,
बस दो दिन पहले
आपकी चिता का
अग्नि-संस्कार कर
लौटा था घर ....
माँ की नजर में
खुद अपराधी होने का दंश
सालता रहा ...
पैने रस्म-रिवाजों का
आघात
जगह जगह ,बार बार
सम्हालता रहा ....
@@
आपके बनाए   दबदबे
रुतबा,गौरव ,गर्व
अहंकार का साम्राज्य ,
होते देखा छिन्न-भिन्न,
मायूसी से भरे  देखे
पिछले कुछ दिन...
खिंचे-खिंचे से,
चन्द माह ,
दबे-दबे से
साल
-गुजार दी
आपने
बिना किसी शिकवा
बिना शिकायत  चेतना शून्य
वजूद के साथ
जीवन  का अहम एक हिस्सा
दबी इच्छाओं की परछाइयां आपने
न जाने किन अँधेरों  के
हवाले कर दी
चुपचाप
@@
मुझे एक  खुशबु
पिता की
पहले छुआ करती थी दूर से
विलोपित हो गई अचानक
न जाने कहाँ ...?
न जाने क्यों मुझसे आप
अचानक रहने लगे खिन्न
>>>
आज इस मुक्तिधाम में
मैं अपने अहं के 'दास्तानों' को
उतार कर
चाहता हूँ
तुम्हे छूना ...!
तुम्हारी अस्थियों में,
तलाश कर रहा हूँ
अतीत की उन उंगलियों को,
जो मेरे हाथ को
किसी भी कोण से
गिरते वक्त पकड़ लेते थे
आज आप की वही उँगलियाँ ,
हैं मेरे वही हाथ ,मगर दोनों
अपनी जगह
छिन्न-भिन्न ,छितराये हुए
नियति के इस कठोर -क्रूर क्षणों में
टटोलने का खुद को
करता हूँ प्रयास ...
पाना चाहता हूँ एक बार ...
फिर वही स्पर्श ,
वो आप कि ,
जिसने मुझे उचाईयों तक पहुचाने में
अपनी ताकत
समूचे में झोकने से नहीं चुके थे किसी बार
>>>
मेरा बस चले तो
सहेज कर रख लूँ तमाम
उँगलियों के पोर-पोर
हथेली ,समूची बांह
कंधा ...आपके   कदम ...
जिसने मुझमें  साहस का
'दम'जी खोल के भरा
>>>
पिता
जाने-अनजाने
आपको इस ठौर तक
अकाल ,
नियत- समय से पहले
ले आने का
अपराध-बोध
मेरे
दिमाग की कमजोर नसें
हरदम महसूस करती रहेगी

सुशील यादव
21.5.17

  की अस्थियां ..२..

इन हाथों से पिता मैंने
दी थी चिता को आग
बस दो दिन पहले ...
आज राख में बटोरने आया हूँ
बची हुई बेबस अस्थियां
>>>
अहंकार का एक बनाया हुआ
साम्राज्य ,
होते देखा छिन्न-भिन्न
पिछले कुछ दिनों से
तुम्हारी परछाइयों से
जो खुशबु मुझे पहले छुआ करती थी
विलोपित हो गई अचानक
न जाने कहाँ ...?
न जाने क्यों मुझसे अचानक रहने लगे खिन्न
>>>
मैं अपने अहम् के दास्तानों को
अब उतार कर
फिर से चाहता हूँ
तुम्हे छूना ...
तुम्हारी उन उंगलियों को
टटोलने का भ्रम
पाना चाहता हूँ एक बार ...
जिसने मुझे उचाईयों तक पहुचाने में
अपनी ताकत
समूचे में झोकने से नहीं चुके थे किसी बार
>>>
मेरा बस चले तो
राख में बिखरी अस्थियों से
सहेज कर रख लूँ तमाम
उँगलियों के पोर-पोर
हथेली ,समूची बांह
कंधा ...
आपके कदम ...
>>>
दिल न जाने आपका
जल कर कहाँ विलीन हुआ है
दिमाग की कमजोर नसें
तमाम अग्नि दग्ध लोपित हैं
केवल प्राणायाम की मुद्रा में
सर की कुछ अस्थियां
अब भी मुझे गौर से देख रही हैं
मेरे पिता ....
मुझे मेरी गलतियों के साथ अब भी स्वीकार कर लो
मैं गंगा में तुम्हे बहा कर
केवल खुद पाप मुक्त
नहीं होना चाहता
 @@@
 ....

जाने किन पैरों पर
खड़ा रहता है
आसमान
दिन रात
बिना थके हुए ....?
मेरे
तुम्हारे
शब्दों को अब
बैसाखी की
जरूरत
महसूस होती है ...
हम आहत-
अपाहिज मन से
बोलते हैं या
सहानुभूतियों की किताब
उस जगह से खोलते हैं
जहां पृष्ठ भर
हाशिये के सिवा
होता नहीं कुछ
#
हम सिद्धार्थ की तरह
खोजने
निकल पड़ते हैं
यथार्थ ...
मगर हमारा
'यक्ष -प्रश्न'

हमे
घेरता है
बरबस

हम आकाश की बैसाखी
उसके पांव
उसकी जमीन को
तलाशने में जुट जाते  हैं,
न जाने किन पैरों पर खड़ा रहता है
आसमान ...?
#
काश ,
हमे पहले
बता दिया गया होता
आसमान कुछ नहीं
एक हवा है
धुँआ है
शून्य  है
और
हवा को
धुँआ को
शून्य  को
बैसाखी की जरूरत नहीं होती
वह अपने
शास्वत वजूद पर
स्वयं चलता है
दिन -रात बिना थके हुए
#
काश हमारे शब्द
यूँ ही
हवा की तरह
धुँआ की तरह
शून्य की तरह
बिना पैरों
चलते
तैरते
अनवरत
लगातार
संप्रेषित होते
बिना किसी बैसाखी के

सुशील यादव दुर्ग



लोग कहते अब.....

अब यहां ना आशियाँ- परिंदा बचा
यार बारूद का धुँआ बस धुँआ बचा

ले गया फिर  छीन बस्ती कोई अमन
डबडबायी आँख आँगन कुँआ बचा

कौन सूरत  आप  पहचानता यहाँ
पास किसके आजकल  आइना बचा

वो सभी पल याद हमको  करीब से
वो जहां बस  आदमी  झुनझुना बचा

हाँ मुझे भी लौटना है 'सुशील' पास
लोग कहते अब वहीँ मन 'घना' बचा

सुशील यादव दुर्ग
2122   2122  1212

20.6.18

' जो भूला ....

दिल रखने को तुझे दिया क्या है
तू ही बता कि फ़ायदा क्या है

यारा बुझा दिया चिरागो को
जलता हुआ यहाँ बचा क्या है

मुहताज हैं खुदा यहाँ हम भी
ये मुफलिसी सिवा मिला क्या है

अब तिलस्मी लगी हमे दुनिया
देखे ये  फैलता नशा क्या है

चारो तरफ है भीड़ का उन्माद
नारो के बीच निकलना क्या है

मजबूरियों 'सुशील' जो भूला
अब तो बता सही पता क्या है

सुशील यादव दुर्ग


खोज लिया जिसने .....

जब दुश्मन जाने पहचाने हैं
यारो हम भी बहुत सयाने हैं

लेकर अपनी बस राम-कहानी
समझौतों के सहज निशाने हैं

मुस्कान मिली तो जीवन छलका
यूँ गम के सौ-सौ अफसाने हैं

जग को दे न सके अपना परिचय
कहने के कई लाख बहाने हैं

किसने हमको कब तौला-परखा
हम बीते इतिहास पुराने हैं

खोज लिया जिसने दिल को भीतर
पाए असल 'सुशील' खजाने हैं

सुशील यादव
14.7.17
गलत राय गलत मशवरा देने वाले
मुंसिफी की आड़ फतवा देने वाले
बिजलियाँ सौ -सौ गिरे तेरे घरों में
ओ जन्नते काश्मीर जला देने वाले
सुशील यादव

दहशत ,दीवारें और  अदावत केवल
सीख लिए होते काश  बगावत केवल
माथा सहजादों का है  झुकते देखा
जिनका  मकसद होता मोहब्बत केवल
##

2212 2212 1222 2
अहसास ....!

है कौन,जो तन्हाई को सदा देता है
मुझको कभी,बन के सबा हिला देता है

मैं सुनने का आदी नहीं,मगर कानो में
सुर-ताल-नगमा सा कहीं,सुना देता है

हिलती रही दीवार पर,तेरी परछाई
अहसास, अक्स कई तरह,बना देता है

जिस राह पर होती रही मुलाकाते,आज
उस रास्ते पहरा कोई बिठा देता है

गुमनाम से अँधेरे हम निकल भी आये
हालात जीना, हाल हर सिखा देता है

अंजान सा बैठा छिपा हुआ नासूर अब
खुद हरकतों अपनी कभी डरा देता है

मत सोचना, मेरे कदम के नक्शो चलना
जंगल करीब यकबयक पहुचा देता है

है तलब हमको तेरी किया क्या जाए
ये नाव गलत सुराख ही डुबा देता है

मजबूरियां है या समय फरेबी जाने
दीवार साझा बीच में उठा देता है

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग
10.7.17

वीरांगना रानी लक्ष्मी बाई के  बलिदान दिवस १८जून पर
##

तुम रक्षक हो सीमा-प्रहरी ,पथ में आगे बढे चलो
पहाड़ दुर्गम  को लाघों,दुरूह घाटी चढ़े चलो
मानवता के तूल तुम्ही  ,मिट्टी के हो कारीगर
बिन मन्दिर पूजे जावो ,मूरत वो भी  गढ़े चलो
#
एक दिया तम में रखना ,एक जले  आंधी  आगे
हो अडिग विश्वास तुम्हारा ,सर-पैर ले दुश्मन भागे
सीमा से जब वापस आओ ,माँ के लाल बहन-वीरा
हर  सुहागन दृग देखना , कैसे सोये दिन जागे
#
शांति जिसने जकड़ लिया, 'पर' अहिंसा के हैं काटे
मक्कारी  चादर ओढ़े ,परचम जिहाद के  बांटे
मजहब के चण्डालों का,मखौल क्यों नहीं  उड़ाये ,
इनकी मकसद के जड़ को,क्यों न अभी कतरें- छांटे
#
लक्ष्मी-बाई सा साहस ,अपने भीतर आप भरो
जीवन शब्दकोश निकालो ,कायरता से काश डरो
लोहा लेने की बारी , कतार पीछे  क्या रहना
जन-जन में चिश्वास जगे ,आपतकाल   तुझे    लड़ना
#
मर्दानों की शक्ति लेकर , एक रानी  रण में आई
उम्र की कोमल काया थी ,उतरी न थी  तरुणाई
अंग्रेजो को रण में तब ,कैसे  खूब छकाती थी
वो थी  रानी झाँसी या ,संदेश भरी  पाती थी
सुशील यादव
16.6.18

२*८ दुनिया रंग-बिरंगी

दुनिया रंग-बिरंगी देखो
फिर से चाल फिरंगी देखो
हम हैं अपने सूबे में खुश
बारा- मासी तंगी देखो
#
आज यही केवल सच्चाई
है भाई का नाम कसाई
हम ख़र्चे हैं आना जिस पे
वो छोड़े न हिसाबी पाई
#
#
हम पर आग बबूला होते
हम क्या सावन झूला होते
मौसम की है मार सभी को
सब को परखो सब से सीखो
#

पीतल को समझा था सोना
मिटटी को था मिटटी होना
लाख सजा लो घर को चाहे
प्यार बिना चमके कब कोना

#



चाँद-चौथ  करवा अभी ,छलनी ओट निहार
साजन तुमसे मांगती ,सुख जीवन आधार
सुख जीवन आधार ,मांगती रजत न सोना
रखू भविष्य निखार ,समर्पित तुझको कोना
दया-क्षमा औ त्याग,लूँ रथ में सबको फांद   ,
सुविधा से फिर जाग ,मैं देखूं करवा-चाँद

१.
तेरा दिल बस छोड़ के ,बाकी सब बकवास
तुझको केवल देख के ,आनन रहे उजास
आनन रहे उजास ,कहीं मिल जाय तसल्ली
दे  इतना वरदान ,गिरे ना अपनी गिल्ली
भूखे रख लो आप ,शाम से होय सबेरा
सभी मुखड़े से सटीक,परी सा मुखड़ा तेरा

२.
मौसम काटों का कभी ,हो जाए अनुकूल
वेलेंटाइन तुम भेजना ,मुझे प्यार से  फूल
मुझे प्यार से फूल .महक हो  तेरी प्यारी
सुन लेती फरियाद,सुकोमल हृदया नारी
शनै-शनै हर बात , घाव पर लगना  मरहम
आता वापस लौट ,वहीं  काटों का मौसम

३.
देखूं करवा- चौथ में ,छलनी चाँद निहार
साजन तुमसे चाहती ,सुख जीवन आधार
सुख जीवन आधार ,मांगती रजत न सोना
रखू भविष्य निखार ,समर्पित तुझको कोना
दया-क्षमा  औ त्याग ,प्रेम यश सबसे सीखूं
सुविधा से फिर जाग, चाँद मैं करवा देखूं


गिनती की हैं रोटियां,मतलब  के रखवाल
जनता अपने  खून में,पाती नहीं उबाल
पाती नहीं उबाल , किसे आ कौन  उबारे
है माया छल-कपट, छोड़ दें कौन  सहारे
पापी-लोभी-दुष्ट,बात व्यभिचारी खलती
गली नहीं जब  दाल,रोटी की किधर गिनती

सुशील यादव
 6
सबकी नजरों से गिरे ,बदले दल हर बार
आँखों पट्टी बाँध जो ,गिन-गिन थके हजार
गिन-गिन थके हजार, समझ कुछ ये सब पायें
जब निर्धन  के हाथ ,पांच-दस मुश्किल आवे
मन्नत की  उस बात ,लगा -लेते सौ डुबकी
लालच तेरी देख ,झुकी नजरे हैं सबकी
सुशील यादव

7

टेलीपेथी ...
बिना पते की चिट्ठियां ,देता कौन पठाय
आंसू-धड़कन साथ ही ,मन सारा अकुलाय
मन सारा अकुलाय,व्यर्थ का रोना-धोना
लिखा हुआ जो भाग ,कहे ग्यानी वो होना
प्रीतम मिलती  सीख,संग दुख के जब जीना
दिखे ऊंच ही नीच ,सभी सुख आधार बिना
##
8
आज ...
कौन-कहाँ जा बैठता,माया रूप जहाज
ना कुनबे की छाँव ना,नियमो भरा समाज
नियमो भरा समाज ,उलंघन से  छुटकारा
नहीं खेद-दण्ड-दहशत ,आपसी भाईचारा
क्रूर- क्रूर अपराध,आदमी है  मौन यहाँ
कोई कुछ भी कर रहा ,फिक्र करता कौन कहाँ
सुशील यादव

9
खंगाल रहे क्यों मिया ,नियम और कानून
फतवा एक निकालिये ,सब लो भट्टी  भून
सब लो भट्टी  भून,गड़े  मजहब का  झंडा
रखना अपने पास ,सड़े करतूतों फंडा
गौरवशाली देश ,निरे तुम कंगाल रहे
वैसे अपना अहित ,आप ही खंगाल रहे
सुशील यादव दुर्ग

१0
हैरान कहीं देखकर ,बदल न पाए लोग
पाखंडी-पापी  चढ़े,छप्पन- छप्पन भोग
छप्पन- छप्पन भोग,ऊँगलिया पाँचो घी में
आस्था की ये लाश ,बहा दो कहीं नदी में
रहते बेबस लोग,दिखे ना मुस्कान सहीं
करती है ये बात ,मुझे बस हैरान कहीं
 @@@
११
रखोगे किस किस का ,मन में ख्याल हिसाब
भूलो छीटें खून के ,ये तकदीर जनाब
ये तकदीर जनाब ,भूल हिस्सा बटवारा
जो किस्मत मिल जाय,उसी पे आस-गुजारा
अपने हिस्से स्वांग,ख़ुशी के और भरोगे
जब अरमानो दीप ,बराबर ध्यान रखोगे
सुशील यादव
###
१२
---
निकला जगत खरीदने,कौड़ी हाथ छदाम
इस माया संसार का,किसके पास लगाम
किसके पास लगाम,कौन करता रखवाली
हाथ इशारो पुलिस,उच्चके  चोर मवाली
ऐसे में लूटो झपट,यही सोचे मन पगला
चोला  है बैराग ,खरीदने जगत निकला
१३
कमर झुकी लाचार बन ,चलता रहा समाज
बेइलाज बूढ़ा हुआ  ,सत्तर साल सुराज
सत्तर साल सुराज ,आँख पहचान सके  कम
कभी  सुन सका  कान. कौन है सरकार  नरम
दिखे  लाचार बहुत ,रहा कोई  अजर-अमर
लाठी गम की टेक ,करो सीधी झुकी कमर
१४


गिनती की हैं रोटियां,मतलब  के रखवाल
जनता अपने  खून में,पाती नहीं उबाल
पाती नहीं उबाल , आकर कोई उबारे
है माया छल-कपट,किसके कौन सहारे
पापी-लोभी-दुष्ट,व्यभिचारी  बात बनती
गली कहाँ ये दाल,रोटी की किधर गिनती

सुशील यादव

सबकी नजरों से गिरे ,बदले दल हर बार
आँखों पट्टी बाँध जो ,गिन-गिन थके हजार
गिन-गिन थके हजार, समझ कुछ ये सब पायें
जब निर्धन  के हाथ ,पांच-दस मुश्किल आवे
मन्नत की  उस बात ,लगा -लेते सौ डुबकी
लालच तेरी देख ,झुकी नजरे हैं सबकी
सुशील यादव



टेलीपेथी ...
बिना पते की चिट्ठियां ,देता कौन पठाय
आंसू-धड़कन साथ ही ,मन सारा अकुलाय
मन सारा अकुलाय,व्यर्थ का रोना-धोना
लिखा हुआ जो भाग ,कहे ग्यानी वो होना
प्रीतम मिलती  सीख,संग दुख के जब जीना
दिखे ऊंच ही नीच ,सभी सुख आधार बिना
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आज ...
कौन-कहाँ जा बैठता,माया रूप जहाज
ना कुनबे की छाँव ना,नियमो भरा समाज
नियमो भरा समाज ,उलंघन से  छुटकारा
नहीं खेद-दण्ड-दहशत ,आपसी भाईचारा
क्रूर- क्रूर अपराध,आदमी है  मौन कहाँ
कोई कुछ भी कर रहा ,फिक्र करता कौन कहाँ
सुशील यादव


खंगाल रहे क्यों मिया ,नियम और कानून
फतवा एक निकालिये ,सब लो भट्टी  भून
सब लो भट्टी  भून,गड़े  मजहब का  झंडा
रखना अपने पास ,सड़े करतूतों फंडा
गौरवशाली देश ,निरा तू कंगाल रहा
वैसे अपना अहित ,आप ही खंगाल रहा
सुशील यादव दुर्ग

रखोगे किस किस का ,मन में ख्याल हिसाब
भूलो छीटें खून के ,ये तकदीर जनाब
ये तकदीर जनाब ,भूल हिस्सा बटवारा
जो किस्मत मिल जाय,उसी पे आस-गुजारा
अपने हिस्से स्वांग,ख़ुशी के और भरोगे
जब अरमानो दीप ,बराबर ध्यान रखोगे
सुशील यादव
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कुण्डलिया छन्द का विधान उदाहरण सहित
कुण्डलिया है जादुई, छन्द श्रेष्ठ श्रीमान|
दोहा रोला का मिलन, इसकी है पहिचान||
इसकी है पहिचान, मानते साहित सर्जक|
आदि-अंत सम-शब्द, साथ बनता ये सार्थक|
लल्ला चाहे और, चाहती इसको ललिया|
सब का है सिरमौर छन्द, प्यारे, कुण्डलिया||


कुण्डलिया छन्द का विधान उदाहरण सहित

कुण्डलिया है जादुई
२११२ २ २१२ = १३ मात्रा / अंत में लघु गुरु के साथ यति
छन्द श्रेष्ठ श्रीमान|
२१ २१ २२१ = ११ मात्रा / अंत में गुरु लघु
दोहा रोला का मिलन
२२ २२ २ १११ = १३ मात्रा / अंत में लघु लघु लघु [प्रभाव लघु गुरु] के साथ यति
इसकी है पहिचान||
११२ २ ११२१ = ११ मात्रा / अंत में गुरु लघु
इसकी है पहिचान,
११२ २ ११२१ = ११ मात्रा / अंत में लघु के साथ यति
मानते साहित सर्जक|
२१२ २११ २११ = १३ मात्रा
आदि-अंत सम-शब्द,
२१ २१ ११ २१ = ११ मात्रा / अंत में लघु के साथ यति
साथ, बनता ये सार्थक|
२१ ११२ २ २११ = १३ मात्रा
लल्ला चाहे और
२२ २२ २१ = ११ मात्रा / अंत में लघु के साथ यति
चाहती इसको ललिया|
२१२ ११२ ११२ = १३ मात्रा
सब का है सिरमौर
११ २ २ ११२१ = ११ मात्रा / अंत में लघु के साथ यति
छन्द प्यारे कुण्डलिया||
२१ २२ २११२ = १३ मात्रा
at 12:39

छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या ,मारो हकन कुदारी
घर के आगी बुताय खातिर,खोद कुंआ  तैय्यारी

छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या ,फटे ढोल जब होली
मतलब साफ झलकता जैसे ,बोतल ज्यादा खोली


छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या ,पारे बर हे हाना
कोनो अतलंगी छूटे झन ,नजदीक हवे थाना

छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या ,मिठलबरा के बोली
भांग के शरबत बगरा चलिस, कोस आठ होली

छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या ,छोलाय दिखे माड़ी
तोरे बाबू पी के टूरा ,हपटत आइस ताड़ी

छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या ,कतेक करन अगोरा
गंगा में डुबकत नन्दागे ,गंगा बाजू छोरा

छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या ,हमरो अतका  अरजी
आनी -बानी गुलाल मलेव ,मनमाने मन-मरजी

छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या ,बदलिस मौसम मर्जी
टोपी सीयत हवे  आजकल , चड्डी सिलय्या दर्जी


छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या ,दू के बोल पहाड़ा
पीट-पीट के फोडे डरेव,जात- कुजात नगाड़ा



छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या ,काखर घी हे असली
पद्मावत के छाती छलनी ,तोड़त काबर पसली

सुशील यादव  दुर्ग



 सार छंद

छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या,भौजी मारे ताना
कतका असन कती गंवागे ,देवर पारत हाना

छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या ,दुनो हाथ में लाडू
चलव सफाई अभियान अभी,मारे बर हे झाड़ू

छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या ,वेलेंटइन अगोरा
गंगा किनारे घुमत खानी ,टकरा जाही छोरा

छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या ,मड़ई ऐसो फीका
बिलइ के भाग टूटत नइये,मजबूत हवय छींका

छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या ,छेदा- छेदा पनही
टेटकु किस्मत कइसे जगही ,जाने कइसे बनही

सुशील यादव  दुर्ग



छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या, चिर्पोटी बंगाला

अमसुर होवत राज तुंहरे ,हमरो देश निकाला



छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या, राजनीति खपचल्हा

दिन बहुरे काखर हे देरी ,होवय नकटा- ठलहा



छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या, होवय नेता लबरा

सपनावत रहिबे बाँध-बनही ,खनाय रहिथे डबरा


छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या, दोनों हाथ म लाडू

सूट- पेंट पहिरे खातिर अब , दिल्ली मारो झाड़ू



छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या,सीखो गा बदमाशी

दारु दुकान खोले मिलही ,परमिट बारामासी



छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या,गुरतुर जेखर बोली

सब्सीडी एसो रंग मिलही ,खेलेबर जी होली

15.2.16

वेलेंटाइन छत्तीसगढ़ी स्टाइल

छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या,मनाव वेलेन्टाइन

जरहा बीडी कान खुचैया,तुम्हला का समझाइन



छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या,बासा होटल चलबो

जलईया मन के छाती मा,मुंग-मसूर दलबो



छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या, टुटहा जेखर पनही

वेलेंटाइन राग गवइया , लबरा नेता बनही



छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या,करव टोटका टोना

वेलेंटाइन गाँव म घुसरत ,बचाव कोना कोना



छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या, हवय दाम दू पइसा

पान खवातेन वेलेन्टाइन,खोजब पाछू भइसा



छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या,सूट बूट ला पहिरो

वेलेंटाइन मनाय खातिर,हमर सेती सम्हरो


छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या, उतरिस घर में डोला

अनारकली, मुमताज, हीरा ,देवव खिताब तोला



छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या, बजा बजा के दफडा

टूरा के हमरो ताका झांकी , वेलेन्टाइन लफडा


छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या,जीवरा करय कुल-कुल

डिपरा के रहवइया संगी ,खचका जावय ढुल २



छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या,टूरा हे खपचल्हा

दाई ददा के बखान सहय,काबर नकटा- ठलहा



कुम्भ ठिठुरते मेले में

कंबल ओढा कोई संत है क्या

सागर की निर्मम लहरों का

किनारे सुखद अंत है क्या

सूनी राह मिल गई हो मुझको

जंगल को सौगात बसंत है क्या



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झुमका गिरा रे

एक जमाना था जब जनानियाँ को झुमका गिराने का शौक उत्पन्न हो गया था|
वे इस शौक के चलते अपने पतियों से आग्रह करती, चाहे कोई तीर्थ-पिकनिक-पर्यटन पर न ले जावे मगर बरेली बाजार जरूर घुमवाया दें |
वे सुनारों को स्पेशल आर्डर दे के हलके वजन के  झुमके बनवाती थी|
इसका लुफ्त ये था कि सहेलियों के बीच फक्र  से कह सके कि उसका झुमका भी बरेली के बाजार की भेट चढ़ चुका है यानी ख़ास बरेली में गिर के गुम हुआ  है |
सहेलियां उनके भाग्य पर, ईर्ष्या नामक नमक को बेमन गुटकती |
 झुमका- पर्यटन के तुरन्त बाद वे,फालोअप , भव्य किटी पार्टी आयोजित करके सविस्तार झुमका प्रकरण पर प्रकाश फेकती |
उनका दूसरा उद्देश्य झुमका-प्रकरण को प्रचारित कर ,पर्यटन के रूप में बढावा  देना होता था | यदि सरकारें, तब उन्हें  गंभीरता से लेती तो इस बात पर, ब्रांड एम्बेसडर जरूर घोषित हो जाती  जैसा आजकल आम फैशन हो गया है|  यहां आपने सुपली भर कचरा उठाया नहीं उधर आप सफाई के बांड एम्बेसडर मुकर्रर कर दिए जाते हैं |
तब बरेली कस्बे के खोली-नुमा थाने के इंचार्च होने का लेखक को  सौभाग्य प्राप्त था |
रोज  दिन में दस-पांच झुमका-नुमा शिकायत मिलती थी |
हम  प्रधान आरक्षक से कहते  कच्चे में रिपोर्ट ले लो |
शिकायत कर्ता-कर्ती इस कच्चे रिपोर्ट पर खुलासा चाहते कि ये क्या बला है|
हम शिकायत-नेत्री  को पूछ लेते कि वे रिपोर्ट की  तस्दीक कराने में गंभीरता रखती हैं या शौकिया गुमशुदगी की रिपोर्ट करने आई हैं ...? कई घूरती .....? उनकी घूरती निगाहों में हमें आर्ट फिल्मो के कई दृश्य उमड़ पड़ते | हमे उन पर काबू करने की क्षमता थी, सो निपट लेते |  उन्हें समझा देते, बहनजी अक्सर यहाँ झुमके को लेकर दर्जनों रिपोर्ट होती हैं अगर मुहकमा इसी झुमकेबाजी-वाली खोजबीन में लगा रहे तो समझो,  ये यु पी है यू पी  ,रोजाना सैकड़ों की तादात में अपराध होते हैं | मार-काट ,लूट पकड़ ,किडनेपिंग ,यौन अपराध, शराब माफियाओं की स्मगलिंग | अब आप ही कहैं आपके चवन्नी भर के झुमके के पीछे इन सब को किसके भरोसे छोड़ दें .....?
आप छीन -झपट का केस दर्ज करवाती तो कार्यवाही ज़रा जल्दी होने की गुजाइश भी थी | इस मशवरे के मुताबिक़ , इसके लिए आपके पास पर्याप्त पुख्ता सबूत होना जरुरी है | आप अपने कान के कटे होने की जानकारी देती  ,मेडिकल रिपोर्ट और फोटो मुहैय्या करवा देती तो हम पूरी मुस्तैदी से लग जाते |
आप हम पर भरोसा भले नहीं करती, आपके हित चाहने वाले वाले आपको प्रेस मीडिया तक ले जाते|  फोटो सहित आपका हुलिया  अगले दिन के अखबार में शाया हो जाता | इसे देखकर आपकी भोली सूरत पर किसी नेता की नजर पड़ती | आंदोलन घेराव होता | हम थाने में उनको हवाई फायर करके तितर -बितर करते | मिनिस्टर हमसे दूरभाष संपर्क कर सख्य कार्यवाही करने की चेतावनी देता |
यूँ ,हमारे भी मजे हो जाते| रोज-रोज के किच-किच विधायक को सलामी, उनके घर अर्दली ड्यूटी देने,और गुंडा मवाली से बचते| सभी  को एक जवाब से चुप कर देते कि मिनिस्टर के किसी ख़ास रिश्तेदार का  झुमका  किसी ने झपट लिया है, उसकी  तफतीश के बगैर या पहले इस  थाने में  दुसरा पत्ता भी ना हिलेगा | हमने एक मिनिस्टर के भैस प्रकरण में इस थाने को दीगर काम के लिए ठप्प कर दिया था | आप अखबार पड़ती होगी तो यह वाकया जरूर नजर से गुजरा  होगा |
हमारी तफ्तीश कुछ और आगे बढ़ती इससे पहले श्रीमति जी ने टोका ये क्या झुमका-झुमका बड़बड़ाते रहे , देखो ये झुमका  भी चपटा दिए |हमने कनखियों से उनके कान की ओर देखा ,खुदा के शुक्र से वे सही- सलामत थे | हमने मुस्कुराकर कहा , शाम को नया दिला देंगे |  झुमके अब  ओल्ड फेशन की चीज हो गई है |वो नए की खुशी में कुंदन की तरह दमकने लगी | ये चेहरा मुझे खूब पसन्द है |

आत्मकथा लिखने बाले
इधर साहित्य से जब धकिया दिए जाते हैं तो लोग, आत्मकथा लेखन की औऱ उसी तह मुड़ जाते हैं जैसे समाजवाद से जी भर जाने के बाद आदमी वामपंथ की तरफ मुड़ जाता है |
 उन्होंने तरह-तरह के लेख, कहानी, कविता, यात्रा-विवरण यहाँ तक कि दो-चार स्टेटिक्स  जुगाड़  कर शहर की बदहाली का रिपोर्ताज भी लिखा |
उनके लिखे की सराहना करने वाले बिरले ही मिले |
किसी के श्री मुख से वाह सुनने की हसरत ही रह गई |
नटवर लाल उर्फ नट्टू मेरे  शागिर्दों में से हैं |
वो मेरे आलेख को अपने दफ्तर के टाइप-राइटर पर बाकायदा तीन कॉपी में टाइप कर लाते थे |
उन दिनों का ज़माना, टाइपराइटर की कुंजियों में घूमता था |
बड़े -बड़े ड्राफ्ट आदेश इसी पर बनते थे |
नट्टू भाई, अपर-डीविजन की क्लर्की के धौस वाले , बड़े बाबू का ओहदा प्राप्त इंसान थे|लिहाजा कोई गैर-शासकीय कार्य वे दफ्तर में अंजाम देते तो उफ नहीं किया जाता|
शिकायत वगैरह ऊपर पहुचने की परंपरा उन दिनों परवान  चढ़ी हो ऐसा नहीं  होता था |भाई चारा वाला ज़माना था | भाई को चारे की ढेर में बैठा देख, कोई अपनी सांड ढीलने की हिमाकत किया हो ऐसा कोई प्रसंग प्राप्त  नहीं होता |

उनके मातहत इन्हें दस -बीस पेज में खोया-बिधा  पाकर चुपचाप बिना अनुमति  मैटिनी शो की तरफ खिसक  लेते थे |
नटवर भाई को एक्सचेंज ऑफर का  बुनियादी ज्ञान था|
 वो  टाइपिंग की मजदूरी के नाम पर अपनी लिखी आधी- अधूरी कहानी संशोधन के नाम पर छोड़ जाता |
उसकी  लिखी कहानी को साकार रूप करा पाने में प्रायोजित चाय-पानी के  बाकायदा आठ दस मीटिंग्स लग जाते जो करीब के बुद्धू होटल में,  होटल के शटर गिराने की सुचना तक चलती|
नट्टू अपनी शार्टहैंड पटुता का प्रदर्शन कर मेरे बताये संवाद और पंच लाइन को बाकायदा नोट कर ले जाता |
सलीम-जावेद कथा लेखन में  संयुक्त रूप से कौन सा तरीका इस्तमाल करते थे....?  नट्टू अक़सर पूछता, जिसे बता पाने की मेरी अज्ञानता आज तक बरकरार हैं  |
अपनी  कहानी के  फाइनल अंजाम पहुचने वाले दिन को सेलीब्रेट करना नहीं चूकता| मेरे आशीर्वचनों के साथ उसे  किसी बड़े मासिक में प्रकाशन के लिए भेजता  |

 वहां से सखेद वापसी पर, लोकल अखबारों के रविवारीय पृष्टों की तरफ रुख करता | जहाँ छपने की गुजाइअश होती|
वो  रविवार को बाकायदा बस स्टेण्ड में सभी पेपर को खंगालता ,किसी रविवार को उनकी छप जाती तो आधा किलो जलेबी के साथ पहुचता |
गुरुजी देखो हप्ते भर में देखो  छप गई |
आप सही कहते हैं बड़ी मैगजीन में लाबी चलती है ,लाबी ,,,,
अपने गुट के गिने चुनो की छापते हैं वे लोग |
मान गए गुरुदेव!  आपको इस फील्ड का खासा तजुर्बा है |
मेरी तन्मयता इस तारीफ के बावजूद उसके लाए जलेबी के सामने  भंग नहीं होती |
जलेबी भक्षण दौरान ,नट्टू मुझे अबोध ,अल्पज्ञानी केटेगरी का दीखता |
मैं उसके प्रतिप्रश्न करने के पहले, किसी नई कहानी के प्लाट  का दूसरा सिरा  पकड़ा देता |
वो  कल्पना के नए गोते में उतराने लगता, मैं सद्य-प्रकाशित ईसु पर,  तब तक उसके लन्च का  मेन्यू पूछ लेता |
कहता ,अगर चिकन या बिरयानी हो तभी लाना ,वह इसे गुरुआज्ञा की तरह शिरोधार्य करता | ठीक एक बजे लम्बे टिफिन के साथ हाजिर हो जाता | कहानी के प्लाट की आगे चर्चा करने- कराने की उसकी गरज को एक  वाक्य में समेट के कहता अभी हीरो के केरेक्टर पर ध्यान दो ,शुरूआती दो तीन पेज लिख लो फिर देखेंगे |

एक दिन नटवर  भन्नाया हुआ आया |
मुझे लगा 'कौशल जी' ने मेरी लेखकीय क्षमता पर ,जरूर मेरे खिलाप कुछ भड़का दिया है |
मैंने  गिरती विकेट को अपील की नजर से देखा |
तीसरे एम्पायर के तौर, उसका तुरन्त फैसला सुनने मिल गया |
गुरुदेव अब मैंने ठान लिया है मैं अपनी आत्मकथा लिखूंगा ....|
इस धमाके से मैं चौका मगर संयत होते हुए मैंने कहा... अच्छी बात है , अब तुम्हे मेरे दिशानिर्देशों की जरूरत नहीं पड़ेगी ,जरूर लिखो ....|
उसकी तमतमाहट में तुरन्त  नरमी दिखी .. नहीं गुरुदेव आप तो अपनी जगह पर बाकायदा रहेंगे ...|
  आफिस में  मेरा मामला  झोल खा रहा है इसलिए थोड़ा रिएक्शन गड़बड़ है |
-खुल के कहो आत्मकथा और आफिस का कनेक्शन क्या है ...?
-वो कहने लगा ,अपने बड़े साहब हैं ना, बड़ी -बड़ी तोप मारते हैं |
स्टाफ को परेशान किये रहते हैं |
जाने किस-किस का लिए-खाये रहते हैं, कि उनको हर काम चुटकियों में चाहिए होता है |
डाट -फटकार में असंसदीय हो जाते हैं |
रात आठ से पहले मातहतों को दफ्तर छोड़ने का नहीं देते | भले ,चाहे वे दो-तीन बजे आएं |
गुरुदेव आपको बताएं , हम उनके डिक्टेट किये ड्राफ्ट को टाइपिंग करते -करते 'पर' गिनने में माहिर हो गए है|
कल जब डांट-डपट की हदें पार हुई तो हमने फैसला किया कि आत्मकथा लिखने  की आड़ में उनको धो देंगे |
यूँ तो हमने ,खूब विचार किया कि फर्जी नाम से कंप्लेंट करें ,आर टी आई का सहारा ले मगर सब में एक्सपोज होने और सर्विस में बन आने की बात थी | यही मार्ग यानी आत्मकथा वाला सटीक लगा |
हमने उसे समझहते हुए  कहा ,नट्टू आत्मकथा साहित्य की ऐसी धरोहर है जिसमे आदमी के संघर्ष का निचोड़ होता है
| हर ऐरे -गेरे के द्वारा ये लिखने की ये चीज नहीं है | आत्मकथा को कोई कामलेंट बुक के रूप में कैसे इस्तेमाल कर सकता है भला ....?
एक बात और.... इसके कॉन्टेंट में क्या डालोगे ? तुम्हारी कोई ख़ास उपलब्धि तो किसी फील्ड में  है नहीं ? गिनती की दो -चार लाइन इधर-उधर  छपी है | तुम अभी अपने मोहल्ले में भी ठीक से जाने नहीं जाते | बुद्धू होटल ,और दफ्तर से बाहर कोई हैं गिनती के लोग  जो तुम्हारे किये के  मूल्यांकन कोखड़े हो जाएँ  ?
तुम्हारे बचपन की ,जवानी की यादे,सब  बिलो पॉवर्टी लाइन में व्यतीत होने की वजह से,पढ़ने वालों पर  डेसिंग इंप्रेशन छोड़  नहीं सकते ...?
किताब छपवा तो लोगे ,पढ़ने वाला मिलेगा नहीं .....? तुम जानते हो, केवल इस शाश्वत सच की वजह से मेरी सारी रचनाएं जो लगभग दस पुस्तको का आकार ले सकती हैं, कम्यूटर में बस फाइल बनी पड़ी हुई हैं  |
नट्टू , मेरी बात बीच में अमूनन नहीं काटता ,मगर बोला गुरुजी आप पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर ये सब कह रहे हैं ...?
मैं नए वाचाल नट्टू को देख रहा था ...
-पूर्वाग्रह यानी ....?
-सर, अभी हमने अपनी आत्मकथा लिखी  नहीं आपने अनुमान कहाँ से लगा लिया इसमें दम नहीं होगा ....?
 इसमें मसाला- संवाद तो आप डालेंगे| प्रसंग हम रखते जाएंगे , बस एक बार बॉस को निपटा दूँ ऐसी मेरी दिल की  इच्छा है|
-मैंने कहा नट्टू ,आत्मकथा लिखना, ये मायने नहीं देता कि जगह -जगह आप हीरो बनते फिरो .....?
ज्यादातर लिखने वाले "हीरो बनने की कवायद" करते नजर आते हैं | समझ रहे हो |
ये पाठक तय करता है आप कहाँ सताये गए कहाँ पिटे ,कहाँ पिटते-पिटते बचे...?
 कब  आपकी टाँगे टूटनी थी, किस फरिश्ते ने आपको बक्श देने की फरियाद की ....?
और हाँ एक अहम बात और बता दूँ कहीं आपकी राइटिंग में चूक हुई तो 'आहत-पार्टी' आप पर मानहानि का दावा ठोंक सकती है | आजकल अखबारों में मानहानि वाले प्रसंगों में,बड़े -बड़े नेता,  माफी माँगते  नजर आ रहे हैं ,जानते ही होओगे ...?
- तो गुरुजी ये आइडिया ड्रॉप करना होगा .....? बॉस नुमा घूसखोर  इंसान , हम पर हॉबी होते रहेंगे ....?
-नहीं .... तुम पर नाइंसाफी नहीं होने देंगे |
तुम अपनी आत्मकथा लिखने का शौक  पाले रहो ,दफ्तर में जोरों से प्रचारित करो कि तुम्हे आत्मकता लिखने का शौक चर्राया है | पहले बॉस प्रसंग से ही निपट लो | जो भी ख़ास तुमने  उनके लिखे ड्राफ्ट को टाइपिंग करते पाया है, उसे तफसील से बयान करो | कहते हैं दाई से पेट छिपती नहीं |
तुम पेज दो पेज टाइप कर मटेरियल घर  लेते आओ|हाँ नया कार्बन इस्तेमाल कर, कार्बन साबुत वहीँ छोड़  देना|
इसके बाद ,अपने आफिस में बॉस के किसी ख़ास चहेते-चमचे को अच्छे से बता देना की तुम बॉस के कितने राज को फाश कर सकते  हो | चमचा अपना काम कर जाएगा |
बॉस द्वारा , आपकी खिलाफत वाली तैयारी देखकर  सस्पेंशन की तैयारी, तुम्हे चमकाने के लिए अविलंब होगी | यहीं तुम्हे अपने अडिग होने का परिचय देना है | आपके अडिग होने से ही बात बनेगी |
आपकी आत्मकथा के अंश को मामूली पेपर में छपवाने पर बाकी काम आप ही आप हुआ समझो |
नट्टू ने कहा सर .... इतनी मारक क्षमता वाली, अगर आत्मकथा होती है, तो फिर लोग क्यों नहीं लिखते ....?
नट्टू के गुरुजी के बदले 'सर' के संबोधन ने मुझे अभीभूत करके अवगत  करा दिया की बात उसके भेजे में कहीं ज़रा सी घुस गई है |

सुशील यादव
टीकमगढ़
0२. ०५.१८
    

भरोसे का आदमी
भरोसे का आदमी ढूढते मुझे साढ़े सन्तावन साल गुजर गए|कोई मिलता नहीं | मार्निग वाक् वालो से मैंने चर्चा की वे कहने लगे यादव जी....  'लगे रहो'.... | उनके 'लगे-रहो' में मुझे मुन्ना-भाई का स्वाद आने लगा | मैंने सोचा गनपत हमेशा कटाक्ष में बोलता है | उसकी बातों के तह में किसी पहेली की तरह घुसना पड़ता है |
    हममें से कई मारनिग-वाकिये,उनकी कटाक्ष पहेली सुलझाने में  या तो अगले दिन की वाक् की प्रतीक्षा करते हैं, या ज्यादा बेसब्रे हुए लोग उनके घर शाम  की चाय पी आते हैं| गनपत को इनकी 'अगुवाई -चार्ज' शायद महंगा न लगे, मगर भाभी जी, बिन बुलाये को झेलते वक्त जरूर ताने देती होंगी | किचन ,ड्राइंग से लगा हुआ होने से गृहणियों को अनेक फायदा होने की, बात में बहुत दमदार असर है | एक तरीके से वे बैंक-लोन ,इंश्योरेंस और पास-पड़ौसियों की, गतिविधियों की श्रोता बन कर, अपनी किटी-पार्टी को ज्ञान की लेटेस्ट किश्त जमा करती हैं |

      अगली सुबह गणपत 'बातो का एसिड टेस्ट-किट' लिए मिला |
यादव जी ,आपने बताया नहीं, किस फील्ड में भरोसा चाहिए ....? यानी आदमी ...?
वो स्वस्फूर्त केटेगरी-वाचन में लग गए |
देखिये अभी इलेक्शन, नजदीक है नहीं, लिहाजा मान के चलें कि इस मकसद से दरकार नहीं होगी |
वैसे हमारे पास दमदार ख़ास इसी काम के बन्दे हैं |जबरदस्त भरोसेदार |

 आपने फार्म भरा नहीं कि ये शुरू हो जाते हैं |
निर्वाचन सूची का पन्ना-प्रमुख बनकर ,हर पन्ने के आठ-दस लोगों की कुटाई ,उठाई और धमकाइ वो जबरदस्त कर देते हैं  कि, उस पन्ने का पूरा मोहल्ला-मेंबर,  एक तरफा आपको छाप आता है |
ये जीत की गेरंटी वाले लोग हैं | हमेशा डिमांड में रहते हैं |
आपको अगर अगला मेयर लड़ना हो तो बात करूँ ...?
मैंने झिझकते हुए कहा ....नहीं  इस किस्म की जरूरत आन पड़ी तो जरूर  कहेंगे |
वे हुम,  करके अगले टेस्ट की ओर बढे , आपको छोटे -मोटे काम जैसे माली - चौकीदार वगैरा चाहिए तो मैं बलदाऊ ,अरे वर्मा  जी को बोल दूंगा |वे भी इन्तिजाम -मास्टर हैं | भेज देंगे | वे और खुलासा ,भरोसा-भेद प्रवचन में लगे थे जो शेष घुमन्तुओं के मर्म में उतर रहा था |
मुझे मन ही मन अपने हाथ, गलत जगह डाल दिए होने का शक हुआ |
मैंने वाक् में हाथ को झटके दिए |
कहा गणपत भाई , भरोसे का आदमी, जैसा आपने इलेक्शन पन्ना-प्रमुख टाइप बयान किया हमारे लिए मिसफिट है | जिनकी बुनियाद ही धमकी-चमकी वाली हो, वे हमारे काम के नहीं हो सकते |
उन्हें , जैसे हमने खरीदे या इंगेज किये हैं , वैसे ही कहीं ऊँची बोली या  पैसो पर पलट भी तो सकते हैं ....?
      वे मेरी तार्किक-समझदारी की बात को गौर करने के बाद कहने लगे, आप सही फरमा रहे हैं |
हमें किसी ऐंगल से समझौता  करना  तो पडेगा ...?
     अगर सभी, इसी सोच के हों तो आज  पचासों साल से ये इलेक्शनबाज जिताते -हराते आ रहे हैं| ये  एकाएक लुप्त हो जाने बाले जीव हैं नहीं  | वे आगे,  'डाइनासोर के लुप्त होने की डार्विन थ्योरी' पे उतरते इससे पहले मेरा घर आ गया ,मैंने गेट खोल के अंदर जूता निकालते हुए अर्धांगनी से कहा ,ये गणपत जी अगले घण्टे दो घण्टे में आएं तो कह देना मैं पूजा में बैठा हूँ | वे मेरी पूजा में लगने वाले  समय को जानते हैं |
ख़ास बात ये कि अनवांटेड के आशंकित-आगमन पर मेरी पूजा, मैराथन स्तर पर होने लगती है | प्रभु रिजल्ट भी तुरन्त देते हैं ,वे जो बला माफिक होते हैं , टल  जाते हैं |

अगले दिन गणपत अपने कुत्ते का पट्टा, मय-कुत्ते के पकड़े आये |
मैंने कहा आज इसे भी घुमाने ले आये....? वे बोले इसे घुमाने के लिए मेरे पास दूसरे भरोसे के ईमानदार आदमी हैं |
आज मैंने इसे आपको बताने के लिए लाया हूँ कि इससे ज्यादा भरोसेमन्द कोई हो नहीं सकता | ये घर की निस्वार्थ रखवाली करता है ,क्या मजाल इनकी मर्जी के खिलाफ कोई बाउंड्री वाल तक पहुच सके | हमने इसको भरोसे के लायक बनाने में अपनी इनर्जी भी खूब लगाई है | आप कोई चीज दूर फेक देखो .... जैसे ये जुता  ... ? उतारिये ,कमाल देखिये , 'सीज़न'  का ..... आप पांच कदम चल भी नहीं पाएंगे, ये आपके कदमो में ला के रख देगा ...|
मेरे संकोच की पाराकाष्ठा मुहाने पर थी | मुझे , पिछले हप्ते खरीदे अपने जूते की गति बनती सामने नजर आ रही थी |
मैंने कहा गणपत जी आप अपनी फेक लीजिये |
वे बोले जादूगर अगर अपनी ट्रिक, अपने सामान से करे तो लोग प्रभावित नहीं होते ... कोई वाहवाही नहीं देता
कौन आपका जुता गुमा जा रहा है ... ?
दीगर साथ के घुम्मकड़ों ने गणपत की बात का पुरजोर समर्थन किया |
सीजन , जो गणपत की बात और अगले कदम की जैसे जानकारी रखता हो ,मेरे जूतों की तरफ घूर के देखने लगा |
 वे आनन-फानन मेरे जूते  को पूरे जोर लगा के उछाल मारे |
गणपत के जोश में पिछली गई रातों  के फुटबॉल-क्रिकेट  मैच का पुरजोर असर था | वे धमाके की स्पीड में यूँ फेके कि जूता सीधे दूर कीचड़ में जा धसा | उनका 'कुत्ता-भरोसा'  पांच लोगों के बीच सिद्ध हो के  टिक  गया या यूँ कहूँ मेरे जूते  की बलि चढ़ गई |
इसे धोने, और इसके लिए किसी लघुकथा की तात्कालिक पैदायश,  घर आने से पहले मुझे करनी थी | मैं उस  बयान की रूपरेखा में जुट गया |
 
तीसरे दिन तक कुत्ता प्रकरण की वजह से ,भरोसे के आदमी की भूमिका समाप्त नहीं हो पाई |
चौथे दिन, मैंने विराम देने और गनपत को 'ढुंढाई-मुक्त ' घोषित करने का ऐलान कर दिया | सब को बताया कि मेरे  बॉस को भरोसे का आदमी मिल गया है |
सबने अपनी उत्सुकता दिखाई कि भरोसे के आदमी पर ,मैं विस्तार से प्रकाश डालूं | वे कहने लगे बॉस को किस काम के लिए कैसा आदमी ढूंढा गया है बताओ  |
मैंने कहा हमारे बॉस को अगले महीने फॉरेन टूर पर जाना है|  वे आफिस के लिए एक जिम्मेदार अधिकारी ,घर और परिवार की देखरेख के लिए होनहार-सज्जन-सुशील ,  मेरे जैसे आदमी की तलाश थी | पूरे आफिस ने मेरे नाम की मुहर लगाईं तब जाके वे आश्वस्त हुए |
आइये घर चलें, आप सभी को चाय पिलाई जाए | गणपत बोले बड़े उस्ताद हो ..भाई .? हमे क्या -पता था बॉस को आप सब्सिट्यूट कर रहे हैं |
 
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2० ६ ````१८

आसमान से गिरे .....
 आसमान से गिरते हुए मैंने बहुतों को देखा है ,मगर किसी मुहावरे माफिक खजूर में लटका किसी को नहीं पाया ....| ऐ तो अपने इलाके में दूर-दूर तक खजूर के पेड़ नहीं ,दूजा आसमान को छूने वाले  आर्मस्ट्रांग  नहीं |
किसी काम को वाजिब अंजाम देने के लिए आर्म का स्ट्रांग  होना बहुत जरूरी साधन है ऐसा हमारे गुरूजी ने दूसरी तीसरी क्लास में बता दिया था|  जोश के लिए अखाड़ा पहलवानी की शर्तें भी रख दी थी | हम पहलवानी की तरफ तो नहीं गए ,केवल उनके सुझाये बादाम ने आकर्षित किया ,सो खाते रहे | फायदा ये हुआ की आर्म की बजाय हमारो खोपड़ी स्ट्रांग  होते गई |
खजूर में लटके हुओं का इंटरव्यू लेने की दबी इच्छा आज भी है | ज़ूम-कैमरे और लेटेस्ट तकनीक के मोबाइल माइक को ले के हम हमेशा तैयार रहते हैं | सुदूर जंगल से भी खबर ये आ जाए कि कोई लटका हुआ  है तो हम पहुचने की शत प्रतिशत गेरंटी देने में अव्वल  हैं |
       एक दिन जोरों से हांफता नत्थू आया ,सर जी जल्दी चलो ,आपकी इच्छा पूरी होगी | आप खजूर पर लटके हुए का इंटरव्यू लेना चाहते थे न .... ?
मुझे  अचंभित देख कहने लगा .... वो अपने गाव का है न मुच्छड़ किसान पलटू उसे गाव से बाहर 'छीन-खजूर' पेड़ तरफ रस्सी लेके जाते देखा है |
वहां -कहाँ मरने जा रहा है ..... ? चलो देखते हैं ....ताड़ी -वाडी का चक्कर होगा ...|
स्पॉट में जाने पर मामला भी बिलकुल वैसा ही पाया ....| पलटू ताड़ी उतार के खुद उत्तर रहा था ...|
हमारे दोनों कंडीशन को फुल-फिल नहीं करता था न तो वो अंतरिक्ष गिरा मानव  था ना आ के खजूर पे लटका था | फिर भी टाइम पास की गरज से उसी से कल्पित इंटरव्यू का रिहल्सल कर लिया |
पलटू को पास बुलाया | वो ताड़ी छोड़ भागने की फिराक में था नत्थू ने पकड़ लिया | पुचकारते हुए कहा घबराओ नहीं हम ताड़ी अपराध रोकने वाले महकमे के नहीं हैं | साहब जो पूछे बता दो बस ...|पलटू सहमी नजर से देखने लगा |मैंने सवाल किया ,
पलटू, बताओ तुम्हे कोई आसमा से नीचे फेक दे ,तुम जमीन पर आने की बजाय खजूर पे लटक जाओ तो क्या करोगे ....?
पलटू को प्रश्न सुनते ही ताड़ी -बोध ने फिर घेर लिया | क्या मुसीबत में फंसे स्टाइल में नत्थू तारणहार पर सवालिया निगाह फेर के कहा ,आप कह रहे थे कुछ नहीं होगा ,मगर साहेब हमें फेक रहे हैं | पलटू -नत्थू संवाद बाद वह पूरी तरह आश्वस्त होकर इंटरव्यू को राजी हो गया |
पलटू उवाच ....
साहेब जी , आप को उल-जलुल  की बहुत सूझती है ,नेता चार दिन कुर्सी से चिपक क्या जाता है उसे चारों तरफ हरा -हरा नजर आता है | गधे की हालात हो जाती है ... अरे बाप रे ... अभी तो कुछ नहीं चरा .... बहुत ज्यादा चरना बाकी है ....? उसका दम फूलने लगता है,...
साहेब हम लोग किसान हैं ,आपके सवाल के मरम तक पहुच गए हैं | किसान के  सामने आसमान से गिरने जैसी नौबत तब आती है जब हम गाँठ  के आखिरी बीज तक को खेत में बगरा के ऊपर आसमान को तकते हैं ,बरखा -मेघा . बरस भी जाओ | वे ठेंगा दिखा देते हैं |

हम साहूकार -बिचुलिये के पास बीज कर्जा लेने जाते हैं |वे हमें खजूर में लटके हुए माफिक ट्रीट करते हैं ,देखो किसनवा ,तुम ऊँचे में फंसे हो ,तुम्हे  उतारने की लंबी सीढ़ी चाहिए| इतनी लंबी सीढ़ी आर्डर पर जुगाड़ से बनती है | सबसे पहले इस एग्रीमेंट पर अंगूठा लगाओ |
हम अंगूठा लगाते -लगते पूछ बैठते हैं | कोनो जतन करो हमें धकियाने ले अब की बार बचा लो साहू जी |
-हाँ ,हाँ, हम लोग हैं इसी मर्ज की दवा | तुम्हे अच्छी से नीचे उतारने का  इंतिजाम किये देते हैं | साहूकार कागज़ समेट कर तिजौरी के हवाले करते हुए,नॉट पकड़ा देता है |
  उसकी बनाई सहूलियत की सीढ़ी से हम उत्तर तो आते हैं,  मगर लोचा फसल कटाई बाद शुरू होता  है |अंगूठा लगा कागज़ दिखा वे खड़ी सीढ़ी  को औंधा  बिछा के कहते हैं या तो इसमें लेट या अगले साल की फसल बुवाई-कटाई के लिए हमसे कर्जा ले ....|ब्याज का हिसाब अभी किया ही नहीं है |
    -इन सब झमेलों से निपटने के लिए पलटू जी  आप जैसी बिरादरी की क्या योजना है ...?
--किसान की योजना सिर्फ खेत खलिहान तक पहले की भांति होती तो ठीक .थी साहेब ....
अब कॉम्पीटीशन के जमाने में , बेटे- नातियों को स्टेंडर्ड की शिक्षा देनी है ,वे उधर गये तो इनके रहने-बसने पर खर्च होना है | जरूरत के खर्चों में आजकल नेट, टी वी,  मोबाइल जुड़ गया है इनका इंतिजाम न हो तो उनको पढाई में खलल महसूस होता है | हमारे जमाने में एक टाकीज पर फ़िल्म रिलीज होती थी तो महीनों नहीं उतरती थी | अब चार दिन चली पिक्चर सौ करोड़ कमा लेती है, ऐसा गाव वाले बताते हैं | आप जान सकते हैं ,किसानों की कमाई का, कितना अहम भाग उनके लाडले, इधर इन्वेस्ट कर रहे हैं |

सरकार ने तरक्की के नाम पर गाव  को सड़क बना-बना के जोड़ दिया|देहातों में कोने-कोने तक बाइक लोन दिलवा-दिलवा के हर घर में मोटर सायकल भिजवा दी ,टी वी फ्रीज , कूलर लगवा दिए| नतीजा क्या रहा..... ? सब कमाऊ पूत शहरोन्मुखी निक्कमे हो गये | गाँव कोई महीनों-सालों  झांकता नहीं | बेरोजगारों को कम पैसों में राशन ,पीने को सर्व सुलभ शराब है |  सरकारी ऐलान मार्फत ये सब चीजें  स्कूल-कालेज, मंदिर- देवालय के नजदीक उपलब्ध हैं ....? क्या ख़ाक खेतों में मजदूर जुटेंगे ...?
आप देख रहे हो  ये रस्सी, हर रोज ये  इच्छा होती है इसे गले ने डाल के झूल जाऊं ...? हम जैसो का आसमान से गिरना और आप जैसों का  खजूर में लटके लाशों पर राजनीति करना बहुत आसान है |
भले ,आपने पूछने की भले हिमाकत न की हो, आसमान से गिरने वाले खजूर पर कैसे लटक जाते हैं ... मेरी बात को दुनिया तक पहुचाइए सब समझदार हैं खुद जान जाएंगे ....|
माहौल में ,एक गहरी निश्तब्धता छा  गई..... मुझे लगा एक बढ़िया इंटरव्यू वाला काम निपट गया .... मगर ये क्या ....? पलटू का संवाद तो केप्चर हुआ ही नहीं .... |
पलटू के संवाद को केप्चर नहीं कर पाने का मुझे ताजिंदगी अफसोस रहेगा ,मोबाइल  का स्विच गलती से आफ रह गया था |
ऐसी चूक या  गलतियां कभी-कभी सरकार से भी हो जाती है वे कहीं, ग़रीबों की योजनाओं को शुरू करने वाले बटन को आन करना सालों भूले रहती है  |

 सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग
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१४ ,,८,१८ ,२०.६.१८