२१22 2१22 2१22
सच कहो तो आजकल दर-ब-दर हैं हम
दस्त बस्ता शहर में बे-हुनर हैं हम
नोचता है चेहरा मासूम कोई
अब किसे बतलाय कितने निडर है हम
ये अमानत सौप जानो- जिस्म देकर
ढूढने को निकले क्या-क्या गुहर हैं हम
हम कहानी किस्से की बुनियाद हो गए
सोचते हैं खलवतों जादुगर हैं हम
खबर ये वादा खिलाफी की उड़ा दे
जग ने जाना सच,चलो बे फिकर हैं हम
पुल बना कर आप चलना चाहते हो
ये हकीकत जान लो पुरखतर हैं हम
अब न रूठती है अनारकली यहां पर
नए जमाने खैरख्वाह अकबर हैं हम
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