Wednesday, 20 June 2018


12२ 12२   12२ 12२
कहीं चोट  खाए सवालो घिरे हैं
बंधे हम  मुस्काए सवालो घिरे हैं

जनाजा किसी गैर का और शामिल
रहे मुह  छिपाए सवालो घिरे हैं

नहीं बात बनती दिखे तो समझिये
बुद्दू लौट  आए सवालो घिरे हैं

जिसे नींद में चलने की आदत नहीं
तजुर्बे भुनाए, सवालो घिरे हैं

जनाजे को उनके कंधा क्या दिये हम
रहे  सर चढ़ाए ,सवालो घिरे हैं

नहीं जानता  था सबूतों में शामिल
दस्ताने छुपाए ,सवालो घिरे हैं
सुशील यादव
२. ४. १८
12२ 12२   12२ 12२
कहीं चोट  खाए हैं मेरी तरह वो
बंधे हाथ  मुस्काय हैं मेरी तरह वो

  जनाजा किसी गैर का और शामिल
  रहे मुह  छिपाए हैं मेरी तरह वो

नहीं बात बनती दिखे तो समझिये
बुद्दू लौट  आए हैं मेरी तरह वो


जिसे नींद में चलने की आदत यहाँ
तजुर्बे भुनाए हैं  मेरी तरह वो

@@
जनाजे को उनके कंधा क्या दिये हम
बेजा  सर लगे  खाये हैं  मेरी तरह वो




1222  1222 २१2

नफरतो के घने जंगल
 मुहब्बत या  जंग बराबर सा लगा
 पड़ौसी फिर  मुझे रहबर सा लगा

यकीन के बाजुओं सर पटका किए
अचानक वो कड़ा पत्थर सा लगा

लकीर जिसे नसीब कहे आदमी
कहीं वो  बेसबब अजगर सा लगा

नफरतो के घने जंगल क्या घिरे
दुआ भी पलट ढाई अक्षर सा लगा

हमेशा सावधानी की सोचिये
भले ही सांप मोम-रबर सा लगा
सुशील यादव
21.7.17

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