12२ 12२ 12२ 12२
कहीं चोट खाए सवालो घिरे हैं
बंधे हम मुस्काए सवालो घिरे हैं
जनाजा किसी गैर का और शामिल
रहे मुह छिपाए सवालो घिरे हैं
नहीं बात बनती दिखे तो समझिये
बुद्दू लौट आए सवालो घिरे हैं
जिसे नींद में चलने की आदत नहीं
तजुर्बे भुनाए, सवालो घिरे हैं
जनाजे को उनके कंधा क्या दिये हम
रहे सर चढ़ाए ,सवालो घिरे हैं
नहीं जानता था सबूतों में शामिल
दस्ताने छुपाए ,सवालो घिरे हैं
सुशील यादव
२. ४. १८
12२ 12२ 12२ 12२
कहीं चोट खाए हैं मेरी तरह वो
बंधे हाथ मुस्काय हैं मेरी तरह वो
जनाजा किसी गैर का और शामिल
रहे मुह छिपाए हैं मेरी तरह वो
नहीं बात बनती दिखे तो समझिये
बुद्दू लौट आए हैं मेरी तरह वो
जिसे नींद में चलने की आदत यहाँ
तजुर्बे भुनाए हैं मेरी तरह वो
@@
जनाजे को उनके कंधा क्या दिये हम
बेजा सर लगे खाये हैं मेरी तरह वो
1222 1222 २१2
नफरतो के घने जंगल
मुहब्बत या जंग बराबर सा लगा
पड़ौसी फिर मुझे रहबर सा लगा
यकीन के बाजुओं सर पटका किए
अचानक वो कड़ा पत्थर सा लगा
लकीर जिसे नसीब कहे आदमी
कहीं वो बेसबब अजगर सा लगा
नफरतो के घने जंगल क्या घिरे
दुआ भी पलट ढाई अक्षर सा लगा
हमेशा सावधानी की सोचिये
भले ही सांप मोम-रबर सा लगा
सुशील यादव
21.7.17
No comments:
Post a Comment