वज़्न---1222---1222---1222-1222
गली तेरे करम.की ..
मैं तुझसे मिलने का कोई बहाना ढूढ़ लेता हूँ
घने-जंगल, गड़ा-भूला, खजाना ढूढ़ लेता हूँ
गली तेरे करम की,दूर तक है अधबनी चाहे
नसीबो में लिखा अपना ,जमाना ढूढ़ लेता हूँ
न भाये है,जिसे तारीफ के पुल से गुजरना भी
उसी लम्हा झुका दूँ सर ,बहाना ढूढ़ लेता हूँ
मेरे नजदीक आके दूर मालिक था अगरा जाना
हकीकत सा ख्यालो में ,फसाना ढूढ़ लेता हूँ
जिगर में ,बात की तल्खी, लिये जीना 'सुशील'आया
तभी चुपचाप हटने का ,ठिकाना ढूढ़ लेता हूँ
सुशील यादव दुर्ग
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