२१22 २१२२ २१२
अब यहां ना आशियाँ परिंदा बचा
धूल के साये बचे,या धुँआ बचा
ले गया छीन कर बस्ती से अमन
आंसुओ खारा-सफेद कुँआ बचा
कौन वाकिफ है भली सूरत यहाँ
किसके पास कहो आइना बचा
है अदावत की खड़ी दीवार बस
आखिरी पहचान मानो निशा बचा
बीते कल को तुम भुला बैठे कैसे
स्लेट-माजी खूब सारा लिखा बचा
२ २ १ २ २ २ १ २ २1२
वो कुछ दिनों से ....
वो कुछ दिनों से इधर नहीं बोलता
मुझे चाहता है मगर नहीं बोलता
खोया रहे अपनी धुनों में मगन
उसपे नशा कोई जहर नहीं बोलता
शायद चली तलवार किसी बात पर
अपना कभी ख़ंजर नहीं बोलता
कितनी कवायद की तुझे भूलने
हमसे हमारा जिगर नहीं बोलता
तेरी महक रहती है फूलो यहाँ
यूँ खिल के तो इतर नहीं बोलता
कुछ समझ में आने लगी बात फिर
तुमसे भले बेहतर नहीं बोलता
सुशील यादव
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