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अहसास ....!
है कौन,जो तन्हाई को सदा देता है
मुझको कभी,बन के सबा हिला देता है
मैं सुनने का आदी नहीं,मगर कानो में
सुर-ताल-नगमा सा कहीं,सुना देता है
हिलती रही दीवार पर,तेरी परछाई
अहसास, अक्स कई तरह,बना देता है
जिस राह पर होती रही मुलाकाते,आज
उस रास्ते पहरा कोई बिठा देता है
गुमनाम से अँधेरे हम निकल भी आये
हालात जीना, हाल हर सिखा देता है
अंजान सा बैठा छिपा हुआ नासूर अब
खुद हरकतों अपनी कभी डरा देता है
मत सोचना, मेरे कदम के नक्शो चलना
जंगल करीब यकबयक पहुचा देता है
है तलब हमको तेरी किया क्या जाए
ये नाव गलत सुराख ही डुबा देता है
मजबूरियां है या समय फरेबी जाने
दीवार साझा बीच में उठा देता है
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग
10.7.17
अहसास ....!
है कौन,जो तन्हाई को सदा देता है
मुझको कभी,बन के सबा हिला देता है
मैं सुनने का आदी नहीं,मगर कानो में
सुर-ताल-नगमा सा कहीं,सुना देता है
हिलती रही दीवार पर,तेरी परछाई
अहसास, अक्स कई तरह,बना देता है
जिस राह पर होती रही मुलाकाते,आज
उस रास्ते पहरा कोई बिठा देता है
गुमनाम से अँधेरे हम निकल भी आये
हालात जीना, हाल हर सिखा देता है
अंजान सा बैठा छिपा हुआ नासूर अब
खुद हरकतों अपनी कभी डरा देता है
मत सोचना, मेरे कदम के नक्शो चलना
जंगल करीब यकबयक पहुचा देता है
है तलब हमको तेरी किया क्या जाए
ये नाव गलत सुराख ही डुबा देता है
मजबूरियां है या समय फरेबी जाने
दीवार साझा बीच में उठा देता है
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग
10.7.17
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