.एक एकलव्य
##
अँधेरे में मैं अब भी
तीर चला लेता हूँ
और सही मानो तो सही
निशाना लगा लेता हूँ |
तुम्हे जरूरत होगी
या तो मेरे अंगूठे की या
पूरा हाथ मांग लोगे ..?
***
तुम नहीं थे मेरे आदर्श
नहीं झुकाया था सर तुम्हारे आगे
तुमने नहीं दी थी मुझे दिशाएँ
तुम्हारी उंगली थाम के भी एक पग
चला नहीं था मैं...
नहीं किया था अनुशरण
तुम्हारे किसी दिकबोध का
तुम्हारे पग चिन्हों को ढूढते
नहीं गया था दूर अरण्य, दलदल में
पता नहीं क्यों
बावजूद इसके
तुम्हे लगता रहा
मेरी उपलब्धियों में कहीं न कहीं हो तुम
केवल तुम
**
अपनी इस सोच के दायरे से
जरा भी नहीं डिगते तुम
साधिकार
आ जाते हो
सुबह -शाम दरवाजे पर
इस तगादे में कि,
तुम्हे काट कर दे दूंगा
मैं
अपना अंगूठा
**
मेरे पिता ,
तुम्हे मालुम है आदमी जब
भूख की
अहम् की
अस्तित्व की
लड़ाई में
जब होता है
उसके सामने बौने हो जाते हैं
सभी किरदार
वे खुद लिख लेता है
अपने भोगे
यथार्थ का इतिहास
उसे याद हो आये
पुराने लनम की कोई बात
खून से लथपथ अंगूठा
अंगूठे के बीच
प्रत्यंचा में अब -तब छूटने को
तीर की नोक पर उसकी
अपनी आजीविका ...
***
सुशील यादव
२. ये वो सुबह तो नहीं ,
**
ये वो सुबह तो नहीं ,
जिसकी बांग
किसी मुर्गे ने दी हो
और
जाग गया हो
सोते से
सारा गाँव ..
वो सुबह ,कि
घण्टियाँ बजाते
चल रहे हो बैल
किसी खेत की पगडंडियों पर
और हुर्र की आवाज से चौंक कर
उड़ गई हो चहचहाट करती चिड़ियाएं
वही मस्जिद की किसी मीनार पर जा बैठते
बरबस गूंज गई हो अजान
वो सुबह जब
शब्द -कीर्तन की आवाज संग उठने को
आतुर हुई हो
सूरज की पहली आभा वाली किरणे
या जाड़े में ठिठुरते
रामायण की चौपाई बांचता
बगल से गुजर गया हो
कोई पण्डित
ये सुबह वो तो नहीं
जब
अलगू और जुम्मन
एक ही छाते में
कुछ भीगते, कुछ भागते
पड़ौस के गाँव से
बुला लाये हो डाक्टर
और बचा ली हो
प्रसव वेदना से कराहती किसी
गऊ माता की जान
ये वो सुबह भी नहीं
जब
झुर्रियों भरे चरहरों से
पर्दा करती
चुपचाप निहरे
पानी भरने
निकल रही हो औरतें
या पीछे ,नँगे-अधनंगे बच्चे
रात की बासी रोटियां लिए
माँ की घुड़कियों सुन
खपरैल के घरों को लौट रहे हो
***
शायद गाँवों में
इन दिनों भी
ऐसी सुबह हुआ करती हो
अम्न,चैन ,भाई चारे की
पर रोना तो ये है
मेरी नींद
इन दिनों
देर से खुलती है
***
सुशील यादव
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अँधेरे में मैं अब भी
तीर चला लेता हूँ
और सही मानो तो सही
निशाना लगा लेता हूँ |
तुम्हे जरूरत होगी
या तो मेरे अंगूठे की या
पूरा हाथ मांग लोगे ..?
***
तुम नहीं थे मेरे आदर्श
नहीं झुकाया था सर तुम्हारे आगे
तुमने नहीं दी थी मुझे दिशाएँ
तुम्हारी उंगली थाम के भी एक पग
चला नहीं था मैं...
नहीं किया था अनुशरण
तुम्हारे किसी दिकबोध का
तुम्हारे पग चिन्हों को ढूढते
नहीं गया था दूर अरण्य, दलदल में
पता नहीं क्यों
बावजूद इसके
तुम्हे लगता रहा
मेरी उपलब्धियों में कहीं न कहीं हो तुम
केवल तुम
**
अपनी इस सोच के दायरे से
जरा भी नहीं डिगते तुम
साधिकार
आ जाते हो
सुबह -शाम दरवाजे पर
इस तगादे में कि,
तुम्हे काट कर दे दूंगा
मैं
अपना अंगूठा
**
मेरे पिता ,
तुम्हे मालुम है आदमी जब
भूख की
अहम् की
अस्तित्व की
लड़ाई में
जब होता है
उसके सामने बौने हो जाते हैं
सभी किरदार
वे खुद लिख लेता है
अपने भोगे
यथार्थ का इतिहास
उसे याद हो आये
पुराने लनम की कोई बात
खून से लथपथ अंगूठा
अंगूठे के बीच
प्रत्यंचा में अब -तब छूटने को
तीर की नोक पर उसकी
अपनी आजीविका ...
***
सुशील यादव
२. ये वो सुबह तो नहीं ,
**
ये वो सुबह तो नहीं ,
जिसकी बांग
किसी मुर्गे ने दी हो
और
जाग गया हो
सोते से
सारा गाँव ..
वो सुबह ,कि
घण्टियाँ बजाते
चल रहे हो बैल
किसी खेत की पगडंडियों पर
और हुर्र की आवाज से चौंक कर
उड़ गई हो चहचहाट करती चिड़ियाएं
वही मस्जिद की किसी मीनार पर जा बैठते
बरबस गूंज गई हो अजान
वो सुबह जब
शब्द -कीर्तन की आवाज संग उठने को
आतुर हुई हो
सूरज की पहली आभा वाली किरणे
या जाड़े में ठिठुरते
रामायण की चौपाई बांचता
बगल से गुजर गया हो
कोई पण्डित
ये सुबह वो तो नहीं
जब
अलगू और जुम्मन
एक ही छाते में
कुछ भीगते, कुछ भागते
पड़ौस के गाँव से
बुला लाये हो डाक्टर
और बचा ली हो
प्रसव वेदना से कराहती किसी
गऊ माता की जान
ये वो सुबह भी नहीं
जब
झुर्रियों भरे चरहरों से
पर्दा करती
चुपचाप निहरे
पानी भरने
निकल रही हो औरतें
या पीछे ,नँगे-अधनंगे बच्चे
रात की बासी रोटियां लिए
माँ की घुड़कियों सुन
खपरैल के घरों को लौट रहे हो
***
शायद गाँवों में
इन दिनों भी
ऐसी सुबह हुआ करती हो
अम्न,चैन ,भाई चारे की
पर रोना तो ये है
मेरी नींद
इन दिनों
देर से खुलती है
***
सुशील यादव
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