Wednesday, 20 June 2018


चौपाई :बरसात में ....

पानी-पानी, आया पानी |  गर्मी दूर भगाया पानी ||
सबने खूब निकाले छाते | रंग-बिरंगे, काले छाते ||

सुख की गिनती कौन करेगा, अब जो भीतर भीग डरेगा |
यूँ ना देखी  होगी बारिश , सहमी-विनती और गुजारिश |

लो कृषको का मन हर्षाया, मेघ-घटा, उमड़- घुमड़ आया |
हल लेकर ये  खेतों निकले ,मिटटी कोना- सोना पिघले |

हो जाती हर शाम-सुहानी, देखो छेड़ अतीत कहानी |
बचपन की नावों का मिटना ,भीगे-भीगे  आकर  पिटना |

बारिश पानी बहता जाता ,सूखा -नाला भी  उफनाता |
किन्तु हमी-हम  ठहरे होते ,नम रिश्ते भी गहरे होते |

सुशील यादव दुर्ग

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