चौपाई :बरसात में ....
पानी-पानी, आया पानी | गर्मी दूर भगाया पानी ||
सबने खूब निकाले छाते | रंग-बिरंगे, काले छाते ||
सुख की गिनती कौन करेगा, अब जो भीतर भीग डरेगा |
यूँ ना देखी होगी बारिश , सहमी-विनती और गुजारिश |
लो कृषको का मन हर्षाया, मेघ-घटा, उमड़- घुमड़ आया |
हल लेकर ये खेतों निकले ,मिटटी कोना- सोना पिघले |
हो जाती हर शाम-सुहानी, देखो छेड़ अतीत कहानी |
बचपन की नावों का मिटना ,भीगे-भीगे आकर पिटना |
बारिश पानी बहता जाता ,सूखा -नाला भी उफनाता |
किन्तु हमी-हम ठहरे होते ,नम रिश्ते भी गहरे होते |
सुशील यादव दुर्ग
No comments:
Post a Comment