की अस्थियां ..२..
इन हाथों से पिता मैंने
दी थी चिता को आग
बस दो दिन पहले ...
आज राख में बटोरने आया हूँ
बची हुई बेबस अस्थियां
>>>
अहंकार का एक बनाया हुआ
साम्राज्य ,
होते देखा छिन्न-भिन्न
पिछले कुछ दिनों से
तुम्हारी परछाइयों से
जो खुशबु मुझे पहले छुआ करती थी
विलोपित हो गई अचानक
न जाने कहाँ ...?
न जाने क्यों मुझसे अचानक रहने लगे खिन्न
>>>
मैं अपने अहम् के दास्तानों को
अब उतार कर
फिर से चाहता हूँ
तुम्हे छूना ...
तुम्हारी उन उंगलियों को
टटोलने का भ्रम
पाना चाहता हूँ एक बार ...
जिसने मुझे उचाईयों तक पहुचाने में
अपनी ताकत
समूचे में झोकने से नहीं चुके थे किसी बार
>>>
मेरा बस चले तो
राख में बिखरी अस्थियों से
सहेज कर रख लूँ तमाम
उँगलियों के पोर-पोर
हथेली ,समूची बांह
कंधा ...
आपके कदम ...
>>>
दिल न जाने आपका
जल कर कहाँ विलीन हुआ है
दिमाग की कमजोर नसें
तमाम अग्नि दग्ध लोपित हैं
केवल प्राणायाम की मुद्रा में
सर की कुछ अस्थियां
अब भी मुझे गौर से देख रही हैं
मेरे पिता ....
मुझे मेरी गलतियों के साथ अब भी स्वीकार कर लो
मैं गंगा में तुम्हे बहा कर
केवल खुद पाप मुक्त
नहीं होना चाहता
@@@
इन हाथों से पिता मैंने
दी थी चिता को आग
बस दो दिन पहले ...
आज राख में बटोरने आया हूँ
बची हुई बेबस अस्थियां
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अहंकार का एक बनाया हुआ
साम्राज्य ,
होते देखा छिन्न-भिन्न
पिछले कुछ दिनों से
तुम्हारी परछाइयों से
जो खुशबु मुझे पहले छुआ करती थी
विलोपित हो गई अचानक
न जाने कहाँ ...?
न जाने क्यों मुझसे अचानक रहने लगे खिन्न
>>>
मैं अपने अहम् के दास्तानों को
अब उतार कर
फिर से चाहता हूँ
तुम्हे छूना ...
तुम्हारी उन उंगलियों को
टटोलने का भ्रम
पाना चाहता हूँ एक बार ...
जिसने मुझे उचाईयों तक पहुचाने में
अपनी ताकत
समूचे में झोकने से नहीं चुके थे किसी बार
>>>
मेरा बस चले तो
राख में बिखरी अस्थियों से
सहेज कर रख लूँ तमाम
उँगलियों के पोर-पोर
हथेली ,समूची बांह
कंधा ...
आपके कदम ...
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दिल न जाने आपका
जल कर कहाँ विलीन हुआ है
दिमाग की कमजोर नसें
तमाम अग्नि दग्ध लोपित हैं
केवल प्राणायाम की मुद्रा में
सर की कुछ अस्थियां
अब भी मुझे गौर से देख रही हैं
मेरे पिता ....
मुझे मेरी गलतियों के साथ अब भी स्वीकार कर लो
मैं गंगा में तुम्हे बहा कर
केवल खुद पाप मुक्त
नहीं होना चाहता
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