Friday, 15 July 2022

दर्द का दर्द से

 

2122 1222 2122 22

दर्द का दर्द से जब रिश्ता बना लेता हूं

इस बहाने सभी को अपना बना लेता हूं

@

ख़ास कुछ हैं मुकर जाते बात से अपनी

आदमी मान के अलग रास्ता बना लेता हूं

@

मज़हबी दौड़ में जा के मुल्क क्या हासिल करे

खौफ में अब धमाका ज्यादा बना लेता हूं

@

धूप में ढूढ़ता मै साया किसी बरगद का

छाँव क़ोई कसीदा मन का बना लेता हूं

@

फूल से है मुझे रंज खुशबुओं से परहेज

याद में बारहा क्यूं बगीचा बना लेता हूं

@

बहलता अब नहीं आपे से जमाना बाहर

खुश वहाँ हो सकूँ घरोबा बना लेता हूँ

@

सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर

zone-1 स्ट्रीट 3 दुर्ग छत्तीसगढ़

7000 226712


---------- Forwarded message ---------

From: sushil yadav <sushil.yadav151@gmail.com>

Date: Mon, May 9, 2022, 6:46 PM

Subject: ग़ज़ल

To: ahazindagi <ahazindagi@dbcorp.in>



2122 1222 2122 22

दर्द का दर्द से जब रिश्ता बना लेता हूं

इस बहाने सभी को अपना बना लेता हूं

@

ख़ास कुछ हैं मुकर जाते बात से अपनी

आदमी मान के अलग रास्ता बना लेता हूं

@

मज़हबी दौड़ में जा के मुल्क क्या हासिल करे

खौफ में अब धमाका ज्यादा बना लेता हूं

@

धूप में ढूढ़ता मै साया किसी बरगद का

छाँव क़ोई कसीदा मन का बना लेता हूं

@

फूल से है मुझे रंज खुशबुओं से परहेज

याद में बारहा क्यूं बगीचा बना लेता हूं

@

बहलता अब नहीं आपे से जमाना बाहर

खुश वहाँ हो सकूँ घरोबा बना लेता हूँ

@

सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर

zone-1 स्ट्रीट 3 दुर्ग छत्तीसगढ़

7000 226712


छोटी उम्र मे


2221 2221 2221 212


छोटी उम्र में बड़ा तजुर्बा.....


जाकर दूर, वापस लौटना, अच्छा नहीं लगा

रिश्तों को, अचानक तोड़ना,अच्छा नहीं लगा

# $#

मातम भी जताने लोग अब इस तरह आ रहे

रस्मों को तराजू-तौलना अच्छा नहीं लगा

# $#

काबिल हो अभी माफी के दीगर बात साहबान

गिरना आसमा तेरा कभी अच्छा नहीं लगा

# $#

तुम सम्हाल लो सल्तनत ये बेखौफ आजकल

कल तो और का है बोलना, अच्छा नहीं लगा

# $#

गम के दौर में कब चलन से बाहर हुआ 'सुशील'

खोटा सिक्का बन के पिघलना अच्छा नहीं लगा

# $#

लाखों तक रटी गिनती, करोड़ कभी सुने कहाँ

छोटी उम्र में बड़ा तजुर्बा, अच्छा नहीं लगा

# $#

अपनी हैसियत अनुसार हम रहते यहाँ कहां

मन का ठोकरों से बहलना अच्छा नहीं लगा

@@

सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर zone-1 स्ट्रीट 3

दुर्ग छत्तीसगढ़




मेरे शहर me

 


मेरे शहर में

#

दूध का मेरे शहर क़ोई धुला नहीं है

आदमी सा आदमी मुझको मिला नहीं है

#

यों कभी देखे ज़रा आता क़रार तुझे

और से तू मानता हूँ ख़ुद जुदा नहीं है

#

आसमां से खींच कैसे बाँट दूँ तुझे भी

मेरे हिस्से और तो हासिल अब हवा नहीं है

#

हो क़फ़स में क़ैद रहते हम घरों में यूं

आदमी होने का सपना जो बुना नहीं है

#

बाद जाने के बहुत तू याद भी रहे यूँ

क्या कहूँ जाना दिलो -जा अखरा नहीं है

#

हो गए हालात काबू से हमारे परे

तजुर्बे में और बड़ा सा आकड़ा नहीँ है

#

क्यूँ उठा लाई हो खुशबू में पुराने दिन

मैंने जिसको आदतो क़ोई गिना नहीँ है

#

भाइयों से ख़ूब लड़ के थक गया इसीसे

सोचता हूँ अब अदावत से फ़ायदा नहीं है

#

पाँव भारी ये अंगद क़े जिधर भी बढ़ चले

शक की बुनियादें हिली हमको पता नहीं है

#

बारूदी धुए में शहर को बाँट दो तुम

मैं रहूँ बीमार मेरी मेरी दवा नहीं है

##

सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर दुर्ग छत्तीसगढ़

मोबाइल 7000 226 712

##


जी बहलता नहीँ

 

जी बहलता नहीं.....

*

क़ोई गड़ा हमको खजाना दे दो

कुछ मुस्कुराने का बहाना दे दो 

*

जी बहलता भी अब नहीँ ख्वाबों से 

यादों का मंजर सब पुराना दे दो

*

साथी निभा ले साथ भूला वादा 

या फासलों वाला जमाना दे दो

*

काटे सितम में सादगी क़े दिन -रात

लाकर कहीं से वो सताना दे दो

*

ताबीज पाने की तलब तुमसे क्या

बीमार को लेकिन ठिकाना दे दो

*

बोलो कहाँ मौजूद हो तुम भगवान 

हर आदमी में सनक सयाना दे दो 

*

बातों क़े झगड़े यूँ नहीँ सुलझेंगे

इतिहास में दर्ज अफ़साना दे दो

*

ये कातिलों की बस्तियों में शामिल

लाखों तबाही उसे निशाना दे दो 

**

सुशील यादव

 न्यू आदर्श नगर दुर्ग छत्तीसगढ़

 मोबाइल 7000 226 712


बात तल्ख़ सी

 😘

1.

2212 2212 222

बात तल्ख़ सी

#

मेरी जुबां जब भी फ़िसल जाती है

कुछ बात तल्ख़ सी बस निकल जाती है

#

खामोश हो जीने का मकसद भी क्या

खामोशियाँ गम में बदल जाती है

#

बैसाख या आषाड़ सावन भादो

मजबूरियां मौसम निगल जाती है

#

उसको तराशे थे हमी जी जान से

हीरे की सूरत अब तो खल जाती है

#

लाखों की चाहे हो कमाई दौलत

सरकार की नजर आजकल जाती है

##


सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर,जोन 1 स्ट्रीट 3 A

दुर्ग छत्तीसगढ़

मोबाईल :7000226712


@@

2.


2212 2212 2122

सनसनी....

अब तो यहाँ इस बात की सनसनी है

हाथों में पत्थर, और जान पे बनी है

#

हमने तराशा हीरे की शक्ल-सूरत

लिपटी वहीं पे तरबतर चाशनी है

#

सरकार हैं क्यूँ आग बबुला से मेरे

दब कौन सी नस गई, चढ़ी झुंझुनी है

#

खामोश हो जीने का मकसद यहाँ क्या

आसार बारिश ,मेघ परतें घनी है

#

ये फैसलों क़े बाल सारे हैं सफेद

राहत यहां कमजोर सी संगनी है

#

तुम हो कहां सब आजमाने लगे हैं

उम्मीद की हर किरण अब अनमनी है

#

रहबर मिले तो मंजिले खूब आसान

वरना तो खुल्ले आम अब रहजनी है

##

सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर,जोन 1 स्ट्रीट 3 A

दुर्ग छत्तीसगढ़


मोबाईल :7000226712


मौसम


मौसम....
#
मेरे चाहने से कब बदला है मौसम
तेरे कहने पे जो चलता है मौसम
#
घुटने - घुटने पानी  जब नावें चलती
ठहरा - ठहरा  तब तो लगता है मौसम
#
नदिया बीच  भंवर  मेँ फँस कर ये जाना
खुद भी कितना रह लेता तन्हा मौसम
#
एक दूजे की करते पूछ परख तब तक
तिरपाल तले हो कुनबा सूखा मौसम
#
सालों बाद भटकते आया है जाने
कुछ तिलस्मी, फिल्मी कुछ गोया मौसम
#
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर,जोन 1 स्ट्रीट 3 A
दुर्ग छत्तीसगढ़
मोबाईल :7000226712

हमारे shbd

 

हमारे शब्द......

@

ना जाने

किन पैरों पर

खड़ा रहता है आसमान

दिन -रात बिना थके हुए

?

मेरे - तुम्हारे शब्दों को

बैसाखी की होती है जरूरत

.....,

हम, यहाँ -वहाँ,

अनाप -शनाप

बेहूदगी मेँ बोलते हैं,

या कहो...

सहानुभूति की किताब

उस जगह से खोलते है

जहाँ पृष्ठ भर

हासिये क़े सिवा

होता नहीं कुछ.....

@

हमी,जिद्दी, सिऱ- फिरे

इन हाशियों मेँ भी

तलाशते हैं

क़ोई ईश वंदना

किसी बुद्ध की सोच....

जैसे,

न जाने किन पैरों पर

खड़ा रहता है आसमान...?

काश....!

हमें

बता दिया गया होता

आसमान कुछ नहीँ

एक हवा है-

धुआँ है-

शून्य है....

और हवा को

धुँआ को

 शून्य को

क़ोई बैसाखी

चाहिए भी नहीँ होती?

वैसे ही वो

अपने शाश्वत सत्य पर

टिका रहता है

दिन -रात बिना थके हुए.....

काश हमारे शब्द

हवा की तरह

धुँआ की तरह

 शून्य की तरह

होते...

अपने मूल्य पर

टिके रहने को

जरूरत नहीँ होती उनको,

बाजार मेँ बिकने वाली

बैसखियों की.......


@@@#


सुशील यादव

 न्यू आदर्श नगर जोन वन स्ट्रीट 3 दुर्ग छत्तीसगढ़

7000 226712



मेरे कद की तुलना me

 

मेरे कद कि तुलना मे...


सोने जैसा जो खरा लगे है

मन ही मन वो भी डरा लगे है


फीकी मुस्कानो स्वागत करता 

पगला वैसे अब जरा लगे है


हॅसते हम जिन बातो को लेकर 

गमजदा कहीं मसखरा लगे है


खौफनाक आगे मंजर सारे

हद है तुम्हे हरा हरा लगे है


मेरी अगर सलाह को मानो

दुश्मन हथियारो भरा लगे है


जो गर्दन नापे जाता अपनी

कट्टर पंथी माजरा लगे है


हिम्मत ढेर कहीं रखते आये

तेरा होना आसरा लगे है


मेरे कद की तुलना मे सारा 

बौना सा गया गुजरा लगे है



सुशील यादव 

न्यू आदर्श नगर दुर्ग छत्तीसगढ़

मोबाईल 7000226712


मालूम किसे

Thursday, 14 July 2022

 मालूम किसे....

@
माथे  शिकन, या चेहरा चाहे
 तनाव आ जाये
सच को कभी ना बेचिये
लाखों का भाव आ जाये
@
लोगों को तुम हो तौलते
अपनी गरज से आए दिन
मकसद बिना कब पूछते,
जब ना चुनाव आ जाये
@
उनके इशारों में  फिजूल
लाखों लुटा रहे हो क्यूं?
है बात तब,
घर,ईंट, पत्थर से लगाव आ जाये
@
क्या छोड़ क़े कुनबा,
जियोगे जिंदगी, फकीरो की 
अब सोचना, इन फैसलों में
फिर कसाव आ जाये 
@
बारिश भरोसे ये नदी तो,
उफनती रही हरदम 
मालूम किसे  किस  तरफ ढाल 
कहां रिसाव आ जाये
@
सुशील यादव दुर्ग

न्यू आदर्श नगर,जोन 1 स्ट्रीट 3 A
 दुर्ग छत्तीसगढ़
मोबाईल :7000226712

बात तल्ख़ सी
#
मेरी जुबां जब भी फ़िसल जाती है
कुछ बात तल्ख़ सी बस निकल जाती है
#
खामोश हो जीने का मकसद भी क्या
खामोशियाँ गम में बदल जाती है
#
बैसाख या आषाड़ सावन भादो
मजबूरियां मौसम निगल जाती है
#
उसको तराशे  थे हमी जी जान से
हीरे की सूरत अब तो खल जाती है
#
लाखों की  चाहे हो कमाई दौलत
सरकार की नजर आजकल जाती है
##
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर,जोन 1 स्ट्रीट 3 A
दुर्ग छत्तीसगढ़
मोबाईल :7000226712

आजकल जाने क्यों.....
#
एक गलत सोच, आखों की स्याही बदल देता है
समूचे शहर को बारूदी , तबाही बदल देता है
#
फर्क पड़ता नहीं तुम्हारे ऐशो- आराम में तनिक
आंकड़ो की मुनादी ही बस गवाही बदल देता है
#
रिश्तों को निभाना इतना नहीं  आसान आपस 
जुबान की जरा तलखी आवाजाही  बदल देता है
#
मजबूरी ये कि हम बदल नहीं सकते खुद पडोसी
सामने का मुल्क बातों की कड़ाही बदल देता 
#
छीन कर ले जाता था कोई मेरा चैन -करार वही
आजकल जाने क्यों तरीका उगाही बदल देता है
#

उम्र क़े इस पड़ाव में.....
#
दर्द जहाँ मैं टांगा करता, टूटी आज वो खूंटी लगती
सारे संबल सभी आसरे,बिना असर की बूटी लगती
##

लेकर चलना उसी गली में,यादों का भरता हो मेला
बचपन खेल घरोंदे वाले,नाव डूबता रहूँ अकेला
0
अब उम्र क़े इस पड़ाव में, कितनी बातें छूटी  लगती
##
अरमानों जब पँख नहीं थे, आकाश लगा करता छोटा
उड़ने की जब ताकत आई,व्यवधानो ने अक्सर टोका
0
शेष नहीं कुछ कहने जैसा,गुम नगीना  अंगूठी लगती
##
इन बाजुओं का दम है,पहले जैसा आज भी क़ायम
आज भी  मिलने की चाहत,रत्ती भर उत्साह नहीं कम
0
चाहत की अब दुनियां तुझ बिन खाली - खाली झूठी लगती
##
उमंग उजालों की सजती,सदा रहे पहचान दिवाली
मुस्कान बांटते जाना यूँ,तमाशबीन  बजा दे ताली
0
मंहगाई की हाथ थमी हो ,विपदा की लो सूटी लगती
##
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर,जोन 1 स्ट्रीट 3 A
दुर्ग छत्तीसगढ

तमाचा वक़्त का

 

1222 1222 1222
तमाचा वक़्त का...
#
किताबों में  कहां अब  फूल मिलता है
बचे लोगों  ले दे क़े उसूल मिलता है
#
सभी पाशे चले शकुनी की अब चालें
जिसे मौका सही अनुकूल मिलता है
#
विरासत को बचाने की कवायद हो
वगरना मशवरा उल जुलुल मिलता है
#
नहीँ है कायदे से कोइ रखवाला
सियासत सादगी अब धूल मिलता है
#
क़ोई कांटे बिछा क़े जब चला जाता
तमाचा वक़्त का माकूल मिलता है
#
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर जोन वन स्ट्रीट 3 दुर्ग छत्तीसगढ़
7000 226712

 

कातिलों क़े शहर में.....
#
फूल की खुशबू  वफा में चमक क़े लिए
हो नहीँ बस जंग आपसी नमक क़े लिए
#
वक़्त ने देखा जहर नफ़रत का घुलता
बोलते क्या- क्या रहे तुम सनक क़े लिए
#
आज भी तेरी कहीं से याद आती
छोड़ती है  रात  लम्बी कसक क़े लिए
#
एक हम  जो दे रहे हैँ आज  दस्तक
यूँ सभी लापता हैं शफक क़े लिए
#
कहने को  बाक़ी बचा  क्या पास मेरे
कातिलों क़े इस शहर में रमक़ क़े लिए
#
रहगुजर में बैठ कर यूँ देखता रहा
आस तो मिटती कहां इक झलक क़े लिए
#
मयकदे में जो नसीहत पी गया हो
खैर उसकी क्या मनाएं शतक क़े लिए
#
शफक = क्षितिज की लाली
रमक़ = रही सही जान, थोड़ी सी जिंदगी
#

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर,जोन 1 स्ट्रीट 3 A
दुर्ग छत्तीसगढ़
मोबाईल :7000226712

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Mausam

 

मौसम....
#
मेरे चाहने से कब बदला है मौसम
तेरे कहने पे जो चलता है मौसम
#
घुटने - घुटने पानी  जब नावें चलती
ठहरा - ठहरा  तब तो लगता है मौसम
#
नदिया बीच  भंवर  मेँ फँस कर ये जाना
खुद भी कितना रह लेता तन्हा मौसम
#
एक दूजे की करते पूछ परख तब तक
तिरपाल तले हो कुनबा सूखा मौसम
#
सालों बाद भटकते आया है जाने
कुछ तिलस्मी, फिल्मी कुछ गोया मौसम
#
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर,जोन 1 स्ट्रीट 3 A
दुर्ग छत्तीसगढ़
मोबाईल :7000226712

 

हमारे शब्द......
@
ना जाने
किन पैरों पर
खड़ा रहता है आसमान
दिन -रात बिना थके हुए
?
मेरे - तुम्हारे शब्दों को
बैसाखी की होती है जरूरत
.....,
हम, यहाँ -वहाँ,
अनाप -शनाप
बेहूदगी मेँ बोलते हैं,
या कहो...
सहानुभूति की किताब
उस जगह से खोलते है
जहाँ पृष्ठ भर
हासिये क़े सिवा
होता नहीं कुछ.....
@
हमी,जिद्दी, सिऱ- फिरे
इन हाशियों मेँ भी
तलाशते हैं
क़ोई ईश वंदना
किसी बुद्ध की सोच....
जैसे,
न जाने किन पैरों पर
खड़ा रहता है आसमान...?
काश....!
हमें
बता दिया गया होता
आसमान कुछ नहीँ
एक हवा है-
धुआँ है-
शून्य है....
और हवा को
धुँआ को
 शून्य को
क़ोई बैसाखी
चाहिए भी नहीँ होती?
वैसे ही वो
अपने शाश्वत सत्य पर
टिका रहता है
दिन -रात बिना थके हुए.....
काश हमारे शब्द
हवा की तरह
धुँआ की तरह
 शून्य की तरह
होते...
अपने मूल्य पर
टिके रहने को
जरूरत नहीँ होती उनको,
बाजार मेँ बिकने वाली
बैसखियों की.......

@@@#

सुशील यादव
 न्यू आदर्श नगर जोन वन स्ट्रीट 3 दुर्ग छत्तीसगढ़
7000 226712

आजकल जाने क्यों

 आजकल जाने क्यों.....

#
एक गलत सोच, आखों की स्याही बदल देता है
समूचे शहर को बारूदी , तबाही बदल देता है
#
फर्क पड़ता नहीं तुम्हारे ऐशो- आराम में तनिक
आंकड़ो की मुनादी ही बस गवाही बदल देता है
#
रिश्तों को निभाना इतना नहीं  आसान आपस में
जुबान की जरा तलखी आवाजाही  बदल देता है
#
मजबूरी ये कि हम बदल नहीं सकते खुद पडोसी
सामने का मुल्क बातों की कड़ाही बदल देता है
#
छीन कर ले जाता था कोई मेरा चैन -करार वही
आजकल जाने क्यों तरीका उगाही बदल देता है
#
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर,जोन 1 स्ट्रीट 3 A
दुर्ग छत्तीसगढ़
मोबाईल :7000226712
2.....
2212 2212   1222
यूँ ही मुझे जो शर्मसार  करना था
शर्मिंदगी बेशक  इजहार करना था
==
मिलती जमाने से अगर इजाजत नहीँ
छिपते- छिपाते तुझको प्यार करना था
==
अपनों क़े मरने से निराश कुछ होते
गम सूखने का  इंतिजार करना था
==
लाये उठा जो आफ़ताब पहले ही
तो रात समझौता सौ बार करना था
==
है  सामने बिकते उसूल क़े नजीर
मगर उसी पे हमें एतबार करना था
==
@@
3...
2212  2212 222
बात तल्ख़ सी
#
मेरी जुबां जब भी फ़िसल जाती है
कुछ बात तल्ख़ सी बस निकल जाती है
#
खामोश हो जीने का मकसद भी क्या
खामोशियाँ गम में बदल जाती है
#
बैसाख या आषाड़ सावन भादो
मजबूरियां मौसम निगल जाती है
#
उसको तराशे  थे हमी जी जान से
हीरे की सूरत अब तो खल जाती है
#
लाखों की  चाहे हो कमाई दौलत
सरकार की नजर आजकल जाती है
##
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर,जोन 1 स्ट्रीट 3 A
दुर्ग छत्तीसगढ़
मोबाईल :7000226712

@@
4.

2212 2212 2122

सनसनी....

अब तो यहाँ इस बात की सनसनी है

हाथों में पत्थर, और जान पे बनी है

#

हमने तराशा हीरे की शक्ल-सूरत

लिपटी वहीं पे तरबतर चाशनी है

#

सरकार हैं क्यूँ आग बबुला से मेरे

दब कौन सी नस गई, चढ़ी झुंझुनी है

#

खामोश हो जीने का मकसद यहाँ क्या

आसार बारिश ,मेघ परतें घनी है

#

ये फैसलों क़े बाल सारे हैं सफेद

राहत यहां कमजोर सी संगनी है

#

तुम हो कहां सब आजमाने लगे हैं

उम्मीद की हर किरण अब अनमनी है

#

रहबर मिले तो मंजिले खूब आसान

वरना तो खुल्ले आम अब रहजनी है

##

सुशील यादव 

न्यू आदर्श नगर,जोन 1 स्ट्रीट 3 A

दुर्ग

 छत्तीसगढ़

 


नव भारत 5.5.19 को प्रकाशित व्यंग रचना : प्रभु मेरे 


प्रभु मेरे अवगुन


क्या प्रभु आप हमेशा मेरे अवगुन को चित्त में धर लेते हो?

अपोजिशन को ज़रा देखते भी नहीं | वहां कितना लोचा है |

प्रभु आपको मालुम नहीं जमाना बदल गया है |

हाईकमान के पास जाओ तो पूछते हैं, तुम्हारे कितने केस पेडिंग चल रहे हैं ? दो-चार बताओ तो वे कहते हैं ,हवा आने दो इधर दस-दस वाले लाईन लगाए फिर रहे हैं  |

टिकट बाटने वाले आजकल बायोडाटा जैसे पढ़ते ही नहीं | 

कैश इन हेंड वाले कालम में दस-बीस करोड़ न दिखे तो आपका आवेदन रद्दी की टोकरी में झोल खाये पतंग माफिक गिर जाता है |

बात ये नहीं की हम कार्यालय बाहर फिरने वाले दलालो से न मिलें हो |

वे हमे साइड का रास्ता ऑफर कर चुके हैं मगर वे जमे नहीं | कारण कि बहुत छुटभैयों के नाम सामने आये ,उनके दाम भी ऊँचे लगे | वे कहते कि टिकट तो पक्की जानिये, पैसा उप्पर तक जाएगा |आप हमसे संपर्क के बाद सीधे कांस्टीट्यूएंसी में प्रचार हेतु जा सकते हो |

प्रभु इनका कांफीडेंस देख के लगता है, प्रजातन्त्र की नीव बहुत गहरी होते जा रही है | सबका साथ- सबका विकास को तरजीह देने का समय अच्छा निकल आया लगता है ?

प्रभु आप अन्तर्यामी हैं | आपको मैं जीतने पर कितना चढ़ाऊंगा खूब जानते हैं |

आपसे कभी धोखा किया हो तो कहें ?

प्रभु हमें लम्बी मार्जिन वाली जीत नहीं चाहिए, बस जीत चाहिए | प्रभु आपने सपने में हमे जो निर्देश दे रखे थे, सब का पालन करते रहे | 

आपने कहा था अब नाली -सड़क के नाम पर मतदाता रीझते नहीं | 

उन्हें विकास के झमेलों से भी कोई सरोकार नहीं, बस तुम्हारे आंकड़े बोला करें  काफी है|

भक्तजन हमें ,-हमारे तम्बू में रहने का हमको बुरा कदापि नहीं लगता |

 हम धर्म की हानि होने पर अवतरित होने का वचन दिए ,बंधे हैं तो कष्ट उठाने में शर्म कैसी | हमारी तो इस विषय में चिता करने की जरूरत नहीं ....|

और हाँ ये भी बता दें ,इसी नाम से मतदाताओं से अपना उल्लू सीधा करते जाओ .... भगवान .... यानी हम स्वयं आपकी मदद करंगे | समझे की नइ .... भोलू ?

 

प्रभु यही बात तो आपसे पिछले कई इलेक्शन मुलाकातों में हुई | 

आप मुकर जाते हो | भगवान हो के ऐसा करना अशोभनीय है कहूँगा,  तो आप मुझे यहीं खड़े-खड़े निपटा देंगे?

 

इस इलेक्शन की कई नई योजना की जानकारी दे दूँ | हमारी पार्टी ने गठबंधन किये हैं | छोटे छोटे दलो को झांसे में ले रखा है | वे सोचते हैं ,हम उनको जागीर थमा देंगे | मगर वे जीतने वाले कहाँ हैं ,हमे उनकी जात ,शक्ल ,मजहब वालो को सन्देशा भेजना है हम उनके खैरख्वाह हैं ,इससे दुसरे सीट पर फर्क गिरेगा |

प्रभु पार्टी ने आरक्षण के नाम का नया विंडो खोला है | नौकरी दें या न दें ,वे पाएं या ना पाएं हमे कहने- सुनने में लुभावना लगा ,भाषण देने में वजन फील किये रहते हैं , सो इसे भी लगा रहे हैं | प्रभु पिछली बार लोगों को कुछ कैश देने का वादा कर बैठे थे आप सजेस्ट करे,-- इससे कैसे निपटें ....? क्या कहा लिमिट बढा दें ...? दुगना कर दें, ना प्रभु ना ये उनके साथ ना इंसाफी होगी ... और हाँ ... अपने रांची-आगरा वाले सब पागलखाने ओव्हर क्राउडेड चल रहे  हैं | हमारे इस बयान की असफलता पर उनको सम्हालने के लिए इन्तिजाम होने तक कुछ दूसरा बताएं |

देखो भक्त तुम लोग गंगा को 'बाढ़' की वजह से  साफ होते हर साल देखते हो ,सफाई का बहुत सा पैसा इसी से एडजस्ट हो जाता है , तुम ... यानी तुम जैसे नेता -अधिकारी का इसे कमाई के नजरिये से देखना हमे अखरता नही ,कोई बात नहीं आदत सी हो गई है ...?

बताऊं ! इस बार मेरे कुम्भ इन्तिजाम में किये काम से मैं खुश हूँ |  मतलब साफ है इसका मुआवजा तुम्हे नहीं मांगने पर भी दे जाऊंगा |

मैं तो शाबासी के लहजे में ,कहूंगा लगे रहो मुन्ना भाई.... |

तुम जानते हो न ,डुबकी 'आस्था' की हो तो फल देने में हमारा डिपार्टमेंट कोई कोताही नही करता ....|

देखे अब की , -कैसे डुबकी लगती है ,कितने देर की लगती है .....?

-प्रभु की आज्ञा पर ठंडे पानी में जोर की डुबकी हर-हर गङ्गे के नाम से हम लगा बैठे ....

इस चक्कर में  रजाई खिसक के , कमर से खूब नीचे चली गई .... लगा बहुत सा पानी मेरे नथुनों में घुस गया है |


सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर Zone 1 Street 3

दुर्ग

9408807420


--

Sushil Yadav

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प्रभु हमें लम्बी मार्जिन वाली जीत नहीं चाहिए, बस जीत चाà


 


      आंकड़े यमराज के ........


यमराज का करोना लिस्ट ,चित्रगुप्त की लापरवाही से मुझे लीक हो गया |


पूरे संसार के डाटा से, छुद्र- इंडिया के डाटा को, अलग कर पाना यूँ तो नामुमकिन था मगर देहाती कम्पूयटर मास्टर के सिखाए कुछ गुरु मंत्रो ने काम कर लिया |


तब गुरु जी को कहते  थे गुरुजी आप टाइम-पास किये दे रहे हो | बड़े –बड़े डाटा अनालिसिस का अपने को क्या वास्ता पड़ना है ?


हमको मिडिल-हाईस्कूल में फेल होने वाले या कम नंबर पाने वालों का अता-पता मिल सके बस इतना सिखा दो ....|


 गुरूजी के प्रश्नवाचक दृष्टि को हम ,यूँ संतुष्ट कर देते थे कि ,समझिये सर , इनको टूशन के लिए पकड़ना होता है | इनके माँ बाप को कन्विन्स  करा के अपनी क्लास में दाखिले में इजाफा करने का मकसद होता है | हम कंप्यूटर भी इसी बहाने सीखे ले रहे हैं |


गुरूजी को तब के दिए बयान और आज की स्तिथि में जमीन आसमान का फर्क हो गया |


हमने चन्द्रगुप्त से आग्रह किया, एक बार भारत दर्शन करा देवें .....हमारी चिरौरी ... जी हाँ ..अति चापलूसी के साथ विनती को, अपने तरफ इसी नाम से जानते हैं , जिसे उन्होंने मान लिया | शर्त रखी कि ‘एक झलक’ देख पाओगे ...? उन्हें इत्मीनान था कि भक्त में हैसियत नहीं कि इफरात लम्बे  डाटा को कोई याद कर पचाने की ताकत भी रख सकता है ...?


हमने मंजूर वाली गर्दन ,”देख ली तस्वीरे यार” नुमा झुकाते  हुए ,कमीज के फ्रंट  पाकेट में रखे मोबाइल कमरे को संचालित किया , उनके ‘भारत –दर्शन’ करोना आंकड़े को तहे दिल उतार लिया |


गनीमत उधर ‘कम्पूटर क्रांति’ की हवा फैली नहीं थी , सो एतराज या शक की किसी सुई के चुभने से सारोकार नहीं हुआ ....?


हमने गुप्त जी से आगे की  चिरौरी अमेरिका बाबत किया , तफसील से कारण बताया उस देश में हमारे बच्चे फंसे हैं .....? वे टाप सीक्रेट वाला ठप्पा दिखा कर हमारी बोलती बंद कर दिए |


हमें लगा , यही ख़ास  फर्क अपने मेनेजमेंट और दीगर ऊपर के मेनेजमेंट में है |

हम येन-केन प्रकारेण ,पिघल जाते हैं , समझौता कर लेते हैं , किसी दबाव में आ जाते हैं या सही मानों में समझो तो मनरेगा दलालों के सामने, ये सोचते हुए कि सामने एक अच्छे भविष्य का आफर है ,बिक –झुक जाते हैं...... ?


इसी झुकने –बिकने की  बदौलत, हमारे बच्चे कान्वेंट गोइंग , हमारा घर माली ,भिस्ती ,धोबी और स्टैंडरड की कामवाली बाई युक्त हो जाता है |    


उधर के मेनेजमेंट ने उत्सुकता से पूछा , तुम हमारे साथ अभी जब  ऊपर चल रहे हो , ये डाटा –साटा का आटा तुम्हारे किस काम का ....?


वो नादान ,हमसे आई टी रेड डालने वालों जैसा ट्रीटमेंट नहीं किये थे |


 मोबाइल लेपटाप ,पेन ड्राइव आदि बलात नहीं छुडाये थे |


मसलन सब का स्वामित्व अभी पता नहीं कितने देर के लिए उपलब्ध था ...?


---- हमने अपने चहेते ,विश्वासपात्र गनपत राय को तलब कर लिया |


गनपत ...मै बोल रा.....


वा .. वा   ..सर जी आप को होश आ गया .... खुदा  का लाख लाख शुक्र है ....


मैंने कहा ,ये खुदा-खुदा  कब से भजने लगा ....मुझे ये भी याद है आज शुक्र नहीं ....शनी है .....बली यानी बजरंग बली का वार है ... मै सोमवार को भर्ती .....खैर छोड़ मेरे पास टाइम कम है ...


मै तुझे सीक्रेट डाटा भेज रहा हूँ ....बीच-बीच में तुझे गाइड करता रहूंगा , इस डाटा को डिटेल में  अनालाईज करना है |


एस सी , एस टी , ओ बी सी के क्या परसेंटेज हैं | किस खेमे से कितने गए ... किस पार्टी का दिग्गज दिवंगत  हुआ | चोर ,लुटेरों ,दाता- दानी सब एक साथ नपे कि दानियों को कन्सेशन मिला | मंत्री -संतरी के बीच ‘उठने’ वालों का क्या आंकड़ा रहा ?


और गनपत खास बात तो ये कि इसमें आगामी काल में आत्मा-विहीन होने वालों की जानकारी है .... समझो तहलका मच जाएगा .... यानी नास्त्रेदमस एस्ट्रानामर को लोग भूल जायेंगे ....? है कि नइ


‘गुप्त जी’ यम के पहले सर्वे में चक्कर मार गए थे |


अरे तू क्या सोच रहा है .... मै भर्ती होते ही सठिया गया .....?


तुझसे, आगे  ये डाटा बात करेंगे .....


कम्पूटर आन कर , एक्सेल खोल , डाटा पढ़ , मुझे सुना.....


सर जी चमत्कार हो गया .....


यकीनन आप इतनी जल्दी कहीं से भी ,कैसे भी इन आंकड़ों के जनक ,डाटा इंट्री कर्ता हो ही नहीं सकते ....?


मै तत्काल आई सी यु पहुचने की कोशिश करता हूँ , पूरी दुनिया इस सच्चाई के रूबरू होने के बाद भी मान ही नहीं सकेगी ...?


जीने –मरने वालों की फेहरिश्त आगामी पूरे एक साल की आपने दी है ....गजब !


साहब जी सुन रहे हैं .....? साहेब जी .......??


शायद नेटवर्क कमजोर हो गया ......?


इस अम्फान के तूफान को भी अभी आना था ...!


.लाईट गुल ...!


अन्धेरा ....साथ में तमाम डाटा बिना सेव किये रह गया ....अफसोस ....?.


चल देखू साहेब के मोबाइल में फारवर्ड करते समय का रह –बच गया हो .....?


आई सी यु के बोर्ड पर साहब के दाखिले और मौत की तिथि कोई चाक से लिख रहा था ......


मैंने साहेब के मोबाइल की दरयाफ्त की........ पता चला कोई सगा अभी-अभी ले के निकल गया है |


उस नम्बर पर अब केवल नो रिप्लाई  है |


@@@


सुशील  यादव  


नूय आदर्श नगर जोन १ स्ट्रीट ३


दुर्ग छत्तीसगढ़ ४९१००१


 9713862473


 


 


 


 


 


 


 


 


 


 


 


 


 


 


 




--

Sushil Yadav

प्रिय भाई  !

कोरोना प्रभाव के कारण व्यंग्य यात्रा का अंक 62 -63 छपकर  पड़ा है।  डाकघर नहीं ले रहा है। , अंक 64  कब आये पता नहीं 

अतः अपनी रचना का , अन्यत्र प्रयोग कर लें।  रचनात्मक सहयोग के लिए आभार। 

प्रेम जनमेजय

Dr. Prem Janmejai

# 73 Saakshara Appartments

A- 3 Paschim Vihar, New Delhi - 110063

Phones:(Home) 011-91-11-47023944 

            (Mobile) 9811154440


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रहबर से......


जाने कब से तू, कानो में रुई डाल के बैठा है 

हरसत- आरजू कहीं,  फुर्सत निकाल  के बैठा है


यूँ किस्से रोम जलने के, हैं किताबों में मशहूर 

लिए ,वही रुतबा वही तेवर, कमाल के बैठा है


अब दुअन्नी -चवन्नी के दिन, कब से लद गए 

कीमतों को, आदमकद बड़ा उछाल के  बैठा है 


हर नुमाइश में जरूरी नहीं, बोले तूती जूतियां 

स्लीपरों के इश्तिहार पे, दिल उबाल के बैठा है 


लोगों के पूछने पर, जवाबदेही तो बनती मगर   

लगता है इन दिनों, बिना सवाल के बैठा है 


रहबर -रहनुमा अब यहाँ, राहजनी में मशगूल 

खौफ की, खबर -सनसनी सम्हाल के बैठा है    


सुशील यादव 

न्यू आदर्श नगर 

जोन १ स्ट्रीट ३ दुर्ग 

छत्तीसगढ़

9408807420 

Susyadav7@gmail.com



रायता फैलाने वाले .....


शुरू-शुरू में इस


रायता फैलाने वाले .....


शुरू-शुरू में इस वाक्यांश से जब मेरा परिचय हुआ, तब इसके मायने की गूढ़ता को समझने में थोड़ी अड़चन आई |

रायता को मैं ही क्या , हम सब,बफे-सिस्टम ईजाद होने के बाद , शादी-ब्याह में परसे जाने वाले पुराने छांछ के, नवीन संस्करण के रूप में जानते हैं |

अब आम चलन में इसके बिना छप्पन-भोग में मात्र पचपन का स्वाद लिया जान कर, मन में अधूरे पन का अहसास होता है |


 कई लोग अपने मृत्यु-भोज का मीनू तय करके मरना चाहते हैं |


वे बकायदा फेमली डिस्कसन के बाद, अपने घर वालों को हिदायत दिए जाते हैं कि उनकी याद में परसे जाने वाले भोज्य में रायता 'एक आइटम' जरूर हो |


जिस तरह  फिल्मो के आइटम सांग से दर्शक प्रभावित होते हैं , ये  लोग मानने लगे  हैं कि, हिट और सुपरहिट का नुस्खा या राज कहीं न कहीं इस 'आइटम' पीछे छुपा है |


इधर फैमली मेंबर बीच, आक्सीजन  इंतजाम के खुसुर पुसुर से जो लोग  अपनी संभावित  मृत्यु का आकलन कर्ता बन जाते हैं , मैं उनको 'एम बी ऐ, डिग्री धारियों' का 'बाप' समझता हूँ |


कुछ मास्टर माइंड धारी, अक्सर ये सोच कायम कर लेते हैं , “साले ,जिंदगी भर हम कमाए ,बचा-वचा के ले तो न जा सकेंगे ,तो खर्च का रायता क्यों न  फैलाते जायँ”..... 

 

ऐसा ही खयाल प्रतिष्ठित सम्मानीय   पुरोहित ,"पण्डित भोजनालय" के  प्रोपाइटर ,चार - मंजिले लॉज,होटल व्यवसायी,करोना चपेट में आ कर  लगभग जिंदा बचे  भयग्रस्त  श्यामलाल जी को  आया।

कुछ- कुछ, उनके जी में ये भी आया  कि,चलो ,जीते-जी,मरणासन्न होने के ढोंग को, रायता कटोरी में रख देखें....?


वे अक्सर दैनिक समाचार पत्रों में  निधन समाचार पढ़ते।

अपने हम उम्र लोगों के निधन पर चर्चा करना,और मोबाइल नंबर उपलब्ध हो तो परिवार को सांत्वना देना  नही भूलते ।

परिवार वाले जितना उनको टेंशन फ्री रखने की जुगत करते वे उतना ही डिप्रेस होते ।


उनके हरकतों की जानकारी  विस्तार से मुझे मुहैया कराई गई।मेरा उनसे दोस्ती का पिछला दुरुस्त  रिकार्ड  ,उन्हें इस बात के लिए प्रेरित किया हो? बहरहाल मैं संकट मोचक भूमिका में उपलब्ध हो गया।


मैं ,ये क्या हाल बना रखा है ,कुछ लेते क्यों नहीं स्टाइल में दाखिल हुआ । लँगोटिये , ये बता ......सब तुम्हारी सेवा में तत्पर हैं तुझे क्या चाहिए ?  औलादे ,तुम्हारे बताये मार्ग पर चलेगी .....?

-तुमने उनके लिए जी-जान एक कर ,सब सुविधाएं उपलब्ध करा दी ।आज तेरी मर्जी चलेगी ।

श्यामलाल ने कहा,मेरे बेटे, अपने -अपने हिस्सो का -अपना धंधा मजे-मजे सम्हाले बैठे है।इन चार में से तीन का मत है, मृत्यु- भोज अनावश्यक खर्च है । इस बाबत वे सामाजिक मीटिंग में कई बार बोल चुके हैं।


चौथा अमेरिका में रहता है ,विदेशी कल्चर वाली बहु है। उसे  यहां के क्रियाकलाप में शामिल होने का क्या सरोकार .....?  मौक़ा मिलेगा या नहीं कुछ कहा नहीं जा सकता ...?

 इन अमेरिका वालों के  पास  ऐन वक्त पर ख़ास जगह ,नहीं पहुचने के कई बहाने होते हैं।

आज के दौर में ताजा-ताजा रटा-रटाया करोना बहाना सामने है ? 

उधर  के लोग तुरंत ,तत्काल या इमरजेंसी में भी आकर टाइमली कन्धा देने से रहे ? 

मैं अपने उठावने को भव्य देखने की तमन्ना रखता हूं ।

बिलकुल अपने दादा की तरह बैंड बाजा और ढेर सारे लोगों के साथ मरघट मार्ग तय करना चाहता हूं। 


-दरअसल सुशील भाई ,यही चिंता कभी- कभी मेरी भी रातों की नींद उड़ा देती है | आए दिन सरकारी घोषणा कि दस बीस लोगों में मरने वाले को निपटा दिया जाए,मुझे व्यवस्था के विपरीत सोचने को विवश कर देती है। 

हाय,इस काल में रूदाली भी मिलने से रही ?


सच कहूँ तो ,मैं खुद की मृत्य-भोज पार्टी में , अपने करीबियों को, नखरे  करते देखने का आनंद लेना चाहता हूँ|


बाज दफे, मैंने कई शादी-ब्याह और दूसरे आयोजनों   में लोगों को तरह-तरह के नुस्ख निकालते देखा है |


कुछ कमेंट्स जो याद हैं ,बताये देता हूँ,


- स्साले ने हराम के पैसों में कितनी बड़ी नुमाइश लगा दी है|”रायता देखो .... पानी है” ...


हरमी ने ,बहुत सारे कार्ड बंटवा दिए ... खाने का इन्तिजाम भी उसी ढंग का होना मांगता की नइ....? 


छिछोड़े का “रायता देखो .... छाछ  में नामक डाल रखा है”। पता नही क्या उप्पर ले जाएगा ।


साले  अमीरो को  गिफ्ट की पड़ी रहती है, सिवाय गिफ्ट के कुछ सूझता नहीं ..... “रायता देखो .....


-इस रायते को देख भला कौन कहेगा सेठ धनपत के बेटे का  बुलावा रिशेप्शन है” |


सुशील भाई ,ये रंग-ढंग देखकर मैं चाहता हूँ समाज एक बार तृप्त होकर, 

वो कहते हैं न, घीसू-माधो, मुंशी प्रेमचन्द स्टाइल वाली दावत छक के उड़ा ले।


मुझे परमानन्द की अनुभूति होगी ?

मेरी वैतरणी में मानो ट्रेक्टर टायर लग जायेंगे ।


आज के ये बच्चे मृत्यु-भोज के अपोजिट लाख लेक्चर दें, हम पुराने लोगों की परंपराओं को तोड़ के कोई नई बात साबित नहीं कर पाएंगे |


परलोक सुधारने का नाम लेते ही इन बच्चों को , दिवंगत नानी रौद्र रूप में नजर आने लगती हैं| 


मुझे मालुम है,मार्डन जमाने के बच्चे  इसे फिजूलखर्ची मान के  हाथ  खींचने के प्रयास जरूर करेंगे  ? 


मुझे अनाथ -बेसहारा की केटेगरी में, ‘ऊपर जाना’ एकदम अखर जाएगा।

उस लोक में भी तो चार के सामने होने वाली फजीहत की सोच के दिल बैठा जाता है।....... मेरी मायूसी और हताशा को आप समझ रहे ना .... ?


- मुझको अपनी औलाद से ज्यादा आप पर भरोसा है |


-आप एक काम करना, मैं पोस्ट डेटेड चेक दिए देता हूँ, आप मेरा सद्कर्म बिना किसी को खबर हुए, धूमधाम से करवा देना|


सबके मुह को बंद करने वाला भोज होना चाहिये , वो भी , क्वालिटी रायता के साथ |


-मैंने कहा पण्डित जी आप अभी दो-तीन महीने में थोड़े बिदा हो रहे हैं ?


- फिर मजाक के लहजे में ये भी जोड दिया कि  रोज चेक काटते –भुनाते का लम्बा   तजुरबा रखते  हैं ,फिर काहे भूल रहे चेक इशु तारिख से फकत  तीन महीने तक वैलिड होते हैं  .....


अरे ये तो मैने ध्यान नहीं दिया , कोई बात नहीं वे गंभीर थे, बोले , कल ही पाँच लाख की 'एफ डी' आपके एकाउंट में जमा कर  देता हूँ .


जिंदगी का क्या भरोसा ....?


मैने कहा शयामलाल जी , इतने पैसो का अब करना क्या ? 


क्यों भइ ? 


_आपको मालुम नहीं..... अब कानून सारे बदल गये हैं, मय्यत- मातमपुर्सी में बीस लोगों के शरीक होने का फरमान अमल में लाया जा रहा है।

 आपके चक्कर में पुलिस मुझे जरूर उठा लेगी ।

आपके वो जमाने लद गए जब  नामी  –गिरामी के  उठावने मिसाल हुआ करते थे । सैकड़ों लोग  बिना बुलाए हाजिर होंते थे ।


-यार तू एक काम कर , मय्यत की फिकर न कर वो जैसे भी सरकारी फरमान माफिक निपटा देना ....मगर पार्टी वाली बात पर गौर करना ....बोले तो खर्चे की रकम और बढ़ा देता हूँ .....


.....अपने तरफ हर कानून में तोड़ की गुंजाइश तो रहती है ,तू दस बीस होटल  बुक करना जहां रिश्तेदारों की फौज हों हर उस शहर में  , जहां समधीयाने में   दस बीस आदमी मिले, भोज व्यवस्था  का निमंत्रण  देना , आपकी सरकार आपके द्वार माफिक मैनेजमेंट हो ।

निमन्त्रण... पाकर कम से कम.पांच छह सौ जीम लें  मेरी आत्मा तृप्त जो जाएगी .....हाँ रायते के स्वाद में किसी दिन कोई कमी न रहे ....बस 


मुझे लगा शयामलाल का ‘वांछित – दिन’,क्या पता , इसी साल की किसी  तारीख में मुकर्रर हो शायद ....|


सुशील यादव 



Sushil Yadav

 New Aadarsh Nagar zone 1 Street 3 durg Chhattisgarh

susyadav7@gmail.com

9426 764 552

 वाक्यांश से जब मेरा परिचय हुआ, तब इसके मायने की गूढ़ता को समझने में थोड़ी अड़चन आई |

रायता को मैं ही क्या , हम सब,बफे-सिस्टम ईजाद होने के बाद , शादी-ब्याह में परसे जाने वाले पुराने छांछ के, नवीन संस्करण के रूप में जानते हैं |

अब आम चलन में इसके बिना छप्पन-भोग में मात्र पचपन का स्वाद लिया जान कर, मन में अधूरे पन का अहसास होता है |


 कई लोग अपने मृत्यु-भोज का मीनू तय करके मरना चाहते हैं |


वे बकायदा फेमली डिस्कसन के बाद, अपने घर वालों को हिदायत दिए जाते हैं कि उनकी याद में परसे जाने वाले भोज्य में रायता 'एक आइटम' जरूर हो |


जिस तरह  फिल्मो के आइटम सांग से दर्शक प्रभावित होते हैं , ये  लोग मानने लगे  हैं कि, हिट और सुपरहिट का नुस्खा या राज कहीं न कहीं इस 'आइटम' पीछे छुपा है |


इधर फैमली मेंबर बीच, आक्सीजन  इंतजाम के खुसुर पुसुर से जो लोग  अपनी संभावित  मृत्यु का आकलन कर्ता बन जाते हैं , मैं उनको 'एम बी ऐ, डिग्री धारियों' का 'बाप' समझता हूँ |


कुछ मास्टर माइंड धारी, अक्सर ये सोच कायम कर लेते हैं , “साले ,जिंदगी भर हम कमाए ,बचा-वचा के ले तो न जा सकेंगे ,तो खर्च का रायता क्यों न  फैलाते जायँ”..... 

 

ऐसा ही खयाल प्रतिष्ठित सम्मानीय   पुरोहित ,"पण्डित भोजनालय" के  प्रोपाइटर ,चार - मंजिले लॉज,होटल व्यवसायी,करोना चपेट में आ कर  लगभग जिंदा बचे  भयग्रस्त  श्यामलाल जी को  आया।

कुछ- कुछ, उनके जी में ये भी आया  कि,चलो ,जीते-जी,मरणासन्न होने के ढोंग को, रायता कटोरी में रख देखें....?


वे अक्सर दैनिक समाचार पत्रों में  निधन समाचार पढ़ते।

अपने हम उम्र लोगों के निधन पर चर्चा करना,और मोबाइल नंबर उपलब्ध हो तो परिवार को सांत्वना देना  नही भूलते ।

परिवार वाले जितना उनको टेंशन फ्री रखने की जुगत करते वे उतना ही डिप्रेस होते ।


उनके हरकतों की जानकारी  विस्तार से मुझे मुहैया कराई गई।मेरा उनसे दोस्ती का पिछला दुरुस्त  रिकार्ड  ,उन्हें इस बात के लिए प्रेरित किया हो? बहरहाल मैं संकट मोचक भूमिका में उपलब्ध हो गया।


मैं ,ये क्या हाल बना रखा है ,कुछ लेते क्यों नहीं स्टाइल में दाखिल हुआ । लँगोटिये , ये बता ......सब तुम्हारी सेवा में तत्पर हैं तुझे क्या चाहिए ?  औलादे ,तुम्हारे बताये मार्ग पर चलेगी .....?

-तुमने उनके लिए जी-जान एक कर ,सब सुविधाएं उपलब्ध करा दी ।आज तेरी मर्जी चलेगी ।

श्यामलाल ने कहा,मेरे बेटे, अपने -अपने हिस्सो का -अपना धंधा मजे-मजे सम्हाले बैठे है।इन चार में से तीन का मत है, मृत्यु- भोज अनावश्यक खर्च है । इस बाबत वे सामाजिक मीटिंग में कई बार बोल चुके हैं।


चौथा अमेरिका में रहता है ,विदेशी कल्चर वाली बहु है। उसे  यहां के क्रियाकलाप में शामिल होने का क्या सरोकार .....?  मौक़ा मिलेगा या नहीं कुछ कहा नहीं जा सकता ...?

 इन अमेरिका वालों के  पास  ऐन वक्त पर ख़ास जगह ,नहीं पहुचने के कई बहाने होते हैं।

आज के दौर में ताजा-ताजा रटा-रटाया करोना बहाना सामने है ? 

उधर  के लोग तुरंत ,तत्काल या इमरजेंसी में भी आकर टाइमली कन्धा देने से रहे ? 

मैं अपने उठावने को भव्य देखने की तमन्ना रखता हूं ।

बिलकुल अपने दादा की तरह बैंड बाजा और ढेर सारे लोगों के साथ मरघट मार्ग तय करना चाहता हूं। 


-दरअसल सुशील भाई ,यही चिंता कभी- कभी मेरी भी रातों की नींद उड़ा देती है | आए दिन सरकारी घोषणा कि दस बीस लोगों में मरने वाले को निपटा दिया जाए,मुझे व्यवस्था के विपरीत सोचने को विवश कर देती है। 

हाय,इस काल में रूदाली भी मिलने से रही ?


सच कहूँ तो ,मैं खुद की मृत्य-भोज पार्टी में , अपने करीबियों को, नखरे  करते देखने का आनंद लेना चाहता हूँ|


बाज दफे, मैंने कई शादी-ब्याह और दूसरे आयोजनों   में लोगों को तरह-तरह के नुस्ख निकालते देखा है |


कुछ कमेंट्स जो याद हैं ,बताये देता हूँ,


- स्साले ने हराम के पैसों में कितनी बड़ी नुमाइश लगा दी है|”रायता देखो .... पानी है” ...


हरमी ने ,बहुत सारे कार्ड बंटवा दिए ... खाने का इन्तिजाम भी उसी ढंग का होना मांगता की नइ....? 


छिछोड़े का “रायता देखो .... छाछ  में नामक डाल रखा है”। पता नही क्या उप्पर ले जाएगा ।


साले  अमीरो को  गिफ्ट की पड़ी रहती है, सिवाय गिफ्ट के कुछ सूझता नहीं ..... “रायता देखो .....


-इस रायते को देख भला कौन कहेगा सेठ धनपत के बेटे का  बुलावा रिशेप्शन है” |


सुशील भाई ,ये रंग-ढंग देखकर मैं चाहता हूँ समाज एक बार तृप्त होकर, 

वो कहते हैं न, घीसू-माधो, मुंशी प्रेमचन्द स्टाइल वाली दावत छक के उड़ा ले।


मुझे परमानन्द की अनुभूति होगी ?

मेरी वैतरणी में मानो ट्रेक्टर टायर लग जायेंगे ।


आज के ये बच्चे मृत्यु-भोज के अपोजिट लाख लेक्चर दें, हम पुराने लोगों की परंपराओं को तोड़ के कोई नई बात साबित नहीं कर पाएंगे |


परलोक सुधारने का नाम लेते ही इन बच्चों को , दिवंगत नानी रौद्र रूप में नजर आने लगती हैं| 


मुझे मालुम है,मार्डन जमाने के बच्चे  इसे फिजूलखर्ची मान के  हाथ  खींचने के प्रयास जरूर करेंगे  ? 


मुझे अनाथ -बेसहारा की केटेगरी में, ‘ऊपर जाना’ एकदम अखर जाएगा।

उस लोक में भी तो चार के सामने होने वाली फजीहत की सोच के दिल बैठा जाता है।....... मेरी मायूसी और हताशा को आप समझ रहे ना .... ?


- मुझको अपनी औलाद से ज्यादा आप पर भरोसा है |


-आप एक काम करना, मैं पोस्ट डेटेड चेक दिए देता हूँ, आप मेरा सद्कर्म बिना किसी को खबर हुए, धूमधाम से करवा देना|


सबके मुह को बंद करने वाला भोज होना चाहिये , वो भी , क्वालिटी रायता के साथ |


-मैंने कहा पण्डित जी आप अभी दो-तीन महीने में थोड़े बिदा हो रहे हैं ?


- फिर मजाक के लहजे में ये भी जोड दिया कि  रोज चेक काटते –भुनाते का लम्बा   तजुरबा रखते  हैं ,फिर काहे भूल रहे चेक इशु तारिख से फकत  तीन महीने तक वैलिड होते हैं  .....


अरे ये तो मैने ध्यान नहीं दिया , कोई बात नहीं वे गंभीर थे, बोले , कल ही पाँच लाख की 'एफ डी' आपके एकाउंट में जमा कर  देता हूँ .


जिंदगी का क्या भरोसा ....?


मैने कहा शयामलाल जी , इतने पैसो का अब करना क्या ? 


क्यों भइ ? 


_आपको मालुम नहीं..... अब कानून सारे बदल गये हैं, मय्यत- मातमपुर्सी में बीस लोगों के शरीक होने का फरमान अमल में लाया जा रहा है।

 आपके चक्कर में पुलिस मुझे जरूर उठा लेगी ।

आपके वो जमाने लद गए जब  नामी  –गिरामी के  उठावने मिसाल हुआ करते थे । सैकड़ों लोग  बिना बुलाए हाजिर होंते थे ।


-यार तू एक काम कर , मय्यत की फिकर न कर वो जैसे भी सरकारी फरमान माफिक निपटा देना ....मगर पार्टी वाली बात पर गौर करना ....बोले तो खर्चे की रकम और बढ़ा देता हूँ .....


.....अपने तरफ हर कानून में तोड़ की गुंजाइश तो रहती है ,तू दस बीस होटल  बुक करना जहां रिश्तेदारों की फौज हों हर उस शहर में  , जहां समधीयाने में   दस बीस आदमी मिले, भोज व्यवस्था  का निमंत्रण  देना , आपकी सरकार आपके द्वार माफिक मैनेजमेंट हो ।

निमन्त्रण... पाकर कम से कम.पांच छह सौ जीम लें  मेरी आत्मा तृप्त जो जाएगी .....हाँ रायते के स्वाद में किसी दिन कोई कमी न रहे ....बस 


मुझे लगा शयामलाल का ‘वांछित – दिन’,क्या पता , इसी साल की किसी  तारीख में मुकर्रर हो शायद ....|


सुशील यादव 



Sushil Yadav

 New Aadarsh Nagar zone 1 Street 3 durg Chhattisgarh

susyadav7@gmail.com

9426 764 552


हवा लात की याद मेँ

 हवा – लात की याद में ....

हवा की जमाखोरी भी एक दिन जुर्म बन जाएगी, ऐसा कभी सोचा नहीं था | 
जुर्म भी वो संगीन कि हवालात की सैर करा देगी ,सपने में आया  नहीं था | 
काश ये मालुम होता ....?
हम आक्सीजन पैदा करने वालो की मैय्यत में नहीं जाते | 
मरहूम आक्सीजन वाले माथुर साहब के इन्तिकाल की खबर मिली | 
बेचारे निहायत शर्मिंदगी पसंद इंसान थे | 
न किसी के लेने में न देने में, कभी लोचा करते पाए गए | 
उनकी बंद होती कर्ज दबी फेक्ट्री को हमने मेनेजर बन के सम्हाल लिया | उन दिनों फेक्ट्री में बने आक्सीजन को दैनिक उपयोग में कोई खरीदता नहीं था | नेचरल हवा पे लोगों का भरोसा जादा था | भूले से कोई ठेले पर आक्सीजन ले लो की गुहार लगाता मिल जाता तो उसे चाय- भजिये खरीदने लायक आमदनी नहीं हो पाती | चंद लोहे वाली इकाइयों के भरोसे आप कितना कमा लोगे , वाले वे दिन थे | 
माथुर साहब इन्ही का रोना , गला तर होते ही, आये दिन किया करते थे | उनको तरह – तरह से सिश्वास – दिलासा दिलाये जाने का नुस्खा यार – दोस्तों में आजमाया जाता मगर निराश – डिप्रेशन के नजदीक जाते लोगों के लिए , शब्दों के बाँध में बिना बरसात हुए , पानी सहेज कर रखने जैसा प्रयास कहा सकता था ....? लिहाजा वे बीमार इकाई के साथ खुद बीमार रहने  लगे | 
इधर हमने अपनी देखरेख और दोस्ती की हिमायत में, निस्वार्थ  फेक्ट्री को पटरी पर ला दिया | 
माथुर भाई , मुझे अचानक  अविश्वास की नजर से देखते का शौक पालने लगे , उनके भीतर का भय , कहीं ये सारा हडप न ले , से भी मै वाकिफ था | उन्हें जितना विशास दिलाता वे उतने अपने प्रति हिसक हो जाते | तबियत बिगाड़ बैठे | उन्ही दिनों ,तब आक्सीजन की मांग पीक पर आ चुकी थी फेक्ट्री के दिन यूँ फिरे कि गेट से लेकर छत दीवार जिन्हें रंग –रोगन प्लास्टर की वर्षो से दरकार थी आनन फानन में पूरी हो गई | आस-पास की दूसरी इकाइयों में जलन की बू तारी होने लगी | वे इस तरक्की को बर्दाश्त करने की क्षमता रखने में नाकाम रहे | 
माथुर साहब को करोना पाजिटिव की शिनाख्ती पर निकट के अस्पताल में भर्ती किया गया , आक्सीजन सिलेंडर की डिमांड की गई , अस्पताल को जरूरत से भी ज्यादा सिलेंडर भिजवा दिया गया | वे तब भी बच नहीं सके | 
जाते-जाते पता नहीं वे किस इरादे से मेरे खिलाफ रिपोर्ट लिखा गए,वक्त रहते मैंने उनके लिए हवा का इंतजाम नहीं किया | फेक्ट्री में मुनाफे के लिए वाजिब दाम से अधिक में आक्सीजन की बिक्री की | 
पुलिसिया जाँच जारी है |  
हवा बेचने पर ‘लात’ की व्यवस्था इस जमाने के उसूलो में जब शमिल हो तो कोई क्या कर सकता है ?
चलूं , माथुर साहब के लिए ,चार कन्धों , कफन , दाह- संस्कार का मानवीय फर्ज अपनी तरफ से कर दूँ | 
सुशील यादव 
२०२ श्रीम सृष्टि
शालिग्राम , अटलाद्ररा
वडोदरा ३९००१२ 
मोबाइल 7000226712 

 

चाँद में सुलभ शौचालय व्यवस्था

इंस्पेक्टर माता दीन के बाद मेरा बुलावा चाँद से आया |

बाकायदा एलियन- यान में मुझे सादर, चाँद की धरती पर उतार दिया गया |

मैंने पूछा मुझे अपराधी की तरह धरती से उठा लाने का मकसद मैं जान सकता हूँ ?

 वे बोले घबराइए मत हमने बहुत पड़ताल के बाद आपके रूप में बहुआयामी आदमी का चयन चाँद के लिए किया है |

आप ने अपने देश में शौचालय- क्रांति लाने के लिए अनेक अखबारों में बार- बार गुहार लगाई है| कई धरना आयोजित किए |आपके शौचालय पर लिखे अनेक  लेख से चाँद वाले प्रभावित  होते रहे | अब चूँकि , हमारे चाँद पर  शीघ्र ही मानव दल का आगमन संभावित है |जाहिर है वे शौच भी करंगे | हमे चाँद की स्वच्छ जमीन पर मानव गंदगी का कूड़ा नहीं देखना है | आप हमें स्वच्छ- जीवन के पाठ पढाते- सिखाते रहें |

 आप जानते हैं अमेरिका-रसिया –चीन वाले , पिछली विजिट में कद्दू- लौकी टाइप के कई बीज फेक गए हैं , उसकी फसल इस धरती पर जोरों से लहलहा रही है , हमारे लिए वो सब खर-पतवार के लेबल का है , हम आपको वो इलाका दिखाने  ले चलेंगे |

मैंने कहा वो तो ठीक है , मैं जानना चाहता हूँ , इससे पहले एक मिस्टर मातादीन भी इधर आये थे उनका क्या हुआ ?

वे चाँद पर मेरी एतिहासिक जानकारी  से खुश हुए |

अपने गार्ड को मुझे मातादीन चौक ले जाने का इशारा किया |

देखिये मिस्टर लेखक ! हाँ , जब तक आपको चाँद सरकार कोई नाम नहीं देती, तब तक आप इसी नाम से यहाँ संबोधित होंगे | हाँ तो हम कह रहे थे, आपके इंस्पेक्टर मातादीन को हम चाँद वाले काकू की तरह ,  काकू बोले तो आपके तरफ के बापु....समझते हैं ना ?  वैसे ही मानते हैं | हालात ये  है, यहाँ  जगह –जगह सड़क रोड , चौराहे सब में उनका नाम फिट हो गया है  |

एक चौराहे पर उनकी आदमकद स्टेचू में फूल माला लगी थी , मैंने पूछा मातादीन दिवंगत हो गए क्या ?

 मैंने अंदाजा लगाया तक़रीबन सिक्सटी  इयर हो गये होंगे उन्हें आये ...उस पर उनकी खुद की उम्र .?

 वे कान  पर हाथ धरते हुए बोले नहीं , वे मरे नहीं हैं ....ऐसा सोचना पाप है | उनकी कान वाली अगाध- श्रधा देख कर भारतीय होने का गर्व हुआ | उन्होंने बताया ,हमारे तरफ जो रिटायर हो जाते हैं उनको ये फूल माला पहना कर सार्वजिनक सम्मान दिया जाता है|उनको किसी भी बाहरी से मिलने जुलने की पाबंदी होती है |वे चाँद के सीक्रेट को साझा कर सकें ऐसे अनुमान को सिरे से रद्द करने का ये चोखा-चाँद फार्मूला कहलाता है | चाहें तो आप इस विषय में पी एच डी करने का लुफ्त उठा सकते हैं |

 मैंने अनुमान लगाया करीब दस साल बाद,तक  अगर यहाँ टिक गया तो , मेरी पोजीशन ठीक यही होगी | मुझे अच्छा भी लगा |

मैंने एहतियातन , खालिस हिन्दुस्तानी दिमाग लगाते हुए पूछ लिया .... आपके तरफ कोई बेईमानी करे तो उसकी सज़ा क्या है ...?

वे आखे ततेर कर मेरी ओर देखे , उन्हें लगा मैं खास- हिन्दुस्तानी अंदाज में पेश हो गया हूँ | मुझे तत्काल इस बात का अहसास हो गया | मैंने सफाई में कहा यूँ ही जानकारी के लिए पूछ रहा था | इस वाकिये को अपने जेहन से निकाल दीजिये |

वे बोले हम ऐसों को त्रिशंकु में फ़ेंक देते हैं |

त्रिशंकु ! आपने यहाँ आते हुए देखा होगा |विज्ञान के किस्सों में, जिसे ब्लेक –होल कहते हैं, वैसा ही होता है | उधर सब जा तो सकता है , वापिस आता नहीं ....| आपने देखा होगा ..... कैसे एक्स्ट्रा गियर और एक्स्ट्रा फियुल के साथ यान को इस त्रिशंकु - बार्डर क्रास करवाया जाता है ....?अकेले आदम जात को बस अपने ढाचे के गलने तक सडना होता है ?    

      आरंभिक पूछ-ताछ सत्र के बाद मैंने पूछा आप लोगों को चाँद पर शौचालय बनाने का एकाएक ख्याल कैसे आया ?

      वा जनाब , क्या हम इंडियन इकानामी से इतने नावाकिफ लगते हैं आपको ?

हमारे तरफ हर कंट्री का अख़बार आता है ?

हमारा  नेट  चार – पाँच जी वाला नहीं, सैकड़ों जी वाला  एडवांस टेक्नोलाजी का है ....?

एक रीजन, जो शुरू में बताया कि आने वाले सालों में चाँद- विजिट के बंपर आफर जो आप धरती वालों ने विज्ञापित कर रखे हैं, हमारे तरफ लोगो की वैसी भीड़ पलेगी जैसे साठ-सत्तर के दशक में हिंदी सिनेमा की प्रीमियर रीलीज पर टिकट विंडो में होती थी  | चन्द्र यान यात्रा के लिए  सैकड़ों रॉकेट आपके हरिकोटा और दीगर जगह के सेटेलाईट लांचर में कतार में खड़े होने वाले हैं |

दूसरी बात ये , कुछ ऊपर वाले  परमात्मा भी कोविड- ट्रांसफर  केस को चाँद पर पुनर्जन्म देने की योजना बना सकते हैं  , कहा नहीं जा सकता ? ऐसे ढेरों जन्म को यहाँ अकोमोडेट करने की नैतिक जिम्मेदारी चाँद प्रशासन की होगी .....?

आप निश्चिंत रहें !,आप अकेले पर समूचे काम का बोझ नहीं डालेंगे | आप अपने चहेते ठेकेदारों –कमैय्या लोगों की लिस्ट दे देवे , सप्ताह  बाद वे सब इधर दिखेंगे |  

उन्होंने मुझसे पलट कर पूछ लिया ,आप एक बात का खुलासा कीजिये , अचानक आपके तरफ शौचालय ली मांग इतनी क्यों बढ़ गई ....?

देहात में लोग मजे से प्रकृति का आनन्द लेते शौच क्रिया से फारिग हो लेते थे ,,,,?

मैं ऐसे असहज प्रश्न के लिए कतई तैयार नहीं था, डिप्लोमेटिक जवाब देते  कहा , बात यूँ है उधर राज्य प्रशासन मंनरेगा चलाती है यानी मजदूरों को काम की गेरंटी यानि पेमेंट , यानी मजदूरों को फूल दो टाइम का खाना ,,,,,स्कूलों में मिड डे मील देती है , यानी बच्चो का फूल टाइम खाना , इन बच्चो के माँ- बाप द्वारा बच्चों के लिए बनाये - बचे अतिरिक्त भोजन का सेवन खुद कर लेते हैं  ,यानि एक्सेस इटिंग , शहर में बर्गर –पिज्जा के सैकड़ों स्टाल , चौबीस घंटे खाना .... आप समझ सकते हैं इन सब खानों का जवाब मलद्वार के मार्फत ही तो आएगा .....?

दूसरी बात अपनी कंट्री में बाहर के शिंजो आबे ,ओबामा ,ट्रम्प, पुतिन ,शिनपिन ,टैप लोगों का न्योंता बढ़ गया , अब उनसे  सैकड़ों किलोमीटर की रेल पटरी को कहाँ  तक ढांप पाते .....? लिहाजा .....

वे इशारों में बात समझ गए |

मेरी मानिए आप इधर भी पापुलर स्कीम मंनरेगा , बच्चों को स्कुल में मिड डे मील की व्यवस्था करवा दें |

 वैसे आबादी के बढ़ने  की आप लोग अभी सालों प्रतीक्षा कर सकते हैं ?

आगे आपकी कंट्री की बेहतरी और जानकारी के लिए मेरे पास योजनाओं की लम्बी फेहरिस्त  है,  मसलन

सुई में धागा डालने के नियम से लेकर फाइटर प्लेन,मित्र राष्ट्र से कैसे बिना कमीशन के ख़रीदे ,,,,,,आदि

ये सब नियमावली का डिजाइन आप कहें तो आपके देश में प्रचलित दलाली के दायरे से बाहर की बनाई  जा सकती है |

बोले तो “त्रिशंकु- खौफ लेश”....

विश्वास रखे ! काम की उच्च क्वालिटी  आपको  मातादीन- माफिक, खालिस हिन्दुस्तानी टच वाली   मिलेगी |

जयहिंद .....

सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर

जोन 1 स्ट्रीट 3 दुर्ग , छत्तीसगढ़

mob: 7000226712

 


चाँद में सुलभ शौचालय व्यवस्था

इंस्पेक्टर माता दीन के बाद मेरा बुलावा चाँद से आया |

बाकायदा एलियन- यान में मुझे सादर, चाँद की धरती पर उतार दिया गया |

मैंने पूछा मुझे अपराधी की तरह धरती से उठा लाने का मकसद मैं जान सकता हूँ ?

 वे बोले घबराइए मत हमने बहुत पड़ताल के बाद आपके रूप में बहुआयामी आदमी का चयन चाँद के लिए किया है |

आप ने अपने देश में शौचालय- क्रांति लाने के लिए अनेक अखबारों में बार- बार गुहार लगाई है| कई धरना आयोजित किए |आपके शौचालय पर लिखे अनेक लेख से चाँद वाले प्रभावित होते रहे | अब चूँकि , हमारे चाँद पर शीघ्र ही मानव दल का आगमन संभावित है |जाहिर है वे शौच भी करंगे | हमे चाँद की स्वच्छ जमीन पर मानव गंदगी का कूड़ा नहीं देखना है | आप हमें स्वच्छ- जीवन के पाठ पढाते- सिखाते रहें |

 आप जानते हैं अमेरिका-रसिया –चीन वाले , पिछली विजिट में कद्दू- लौकी टाइप के कई बीज फेक गए हैं , उसकी फसल इस धरती पर जोरों से लहलहा रही है , हमारे लिए वो सब खर-पतवार के लेबल का है , हम आपको वो इलाका दिखाने ले चलेंगे |

मैंने कहा वो तो ठीक है , मैं जानना चाहता हूँ , इससे पहले एक मिस्टर मातादीन भी इधर आये थे उनका क्या हुआ ?

वे चाँद पर मेरी एतिहासिक जानकारी से खुश हुए |

अपने गार्ड को मुझे मातादीन चौक ले जाने का इशारा किया |

देखिये मिस्टर लेखक ! हाँ , जब तक आपको चाँद सरकार कोई नाम नहीं देती, तब तक आप इसी नाम से यहाँ संबोधित होंगे | हाँ तो हम कह रहे थे, आपके इंस्पेक्टर मातादीन को हम चाँद वाले काकू की तरह , काकू बोले तो आपके तरफ के बापु....समझते हैं ना ? वैसे ही मानते हैं | हालात ये है, यहाँ जगह –जगह सड़क रोड , चौराहे सब में उनका नाम फिट हो गया है |

एक चौराहे पर उनकी आदमकद स्टेचू में फूल माला लगी थी , मैंने पूछा मातादीन दिवंगत हो गए क्या ?

 मैंने अंदाजा लगाया तक़रीबन सिक्सटी इयर हो गये होंगे उन्हें आये ...उस पर उनकी खुद की उम्र .?

 वे कान पर हाथ धरते हुए बोले नहीं , वे मरे नहीं हैं ....ऐसा सोचना पाप है | उनकी कान वाली अगाध- श्रधा देख कर भारतीय होने का गर्व हुआ | उन्होंने बताया ,हमारे तरफ जो रिटायर हो जाते हैं उनको ये फूल माला पहना कर सार्वजिनक सम्मान दिया जाता है|उनको किसी भी बाहरी से मिलने जुलने की पाबंदी होती है |वे चाँद के सीक्रेट को साझा कर सकें ऐसे अनुमान को सिरे से रद्द करने का ये चोखा-चाँद फार्मूला कहलाता है | चाहें तो आप इस विषय में पी एच डी करने का लुफ्त उठा सकते हैं |

 मैंने अनुमान लगाया करीब दस साल बाद,तक अगर यहाँ टिक गया तो , मेरी पोजीशन ठीक यही होगी | मुझे अच्छा भी लगा |

मैंने एहतियातन , खालिस हिन्दुस्तानी दिमाग लगाते हुए पूछ लिया .... आपके तरफ कोई बेईमानी करे तो उसकी सज़ा क्या है ...?

वे आखे ततेर कर मेरी ओर देखे , उन्हें लगा मैं खास- हिन्दुस्तानी अंदाज में पेश हो गया हूँ | मुझे तत्काल इस बात का अहसास हो गया | मैंने सफाई में कहा यूँ ही जानकारी के लिए पूछ रहा था | इस वाकिये को अपने जेहन से निकाल दीजिये |

वे बोले हम ऐसों को त्रिशंकु में फ़ेंक देते हैं |

त्रिशंकु ! आपने यहाँ आते हुए देखा होगा |विज्ञान के किस्सों में, जिसे ब्लेक –होल कहते हैं, वैसा ही होता है | उधर सब जा तो सकता है , वापिस आता नहीं ....| आपने देखा होगा ..... कैसे एक्स्ट्रा गियर और एक्स्ट्रा फियुल के साथ यान को इस त्रिशंकु - बार्डर क्रास करवाया जाता है ....?अकेले आदम जात को बस अपने ढाचे के गलने तक सडना होता है ?    

      आरंभिक पूछ-ताछ सत्र के बाद मैंने पूछा आप लोगों को चाँद पर शौचालय बनाने का एकाएक ख्याल कैसे आया ?

      वा जनाब , क्या हम इंडियन इकानामी से इतने नावाकिफ लगते हैं आपको ?

हमारे तरफ हर कंट्री का अख़बार आता है ?

हमारा नेट चार – पाँच जी वाला नहीं, सैकड़ों जी वाला एडवांस टेक्नोलाजी का है ....?

एक रीजन, जो शुरू में बताया कि आने वाले सालों में चाँद- विजिट के बंपर आफर जो आप धरती वालों ने विज्ञापित कर रखे हैं, हमारे तरफ लोगो की वैसी भीड़ पलेगी जैसे साठ-सत्तर के दशक में हिंदी सिनेमा की प्रीमियर रीलीज पर टिकट विंडो में होती थी | चन्द्र यान यात्रा के लिए सैकड़ों रॉकेट आपके हरिकोटा और दीगर जगह के सेटेलाईट लांचर में कतार में खड़े होने वाले हैं |

दूसरी बात ये , कुछ ऊपर वाले परमात्मा भी कोविड- ट्रांसफर केस को चाँद पर पुनर्जन्म देने की योजना बना सकते हैं , कहा नहीं जा सकता ? ऐसे ढेरों जन्म को यहाँ अकोमोडेट करने की नैतिक जिम्मेदारी चाँद प्रशासन की होगी .....?

आप निश्चिंत रहें !,आप अकेले पर समूचे काम का बोझ नहीं डालेंगे | आप अपने चहेते ठेकेदारों –कमैय्या लोगों की लिस्ट दे देवे , सप्ताह बाद वे सब इधर दिखेंगे |  

उन्होंने मुझसे पलट कर पूछ लिया ,आप एक बात का खुलासा कीजिये , अचानक आपके तरफ शौचालय ली मांग इतनी क्यों बढ़ गई ....?

देहात में लोग मजे से प्रकृति का आनन्द लेते शौच क्रिया से फारिग हो लेते थे ,,,,?

मैं ऐसे असहज प्रश्न के लिए कतई तैयार नहीं था, डिप्लोमेटिक जवाब देते कहा , बात यूँ है उधर राज्य प्रशासन मंनरेगा चलाती है यानी मजदूरों को काम की गेरंटी यानि पेमेंट , यानी मजदूरों को फूल दो टाइम का खाना ,,,,,स्कूलों में मिड डे मील देती है , यानी बच्चो का फूल टाइम खाना , इन बच्चो के माँ- बाप द्वारा बच्चों के लिए बनाये - बचे अतिरिक्त भोजन का सेवन खुद कर लेते हैं ,यानि एक्सेस इटिंग , शहर में बर्गर –पिज्जा के सैकड़ों स्टाल , चौबीस घंटे खाना .... आप समझ सकते हैं इन सब खानों का जवाब मलद्वार के मार्फत ही तो आएगा .....?

दूसरी बात अपनी कंट्री में बाहर के शिंजो आबे ,ओबामा ,ट्रम्प, पुतिन ,शिनपिन ,टैप लोगों का न्योंता बढ़ गया , अब उनसे सैकड़ों किलोमीटर की रेल पटरी को कहाँ तक ढांप पाते .....? लिहाजा .....

वे इशारों में बात समझ गए |

मेरी मानिए आप इधर भी पापुलर स्कीम मंनरेगा , बच्चों को स्कुल में मिड डे मील की व्यवस्था करवा दें |

 वैसे आबादी के बढ़ने की आप लोग अभी सालों प्रतीक्षा कर सकते हैं ?

आगे आपकी कंट्री की बेहतरी और जानकारी के लिए मेरे पास योजनाओं की लम्बी फेहरिस्त है, मसलन

सुई में धागा डालने के नियम से लेकर फाइटर प्लेन,मित्र राष्ट्र से कैसे बिना कमीशन के ख़रीदे ,,,,,,आदि

ये सब नियमावली का डिजाइन आप कहें तो आपके देश में प्रचलित दलाली के दायरे से बाहर की बनाई जा सकती है |

बोले तो “त्रिशंकु- खौफ लेश”....

विश्वास रखे ! काम की उच्च क्वालिटी आपको मातादीन- माफिक, खालिस हिन्दुस्तानी टच वाली मिलेगी |

जयहिंद .....

सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर

जोन 1 स्ट्रीट 3 दुर्ग , छत्तीसगढ़

mob: 7000226712

 


खुली जीप में...
#
वादों की रस्सी में तनाव आ गया है
मंदिर के चर्चे हैं,चुनाव आ गया है
#
खुली जीप में सवार हैं इल्लियाँ
मिया की दौड़ में कसाव आ गया है
#
रोगग्रस्त थीं उफ ये नदी पांच साल से
अब क़े बारिश कैसा बहाव आ गया है
#
गुस्ताख़ स्वागत माफ करना हुजूर
चेहरे में मसलन खिचाव आ गया है
#
जा रहा था लादेन अपने पाँव चल क़े
पुतिन क़े घर फिर ठहराव आ गया है
#
हुकूमत की ऐसी क्या लगी है आदत
सच बेच दें बोलो,भाव आ गया है
#
कुछ लोग उठाने को कतरा रहे परचम
इरादों में इनके बदलाव आ गया है
#
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर जोन 1स्ट्रीट 3
दुर्ग छत्तीसगढ़

Vnnvv

किसी को खाली जुबान मत दो

सवईया ###
7भगण स
8सगण, सवईया
112 112 112 112 112 112 112 112

मन प्राण बचा तब जान सका दुविधा दिन बीत गए अब से
सब ने परवा कर ली अपनी सुविधा सब बैठ गए कब से
हम साथ न मंजिल पा सकते अकुलाहट में फिरते तब से
जिनको लगता अब  जीवन सूतक लाश बने रहते जब से
अपनी पहचान लिए फिरता पर हाथ नहीं मिलता कुछ भी
दुखिया जग में कठनाई कहें कुछ मांग नहीं सकते रब से

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर जोन 1स्ट्रीट 3
दुर्ग छत्तीसगढ़
112 112 112 112 112 112 112 112
अपनी पहचान बना मत बोल कहीं
साथ नहीँ निभता खुद ही
##

क़ीमत आज बढ़ी लगती हमको इसको रखना मन में
@

7भगण+ ss सवईया
#
211 211 211 211 211 211 211 22
#
दीपक  ज्ञान कहीं जलता मन  आँगन रोशन रोशन होता
जो तुम साथ निभा सकती दिल यौवन सा खिलता नभ सोता
जान रहे हम  ताकत से तलवार उठा कब वार करे हैं
रोज तनाव थके उलझे  रह,जीवन सागर पार करे हैं
हूक उठी रहती मन में हर ओर लगा पहरा मन माना
ख्याल करे अब कौन यहाँ किसका सच गौरव गान बजाना
##

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर जोन 1स्ट्रीट 3
दुर्ग छत्तीसगढ़

और नहीं तब कौन उठा सकता हित गौरव राहत बीड़ा
@@
नाव सवार ज पूछत  है हम नीक  लगी कब पार
@@@p@

देश बचा सकते हम भी सह  दूभर पीठ  म खाकर गोली
रंग भरी रख गागर आँगन फाग डिगा रखती सब होली
@

क्षमता की तौल....
*
जीवन की कुछ मर्यादा समझो
कम बोलो और ज्यादा समझो
तल्ख हकीकत के आगे भाई
पूरी क्षमता भी आधा समझो
*
समय नदी पर विपरीत दिशा में
तैरने वाले बहुधा कम होते
पाषाणों पर कितने ,बीज डाल
बिन बारिश की  हैं फसलें बोते

धरा बोझ बन इतराने वालो
खुद को तौलो या बाधा समझो
*
पीठ दिखा तुम, कब आए  रण से
ले वीरोचित व्यवहार डटे थे
मां बहनों की इज्जत -आबरू
सिंदूर- महावर की लाज ढके थे

आए कालजयी से टकराने
तुच्छ सभी सब को सादा समझो
*
मौके सभी को बराबर  आते
लेकिन भुना कुछ लोग ही पाते
अवसर पर गांठ लगाने वाले
रस्सी अक्सर मजबूत बनाते

सीखो तो हर मजबूरी हममें
भर देती जोश - इरादा समझो
*
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर जोन 1स्ट्रीट 3
दुर्ग छत्तीसगढ़
9408807420
मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 83, अप्रैल(द्वितीय), 2020
तेरे कत्ल का इल्जाम........
सुशील यादव दुर्ग
                
मैं उसके बाद  नहीं,उसके पेश्तर भी नहीं था
मेरे मिजाज में तल्ख कोई तेवर भी नहीं था

मेरे वजूद को लोग नकार देते हैं अक्सर
मेरे वजूद में नौलखा जेवर भी नहीं था

एक तेरा एहसास रहता था मेरे आस-पास
मगर कुछ दिनों से ऐसा मंजर भी नहीं था

जाने क्यों तेरे कत्ल का इल्जाम   है 'सुशील'
मेरे घर से बरामद कोई ख़ंजर भी नहीं था

लोग यहां अपनी तारीफों के इश्तिहार बांटते
मुझमे वो हौसला- हुनर, इस कदर भी नहीं था
@@
😢मुझे जो लूट ले……

पुराना वो समय-शहर कहाँ है
मुझे जो लूट ले रहबर कहाँ है

दुआ बुजुर्ग की होती साथ कभी
बता दो अब वही गुहर कहाँ है

बहुत कमजोर सायकल का पहिया
समझ-सोच कहना पंचर कहाँ है

फकीरों की सुनो आयेगा कल
गये-बीते की अब फिकर कहाँ

अनारकली झुका दे सल्तनत को
सितम ढाने बचा अकबर कहाँ है

सुशील यादव
2.6.17

कविता ·  Reading time: 1 minute

इस तरफ आएगा कौन…..212 212 212

सब के आगे उदासी न रख
तलब को और प्यासी न रख

है मुझे रात भर जागना
जुगनुओं की तलाशी न रख

इस तरफ आएगा कौन अब
मुल्तवी और फांसी न रख

इश्क मुश्क छुप जाए भला
कोशिश खारिश-खांसी न रख

इत्र शीशी हो सिरहाने में
खुशबु अपनी दवा सी न रख

सुशील यादव
3.6.17

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कविता ·  Reading time: 1 minute

भूल गये तुमको …..

भूल गये तुमको, यूँ बातों ही बात में हम
इतने भीगे तनहा बारिश,-बरसात में हम

ज़ुल्म -सितम क्या जानो, सहना पड़ता जब भी
फिर छोटी कुटिया,फिर वो ही औकात में हम

जिस हाल में हम हैं, सहने की क्षमता टूटी
क्षीण हुए भीतर ,सदमो की हालात में हम

एक कहर लगती, आज सजा सौ-सालो की
काटें कैदे-उमर कैसे हवालात में हम

बचपन नावें, कागज़ की क्या तैरा करती
उस पर बहतेे ,कोरे- कोरे जज्बात में हम

दरख्त  सुखों से फूला-  फलता दिखता
काट-गिराने को रहते अक्सर घात में हम
सुशील यादव
४.६. १७

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धुँआ-धुँआ

धुआं -धुआं ,है शहर में, हवा नहीं है
मैं जो बीमार हूं ,मेरी दवा नहीं है

तलाश उस शख्स की, है अभी जारी
जिसके पांव , छाले -छाले जो थका नहीं है

कहां तक लादकर, हम बोझ को चले
बनके श्रवण, मां-बाप को पूजा नहीं है

दंगो के शहर, दहशत लिए जीता हूं मैं
कोई हादसा करीब से, छुआ नहीं है

लहरो से मिटी रेतों की इबारत
सीने लिखा नाम तो ,मिटा नहीं है

सुशील यादव दुर्ग छत्तीसगढ़

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गज़ल/गीतिका ·  Reading time: 2 minutes

किस दिन मैं छिपा करता हूँ

करोड़ बारह सौ फूंके हैं ,बांटे मोबाइल सरकार
गंवार-अपढ़ जनता होवे,मोबाइल की क्या दरकार

जिन गावो में भूखा प्यासा,खेती करता दिखे किसान
मोबाइल उन हाथो देकर,तुम समझो खुद धन्य महान

नक्सलवादी वहीँ जमे हैं ,ले पैसा इस नाम अकूत
रोजाना ताबूत भेजे जाते ,भारत वीर जवान सपूत

किस मिटटी के तुम हो माधो ,ह्रदय तुम्हारा हाय कठोर
विपदा- संकट रखते साथी ,नेता- अफसर चिन्दी चोर

कौन योजना के बलबूते ,होगी अब की नैय्या पार
जनता और भरम में डालो ,कर लो फिर से छल व्यापार

विकास मुद्दे चुनाव गायब , कहो राज के तारणहार
मोबाइल दे के लूट रहे , सरकारी संचित भंडार

पढ़ने वाले बच्चो को देकर ,करते यहां गहन अपराध
भटकाने-दौड़ाने पथ में ,छोड़ दिए हो क्रोधित बाघ

जनमत को अब मत भटकाओ,देना होगा सभी हिसाब
बन्द करो ये दारू खाने, मुफ्त बांट चुनावी शराब
सुशील यादव दुर्ग

धुआं धुआं है शहर में हवा नहीं है
मैं जो बीमार हूं मेरी दवा नहीं है

तलाश उस शख्स की है अभी जारी
जिसके पांव में छाले छाले जो थका नहीं है

कहां तक लादकर हम बोझ को चले
बनके श्रवण मां-बाप को पूजा नहीं है

दंगो के शहर दहशत लिए जीता हूं मैं
कोई हादसा करीब से छुआ नहीं है

लहरो से मिटी है रेतों की इबारत
सीने से मिटे नाम जो लिखा नहीं है
मैं सपनों का ताना-बाना यूँ अकेले बुना करता हूं
मंदिर का करता सजदा मस्जिद भी पूजा करता हूं

जिस दिन मिलती फुर्सत मुझको दुनिया के कोलाहल से
राम रहीम की बस्ती , अलगू जुम्मन ढूंढा करता हूं

जब-जब बादल और धुएं में गंध बारूदी मिल जाती है
उस दिन घर आंगन छुपके पहरों पहरों रोया करता हू

मजहब धर्म के रखवाले इतने गहरे उतर न पाते
मैं सुलह की गहराई से मोती सांफ चुना करता हूं

आओ हम अपना उतारे ,ओढा पहना बेसबब नकाब
मेरी शक्ल से वाकिफ तुम,मैं किस दिन छुपा करता हूँ
सुशील यादव
न्यू आदेश नगर दुर्ग छत्तीसगढ़

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नाव को फेंक

2122:1212: 2211: 2122: 2 फर्क पड़ता नही…ं
sushil yadav
sushil yadav

कविता

July 7, 2017

नाव को फेंक, पाँव में, जो भँवर बाँध लेते हैं
लोग नादान जीने का अजब हुनर बाँध लेते हैं

फर्क पड़ता नही जमाने को मेरे होने का शायद
एवज मेरे यहां घरो में जानवर बाँध लेते हैं

देख बारिश संभावना, परिंदे अपनी समझ से ही
आप तिनका उठा कहीं पास शजर बाँध लेते हैं

जो निवाले तलाशते, बीता बचपन उसे ढूढते
खौफ चलते हमी सरीखे लो शहर बाँध लेते हैं

लोग चुप हैं, कि हादसा छूकर निकला नही वरना
एहतियातन वही गठरियों पत्थर बाँध लेते हैं

सुशील यादव::: न्यू आदर्श नगर दुर्ग : ५.७.१७

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सीने में लिखा नाम

सीने में लिखा नाम
धुआँ-धुआँ है शहर में, हवा नही है
मै जो बीमार हूं ,मेरी दवा नहीं है

तलाश उस शख्श की, है अभी जारी
जिसके पावों छाले-छाले, जो थका नहीं है

कहाँ तक लाद कर हम ,बोझ को चलें
बनके श्रवण माँ –बाप को पूजा नहीं है

दंगो के शहर दहशत लिए फिरता हूँ मै
कोई हादसा करीब से बस छुआ नहीं है

लहरों से मिटी है , रेतो की इबारत
सीने में लिखा नाम तो मिटा नहीं है

Sushil Yadav,09426764552,

कोई दीवार तो ढूढ….

रोने की बात पर कहकहा लगा भाई
समय के साथ ही निशाना लगा भाई

तबीयत पूछता है कौन बीमार की
टिफिन है सामने खाना लगा भाई

नदारद हुए किसी पे अब यकींन के दिन
कोई सूरत फिर भरोसा लगा भाई

जिदों से चल नहीं पाती कभी दुनिया
किनारे करीब चल नौका लगा भाई

मचाये रहती है जो पेट में खलबली
सभी बातों बहस-छौका लगा भाई

कोई दीवार ढूढ ‘सुशील’कद माफिक
मुझे दीवार फिर ज़िंदा लगा भाई

सुशील यादव

गज़ल/गीतिका ·  

किताबों में दबे फूल का मौसम ..

रवानी खून में ,ख्यालो मे ललक नहीं है
तेरी आँखों में पहले की चमक नहीं है

कभी आती दूर से आवाज तेरी सी
वहां देखू कोई वैसी गमक नहीं है

खुली है खिड़कियां खामोश दरबाजे
लिफाफे गलत पते के हो शक नहीं है

किताबों में दबे फूल का न हो मौसम
रिवाजो में खिले फूल में महक नहीं है

मेरी नाकामियां घेरे रही मुझको
मगर आँखों हया दिल में झिझक नहीं है

सुशील यादव

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बात पहुचानी है सुशील जी ….2122, 2212, 2212,2122

आँख में आंसू, तलब का जखीरा ले के क्या करोगे

अश्क पीछे
जखीरा ले के
क्या करोगे

बात पहुंचानी हैं, सुशील  जी......

2212       2212        2212   222

उम्मीद का  भाई जखीरा ले करोगे तुम क्या
आगे किसी के सिर्फ रोना ले करोगे तुम क्या

हो _पाँव में जंजीर तो वाजिब कहाँ ये सोच
बस हाथ -ढपली  या मंजीरा ले  करोगे तुम क्या

कितने सितम के मायने  होते किसे था मालूम
फतवों तराशा आदमी हीरा ले करोगे तुम क्या

बाजार में,बलिदान में,वो याद आते भी रहे
अब सूर मीरा ,ya- कबीरा ले करोगे तुम क्या

मानो  किताबों के सभी खुद आप थे योद्धा सजग
चाहें अगर  दर्जा वही -रुतबा ले के करोगे
तुम क्या
उँटों को पहुचानी है अपनी बात जो कि सुशील जी
कहने को मुट्ठी  भर ये जीरा ले करोगे तुम क्या

सुशील यादव
१३.१.१७

_पाँव में हो जंजीर तो वाजिब नहीं सोचना ये
_ढोल-ढपली या हाथ मंजीरा ले के क्या करोगे

सितम के कितने मायने होगे किसे था पता तब
फकत फतवों में आदमी हीरा ले के क्या करोगे

_लेखनी मे ं ,बाजार में,बलिदान में, याद आते
_सूर-मीरा,संत-सजग कबीरा ले के क्या करोगे

वो किताबों के लोग थे इतिहास के सब पुरोधा
असल में वो दर्जा वही -रुतबा ले के क्या करोगे

ऊँट तक पहुचानी है तुमको बात अपनी सुशील जी
मुठ्ठियों कहने भर बोलो जीरा ले के क्या करोगे

सुशील यादव
१३.१.१७

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/गीतिका ·  Reading time: 1 minute

जिसे सिखलाया बोलना…..2122 १२२२ 2212

चश्म नम और दामन तर होने लगा
जिन्दगी सादगी से बसर होने लगा

जो निचोड़ के रखा है अपना आस्तीन
अब पसीने से नम कालर होने लगा

दाउदों के पते पूछो तो हम कहें
पाक-दोहा कभी तो कतर होने लगा

बाज आऊं बुरी हरकत से मै कभी
मय नशी में इधर-ऊधर होने लगा

अब मेरी मंजिलो के मिलते हैं निशान
पांव के छालो का असर होने लगा

बेजुबां बुत जिसे सिखलाया बोलना
पलटते ही मेरे पत्थर होने लगा
सुशील यादव

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ज़ल/गीतिका ·  Reading time: 1 minute

बस ख़्याले बुनता रहूँ…………सुशील यादव

बस ख़्याले बुनता रहूँ…………सुशील यादव

अँधेरे में दुआ करूँ, ऐ ख़ुदा परछाई दे
बेख़्याली में निकले, जो नाम सुनाई दे

करवट न बदलूँ, कोई ख़्वाब न देखूँ
नीद से उठते तेरी, याद जुम्हाई दे

क़समों का क़सीदा हो, कहीं वादों का हो ताना
ख़्याले बुनता रहूँ, बस यूँ तन्हाई दे

उजड़े गुलशन में, सब्ज़-शजर देखूँ
हो तब्दील क़िस्मत, जन्नत ख़ुदाई दे

रिश्तों की अदालत, बेजान हलफ़नामे
या मुझे ज़िंदा रख, या मेरी रिहाई दे

-सुशील यादव

गज़ल/गीतिका ·  Reading time: 1 minute

आम आदमी …..

221 1221 1221 122
आम आदमी …..

हमने तुमको नोट बदलते नहीं देखा
काले-उजले फेर में चलते नहीं देखा

तुम सितमगरों की दुनिया,रहने के आदी
चट्टान दबे नीचे, निकलते नहीं देखा

जो आज कमा ली,हो गया बसर के लायक
हो ईद- दिवाली कि, उछलते नहीं देखा

टूटे हुए लगते हैं सभी चाँद सितारे
किस्मत की बुलन्दी को निगलते नहीं देखा

पानी की तरह हो गया है खून तुम्हारा
खूं जैसे इसे हमने उबलते नहीं देखा

सुशील यादव
२६.११.१६

गज़ल/गीतिका ·  Reading time: 1 minute

खिले-खिले फूल ….. नींद में कोई चल के देखे काले…

खिले-खिले फूल …..

नींद में कोई चल के देखे
काले नोट बदल के देखे

एक नटनी रस्सी पे चलती
यूँ भी कोई सम्हल के देखे

कोई सूरत नजर न आती
छुपे चेहरे असल के देखे

जुम्मन मिया की बोलती बंद
अलगु खौफ़ अजल के देखे

हर आहट जो नोट छुपाते
गायब नखरे अकल के देखे

इच्छाओं को मारने निकले
खून-खराबे मक़तल के देखे

एक गरीब की आस था पैसा
अमीर फंसे दलदल के देखे

जाने क्या कल अंजाम हो साथी
खिले-खिले फूल कमल के देखे

सुशील यादव

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कहते हैं आजकल …..

नासूर का होता अगर…..

नोटबन्दी शायद कहीं हथौड़ा सा बन गया
कोई उठा के फायदा थोड़ा सा बन गया

मार्केट जिसकी थी नहीं वेल्यु किसी प्रकार
वो हिंनहिनाता दौड़ता घोडा सा बन गया

नालायक गिने जाते थे जो हरेक काम मगर
घर छोड़ के वो सुर्ख़ियों भगोड़ा सा बन गया

दिखने में थी वो शक्ल से सुन्दर सी छोकरी
अब नाक देखो आप ही पकोड़ा सा बन गया

इल्जाम थे खून के तो कोई बात भी न थी
नीयत से वो बदमाश ही छिछोड़ा सा बन गया

कब बाप को बेहाल जाता छोड़ कर बेटा
कहते हैं पर आजकल वो भगोड़ा सा बन गया

नासूर का होता अगर वक्त में मुआइना
कोई नहीं कहता कभी ,फोड़ा सा बन गया

@@
Sushil Yadav
Durg Chhatisgarh

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-सियासत ….. सुशील यादव

२१२२ २१२२ २१२

तुम नजर भर ये, अजीयत देखना
हो सके, मैली-सियासत देखना

ये भरोसे की, राजनीती ख़ाक सी
लूट शामिल की, हिमाकत देखना

दौर है कमा लो, जमाना आप का
बमुश्किल हो फिर, जहानत देखना

लोग कायर थे, डरे रहते थे खुद
जानते ना थे , अदालत देखना

तोहफे में ‘लाख’, तुमको बाँट दे
कौम की तुम ही, तबीयत देखना

अजीयत =यातना ,जहानत = समझदारी

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/गीतिका ·  Reading time: 1 minute

जीने का मजा नहीं है

२१२२ २१२२ २१२१ २२
सुशील यादव

साथ मेरे हमसफर वो साथिया नही है
लुफ्त मरने में नहीं ,जीने का मजा नहीं है

रूठ कर चल दिए तमाम सपने- उम्मीद
इस जुदाई जिन्दगी का जायका नहीं है

साथ रहता था बेचारा बेजुबान सा दिल
ठोकरे, खामोश खा के भी गिना नहीं है

आ करीब से जान ले, खुदगर्ज हैं नही हम
फूल से न रंज, कली हमसे खपा नहीं है

शौक से लग जो गया, उनके गले तभी से
लाइलाज ए मरीज हूँ, मेरी दवा नही है

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गज़ल/गीतिका ·  Reading time: 1 minute

समझौते की कुछ सूरत देखो

समझौते की कुछ सूरत देखो
है किसको कितनी जरूरत देखो

ढेर लगे हैं आवेदन के अब
लोगो की अहम शिकायत देखो

लूटा करते , वोट गरीबों के
जाकर कुनबो की हालत देखो

भूखों मरते कल लोग मिलेंगे
रोटी होती क्या हसरत देखो

फैला दो उजियारा चार तरफ
एक दिए की कितनी ताकत देखो
सुशील यादव
दुर्ग

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गज़ल/गीतिका ·  Reading time: 1 minute

बिना कुछ कहे....
122 122 122 12
*
बिना कुछ कहे सब अता हो गया
हंसी सामने चेहरा हो गया
*
दबे पाँव चल के,गया था जहाँ
शिकारी वहीं , लापता हो गया
*
मुझे देख , ‘फिर’ गई निगाहें जनाब
गुनाहों जुड़ा कुछ नया हो  ,  गया
*
नही बच सका, आदमी लालची
भरे पाप का जब , घडा हो गया
*
छुपा सीने में राज रखता कई
सयाना था मुखबिर, बच्चा हो गया
*
लुटी  आम राहों में अस्मत जहाँ
सियासत वहीं बे- सदा हो गया
*
कहीं मातमी धुन. सुना तो लगा
अचानक शहर में.दंगा हो गया
*
सुशील यादव
दुर्ग
**
ये कैसा धुँआ हो गया

3
१२२ १२२ १२२ १२ सुशील यादव ….

शहर में ये कैसा धुँआ हो गया
कहीं तो बड़ा हादसा हो गया

किसी जिद, न जाने, वहां था खड़
शिनाख्त, मेरा चेहरा हो गया

हुकुम का गुलाम, जिस की जेब हो
शह्र का वही, बादशा हो गया

हमारे वजूद की, तलाशी करो
ये खोना भी अब, सिलसिला हो गया

ये चारागरों जानिब खबर मिली
मर्ज ला इलाज-ऐ- दवा हो गया

अदब से झुका एक, मिला सर यहाँ
‘सलीका’ ‘सुशील’ का , पता हो गया

सुशील यादव

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गज़ल/गीतिका ·  Reading time: 1 minute

ग़ज़ल

1

२२१ २१२१ १ २२१ २१२

यूँ आप नेक-नीयत, सुलतान हो गए
सारे हर्फ किताब के, आसान हो गए

समझे नहीं जिसे हम, गुमनाम लोग वो
हक़ छीन के हमी से , परेशान हो गए

कुनबा नहीं सिखा सकता बैर- दुश्मनी
नाहक ही लोग , हिंदु-मुसलमान हो गए

सहमे हुए जिसे ,समझा करते बारहा
बेशर्म- लोग जाहिल – बदजुबान हो गए

एक हूक सी उठी रहती,सीने में हरदम
बाजार में पटक दिए, सामान हो गए

एक पुल मिला देता हमको, आप टूटकर
रिश्तों की ओट आप, दरमियान हो गए

@@@
2.

२१२२ १२१२ २२
सुशील यादव

तेरी दुनिया नई नई है क्या
रात रोके कभी, रुकी है क्या

बदलते रहते हो,मिजाज अपने
हर जगह बोल , दुश्मनी है क्या

जादु-टोना कभी-कभी चलता
याद जनता की चौंकती है क्या

तीरगी , तीर ही चला लेते
जिंदगी! पास रौशनी है क्या

सर्द मौसम, अभी-अभी गुजरा
ख्वाब दुरुस्त कहीं जमी है क्या

सुशील यादव
४.१२.१५

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 ·  Reading time: 1 minute

छन्न पकैया ….

छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या, चिर्पोटी बंगाला
अमसुर होवत राज तुंहरे ,हमरो देश निकाला
छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या, राजनीति खपचल्हा
दिन बहुरे काखर हे देरी ,होवय नकटा- ठलहा
छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या, होवय नेता लबरा
सपनावत रहिबे बाँध-बनही ,खनाय रहिथे डबरा
छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या, दोनों हाथ म लाडू
सूट- पेंट पहिरे खातिर अब , दिल्ली मारो झाड़ू
छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या,सीखो गा बदमाशी
दारु दुकान खोले मिलही ,परमिट बारामासी
छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या,गुरतुर जेखर बोली
मिलही रंग ऐसो सब्सीडी ,खेलेबर जी होली
सुशील यादव

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मुक्तक

2122 2122 2122
गलत राय गलत मशवरा देने वाले
मुंसिफी की आड़ फतवा देने वाले
बिजलियाँ सौ सौ गिरे तेरे घरों में
जन्नते काश्मीर जला देने वाले

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग छत्तीसगढ़
5.7.17
पारस कहु ले लान के…. छतीसगढ़ी दोहे

लोकतंत्र के नाम ले  ,पार डरो गोहार
कुकुर ओतके भोकही ,जतके चाबी डार

लहसुन मिर्चा टोटका,मिझरा डाल बघार
जतका झन ला नेवते,चांउर पुरत निमार

लोकतंत्र सुन्दर बिगुल,बजवइय्या हे कोन
अड़सठ-सत्तर साल के ,गणतंत्र हवे मौन

पारस कहु ले लान के ,छुआ दो एखर गोड़
माटी बनतिस सोन कस,गुन लोहा के छोड़

सुशील यादव

26.1.2017देख तुम्हारी सादगी  ,

अपने-अपने दंभ को ,भूल-बिसर के आज
शामिल होली में रहो ,जुड़ता दिखे समाज
#
फागुन-फागुन सा हुआ ,सावन बिछुड़ा मीत
छोड़ अधर की बासुरी ,राधा विरहा गीत
#
कायरता की राह में ,हद से निकले  पार
माया जननी मोह की,देख यही संसार
#
पद प्रतिष्ठा वो छोड़ के ,सड़कें नापे रोज
कीचड़-कीचड़ में खिले ,पंकज,कमल,सरोज
#
देख तुम्हारी सादगी , हाथो बचा गुलाल
जीवन सारा काट दे ,इतनी सोच मलाल
सुशील यादव,दुर्ग
7.3.17
राजनीति के छल-कपट,

संग तुम्हारा छोड़ के,कहीं न जाती नाथ
गठबन्धन निभती रहे ,राजनीति के साथ

भरसक अपना है अभी,इतना महज प्रयास
रूठी जनता से मिले ,वोट हमी को ख़ास

कल थे वे जो रूबरू ,ज
आज अपनी नीयत से,बन बैठे हैं नीच

रेखा कभी- कहाँ खिंची,परंपरा के खेल
देखो जला मशालची,जितनी-जी भर तेल

अवगुन पीछे छोड़ कर ,गुन की करे बखान
राजनीति के छल-कपट, लंपट खुली दुकान

सुशील यादव
मंजिल तेरी पास है ,ताके क्यूँ है दूर
चुपड़ी की चाहत करे , ज्ञान जला तंदूर
$
जिससे भी जैसे बने ,ले झोली भर ज्ञान
चार दिवस सब पाहुने ,सुख के चार पुराण
$
तीरथ करके लौट आ,चार देख ले धाम
मन भीतर क्या झांकता ,जहाँ मचा कुहराम
$

तीरथ सारे देख ले, चार देख ले धाम
भीतर मन मत झाँकना, जहाँ मचा कुहराम
$

मिल जाये जो राह में, साधू -संत -फकीर
चरण धूलि माथे लगा ,चन्दन-ज्ञान-अबीर
$
आस्था के अंगद अड़े ,बातों में दे जोर
तब -तब हिले पांव-नियम ,नीव जहाँ कमजोर
$
खींच  तान देखो कहीं, किस्मत लेख लकीर
दस्तानो मेँ  जो छिपी, पाप -पुण्य तकदीर
#

9408807420