गीत
उम्र क़े इस पड़ाव में.....
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दर्द जहाँ मैं टांगा करता,
टूटी आज वो खूंटी लगती
सारे संबल, सभी आसरे,
बिना असर की बूटी लगती
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लेकर चलना उसी गली में,
यादों का भरता हो मेला
बचपन खेल घरोंदे वाले,
मैं
नाव डूबता, रहूँ अकेला
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उम्र क़े अब इस पड़ाव में,
कितनी बातें छूटी लगती
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अरमानों के जब पँख नहीं थे,
आकाश लगा करता छोटा
उड़ने की जब ताकत आई,
व्यवधानो ने अक्सर टोका
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शेष नहीं कुछ कहने जैसा,
नगीना खोई अंगूठी लगती
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इन बाजुओं का दम तो देखो
पहले जैसा आज भी क़ायम
आज भी मिलने की चाहत,में
रत्ती भर उत्साह नहीं कम
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चाहत की दुनियां तुझ बिन
खाली - खाली झूठी लगती
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उमंग उजालों की सजती,
सदा रहे पहचान दिवाली
मुस्कान बांटते जाना यूँ,
तमाशबीन बजा दे ताली
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मंहगाई के हाथ थमी हो ,
विपदा लम्बी सूटी लगती
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सुशील यादव