Saturday, 13 May 2023

 

गीत

उम्र क़े इस पड़ाव में.....

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दर्द जहाँ मैं टांगा करता,

 टूटी आज वो खूंटी लगती

सारे संबल, सभी आसरे,

बिना असर की बूटी लगती

##

लेकर चलना उसी गली में,

यादों का भरता हो मेला

बचपन खेल घरोंदे वाले,

मैं

नाव डूबता, रहूँ अकेला

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 उम्र क़े अब इस पड़ाव में,

कितनी बातें छूटी  लगती

##

अरमानों के जब पँख नहीं थे,

आकाश लगा करता छोटा

उड़ने की जब ताकत आई,

व्यवधानो ने अक्सर टोका

lll

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शेष नहीं कुछ कहने जैसा,

 नगीना खोई अंगूठी लगती

##

इन बाजुओं का दम तो देखो

पहले जैसा आज भी क़ायम

आज भी  मिलने की चाहत,में

रत्ती भर उत्साह नहीं कम

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चाहत की दुनियां तुझ बिन

खाली - खाली झूठी लगती

##

उमंग उजालों की सजती,

सदा रहे पहचान दिवाली

मुस्कान बांटते जाना यूँ,

तमाशबीन  बजा दे ताली

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मंहगाई के हाथ थमी हो ,

विपदा लम्बी सूटी लगती

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सुशील यादव

 

क़ौम की हवा

सुशील यादव(अंक: 175, फरवरी द्वितीय, 2021 में प्रकाशित)

शिकायत थी ख़राश की, हार ले के  आ गए
तुम आंदोलन की हवा बुखार ले के आ गए
 
काट कर नहीं ला सकते अब की जो  फ़सल
तुम मुट्ठियों में अब की  ज्वार ले के आ गए
 
सहमत नहीं होते तो ना सही मगर क्या
ज़रूरी थी अपनी धुन सितार ले के आ गए
 
सियासत की नासमझी क़तार में खड़ी
तुम ट्रेक्टर को समझ तलवार ले के आ गए
 
वादों से मुकरने का यहाँ जोश लबालब 
इन्हीं के सामने इल्तिजा गुहार ले के आ गए

 

सफ़र में

सुशील यादव

तुम बाग़ लगाओ, तितलियाँ आएँगी
उजड़े गाँव नई बस्तियाँ आएँगी

जिन चेहरों सूखा, आँख में सन्नाटा
बादल बरसेंगे, बिजलियाँ आएँगी

दो चार क़दम जो, चल भी नहीं पाते
हिम्मत की नई, बैसाखियाँ आएँगी

उम्मीद की बंसी, बस डाले रखना
क़िस्मत की सब, मछलियाँ आएँगी

सफ़र में अकेले, हो तो मालुम रहे
तेरे सामने भी, दुश्वारियां आएँगी

नाकामी अंदाज़ में, कुछ नये छुपाओ
अख़बार छप के, सुर्खियाँ आएँगी

 

साथ मेरे हमसफ़र

सुशील यादव

२१२२ २१२२ २१२१ २२

साथ मेरे हमसफ़र वो साथिया नहीं है
लुत्फ़ मरने में नहीं, जीने का मज़ा नहीं है

रूठ कर चल दिए तमाम सपने-उम्मीद
इस जुदाई ज़िन्दगी का ज़ायका नहीं है

साथ रहता था बेचारा बेज़ुबान सा दिल
ठोकरें, ख़ामोश खा के भी गिना नहीं है

आ क़रीब से जान ले, ख़ुदगर्ज हैं नहीं हम
फूल से न रंज, कली हमसे खफ़ा नहीं है

शौक़ से लग जो गया, उनके गले तभी से
लाइलाज ए मरीज़ हूँ, मेरी दवा नहीं है

 

FacebookTwitterसहूलियत की ख़बर

सुशील यादव

तेरी उचाई देख के, काँपने लगे हम
अपना क़द फिर से, नापने लगे हम

हम थे बेबस यही, हमको रहा मलाल
आइने को बेवजह, ढाँपने लगे हम

बाज़ार है तो बिकेगा, ईमान हो या वजूद
सहूलियत की ख़बर, छापने लगे हम

दे कोई किसी को, मंज़िल का क्यूँ पता
थोड़ा सा अलाव वही, तापने लगे हम

वो अच्छे दिनों की, माला सा जपा करता
आसन्न ख़तरों को, भाँपने लगे हम

 

समझौते की कुछ सूरत देखो

सुशील यादव

222222222

समझौते की कुछ सूरत देखो
है किसको कितनी ज़रूरत देखो

ढेर लगे हैं आवेदन के अब
लोगों की अहम शिकायत देखो

लूटा करते, वोट गरीबों के
जाकर कुनबों की हालत देखो

भूखों मरते कल लोग मिलेंगे
रोटी होती क्या हसरत देखो

फैला दो उजियारा चार तरफ़
एक दिए की कितनी ताक़त देखो

 

वो जो मोहब्बत की तक़दीर लिखता है

सुशील यादव(अंक: 212, सितम्बर प्रथम, 2022 में प्रकाशित)

2122       2122      1222 
 
वो जो मोहब्बत की तक़दीर लिखता है 
किसी-किसी के हाथ जागीर लिखता है
 
 
कोई चाहे कुछ गरम कोई ठंडा यूँ
 
माँग के माफ़िक वो तासीर लिखता है 
 
 
साथ चलते भाँप लेते हवा का रुख़ 
 
नाम उनके वक़्त ही समीर लिखता है
 
 
हो जिसे अँधेरे का ख़ौफ़ जीवन भर 
 
बस ख़ुदा ही समझ तनवीर लिखता है 
 
 
हम रहें जिसे पाने आवेग से आतुर 
 
ये ज़माना अब हमें अधीर लिखता है
 
दर्द के हर कोण की नाप ले जीता 
वो ख़लाओ तेरी तस्वीर लिखता है

 

वो जो मोहब्बत की तक़दीर लिखता है

सुशील यादव(अंक: 212, सितम्बर प्रथम, 2022 में प्रकाशित)

2122       2122      1222 
 
वो जो मोहब्बत की तक़दीर लिखता है 
किसी-किसी के हाथ जागीर लिखता है
 
 
कोई चाहे कुछ गरम कोई ठंडा यूँ
 
माँग के माफ़िक वो तासीर लिखता है 
 
 
साथ चलते भाँप लेते हवा का रुख़ 
 
नाम उनके वक़्त ही समीर लिखता है
 
 
हो जिसे अँधेरे का ख़ौफ़ जीवन भर 
 
बस ख़ुदा ही समझ तनवीर लिखता है 
 
 
हम रहें जिसे पाने आवेग से आतुर 
 
ये ज़माना अब हमें अधीर लिखता है
 
दर्द के हर कोण की नाप ले जीता 
वो ख़लाओ तेरी तस्वीर लिखता है

 

वही अपनापन ...

सुशील यादव

मेरी शक़्ल का मुझको, आदमी नहीं मिलता
इस जहां में अब वो, अजनबी नहीं मिलता

नहीं था मुक़द्दर में शामिल, लकीरों में दर्ज
है उसी की तलाश, जो कभी नहीं मिलता

हम हैं किसी ज़िद में उठा रखे हैं परचम
जेहाद के रास्ते मगर सब, सही नहीं मिलता

एक तेरे होने का, दिल को रहता जो सुकून
अपनापन तुझसे हमको, "वही" नहीं मिलता