Tuesday, 13 November 2018

रहनुमा सा जान उसको ....



है जमाने में वही बस  तमीज वाला
पहन भगवा राह चलता  कमीज वाला

रहनुमा सा जान उसको बिठा करीब
वगरना लोगो सहेजो अपना  निवाला

कब यहाँ से उखड़ जायें तमाम पत्थर
सोच का निकल जाए, कहाँ दिवाला

बून्द भर की प्यास अपनी किसे बताये
वो  नदी के सूखने, जो सजाते प्याला

चुप रहें, तो कौन फरियाद को सुने है
पाँव में जंजीर, मुह को लगा है ताला

हम मनाएं! ढूढ उसको, चलो निकालें
ठौर बदला,राह भटका नहीं उजाला

सुशील यादव

जेखर ये संसार में, लबरा हवे मितान
ठलहा मन के गोठ में,झन फूको जी प्रान
##
उजड़ चुका है बाढ़ में ,संयम का अब खेत
फसलो की मोती कहाँ ,दूर-दूर तक रेत

किस्से और कहानियां ,सब थी कल की बात
आज समय की मार है ,घूसा  लाठी लात

मुझे चाहता है मगर, नहीं बोलता यार
दो-दिन की बस दोस्ती,चार दिनों तकरार

अच्छे दिन के फेर में,किसको चुनते  आप
वजन बराबर तौल कर ,कद को फिर से नाप


झट से चढ़ जा सीढियां ,इस पीढ़ी की मांग
कोई कल को तोड़ दे ,भीम गदा से जांघ

हम पर ये किसने किया ,ऐसा वज्र-प्रहार
आज-अभी से ढूंढ़ लें ,कल का तारणहार


बाहर बैठे लोग हैं ,ज्ञान चक्षु को खोल
अगर चढा कोई नशा,चाणक्य बन के बोल


मोह गया-ममता गई ,राह-चाह  की सून
सर में गोली मार के  ,टेंशन फ्री कानून

पथ दिखलाता था कभी ,पथ से भटका आज
सबको  जिसपे  नाज था ,उतरा वो ही  ताज

कितनी हुई कवायदें ,  तुझको जाएँ  भूल
पर तेरी नादानियाँ , फिर करती मशगूल


तेरी मेरी नादानियां,अतीत समय की बात
दिशा- ध्रुव से ज्ञात है,तारा चमक प्रभात

मन के द्वार विराजिए , नटखट-मोहन- श्याम
धुला-ह्रदय मैं खोलता ,सुबह-दोपहर-शाम

सूने घर जैसे बुने , मकड़ी अपना जाल
वैसे ही प्रभु नाम का,आता रहे ख्याल


बाहर बैठे लोग हैं ,ज्ञान चक्षु को खोल
अगर चढा कोई नशा,राजनीति में बोल


शायद मेरी साधना,निहित कहीं है खोट
हर ऊंचाई नाप कर,मैं पाता हूँ चोट

आज सभी ने खा लिया , पेट-भरा दो जून
कल की केवल राम पर , कैसा हो कानून

अब तो मेरे हाल पर, मुझको छोडो यार
करते-करते  तंग हूँ ,अपना ही किरदार
सुशील यादव दुर्ग

४जून १८

मेरे कद से नाप ले,कद यूँ कभी- कभार
कुर्ता उजला साफ हो,नीयत हो  चमकार
जून 7

छल प्रपंच की बाढ़ में ,मेरी डूबी नाव
एक मिले प्रभु आसरा,शायद होय बचाव
९ सितंबर१८
छल प्रपंच की बाढ़ में ,मेरी डूबी नाव
एक मिले प्रभु आसरा,शायद होय बचाव
सुशील यादव

कुलटा थी संभावना , दिखा गई दर्पण
मै अज्ञानता कर गया ,क्या-क्या उसे अर्पण

अब के बिछुड़े जो मिलें ,ऐसा हो सदभाव
खिंचे -खिंचे से ना रहें ,मन से लगे खिंचाव

होती दुर्गति दूर से ,पास रहो तो  प्यार
जग वाले सब जानते ,मोह नाम संसार
सुशील यादव

बरसो से करते रहे  ,पत्थर फ़ेंक प्रहार
मानवता का नाम ले ,फेंक फूल का हार
९ सितंबर१८


सुने घर में बुन रहा,मकड़ी जैसा जाल
एक तुम्हारी याद ने , जीना किया मुहाल

कोई उस घर में नहीं,है सादगी  सबूत
वर्तमान केवल वहां ,नाच रहा बन भूत


बनना प्रभु का धाम भी ,कैसे बने विवाद
आधार-शिला में रखो ,समझौता बुनियाद

एक तुम्हारी सादगी ,दूजा व्यापक प्यार
उनतालिसवां है बरस,फूले-फले दयार

जी चाहा वैसा मिला,अतीव अतल अथाह
प्रेम भरी थी सादगी, अनुपम था उत्साह


किस दधीचि से मांगना , वज्र बनाने हाड
खतरे में आ बैठ लो,हिला हुआ है झाड़

कौन दधीची दे भला , वज्र बनाने हाड
खतरे में आ बैठ लो,हिला हुआ है झाड़


वर्षगाँठ का आज है ,उनतालिसवां साल
बीते सुख-दुःख साथ में ,प्रभु  रखना  खुशहाल
सुशील यादव

मन में हो गर आस्था ,ह्रदय विराजे प्रेम
वहां कभी क्या पूछना ,कुशल-मंगलम क्षेम

ह्रदय द्वार को खोलिये , करना हो व्यापार
अंधविश्वास  'सेल' में  ,लूटो अपरंपार
  सुशील यादव

मन्दिर बनवा राम का ,ह्रदय बसा लो राम
एक तीर  से हो सके ,शायद दो-दो काम



दो आगे दो को मिला ,हो जाए जब चार
समझौतों का तब दिखे ,होना बेडा पार
सुशील यादव

जी को अपने खोल कर ,दिखलाओ जी आज
दिखे योजना कागजी ,बन्दर बाँट समाज
सुशील यादव

लेना प्रभु का नाम भी ,जी का है जंजाल
हमें  वहीं पे छोड़ दो,होता जहां बवाल



  मंसूबा दिल से बता ,होता  कहाँ  सटीक
  कल भी तू बीमार था ,आज लगे  बस ठीक


कैसे कह दें हम  तुम्हे ,मर्यादा के राम
गिनती के दो-चार तो ,गिनवा दो बस काम


घर से मर्यादा गई ,मन से गया विवेक
आगे मस्तक क्या धरें ,कौन करे अभिषेक

मन  की अंतर्वेदना ,तन में करे खिंचाव
उलझे तनाव  दायरे , कैसे करें बचाव



मत जाओ तुम लांध कर ,गृह-मर्यादा आज
दिशा-हीन हर चाह को ,दण्डित करेसमाज


राजनीति में पालते ,भ्रष्टाचार-रखैल
सबकी माया  एक है,पैसा- पैसा खेल
सुशील यादव दुर्ग

दांत दर्द ..
दन्त कथा ..

दांती वज्र  प्रहार शनि,कैसे करे उपाय
इसी कृपा बूते कभी ,लाखों को निपटाय
##
आज कहूँ फिर से सुनो,कोई साधु न सिद्ध
आसमान से ताकता , सांप-छछुंदर गिद्ध
##
तन से मर्यादा गई ,मन से गया विवेक
आगे मस्तक क्या धरें ,कौन करे अभिषेक
##
सुशील यादव दुर्ग

 २३ जून १८


२३.६.१८



पाप  मुक्त सबको करे ,तेरा यह भगवान
उसके बाद मुझे  कहे ,आका कोई काम
सुशील यादव दुर्ग ,२ जून १८

शायद मेरी साधना, निहित कही पर खोट
हर ऊंचाई नाप कर,पाता रहता चोट
सुशील यादव दुर्ग, ३ जून १८


अब तो मेरे हाल पर ,मुझको छोडो आप
जो मुड़ कर देखा नहीं,मेरा रुदन विलाप
सुशील यादव दुर्ग, ३ जून १८

खूंटे पर ज्यों बांध दे ,निरीह कोई बैल
रुकती साँसे देखती ,जीवन उतरन मैल

परम सत्य आकाश है ,झूठ मोह पाताल
नया बसेरा  खोज तू,अपना आज सँभाल

क्यों कर अब तू पालता,परहित व्यापक मोह
अंत-शरण में दीखते ,केवल खाई-खोह

कभी  परों  को खोल दो, देखो सहज उड़ान
स्थापित करती बेटियां, आसमान  पहचान

नेकी के अब दिन लदे ,सेवा है बेकार
नाम कमा के क्या मिले ,ले जाए सरकार

मन की हर अवहेलना,दूर करो जी टीस
व्यवहारिकता जो बने ,ले लो हमसे फीस
सुशील यादव



तेरा दिल बस छोड़ के ,बाकी सब बकवास
तुझको केवल देख के ,आनन रहे उजास
सुशील यादव

साल नया स्वागत करो ,हो व्यापक दृष्टिकोण
अंगूठा छीने फिर  नहीं ,एकलव्य से  द्रोण
सुशील यादव

ध्वनि की आहट में सहज,मारा करता तीर
प्रतिमा केवल पूज के ,एकलव्य  गंभीर
सुशील यादव ,दुर्ग

भारी जैसे हो गए,नये साल के पांव
खाली सा लगने लगा,यही अनमना गांव
सुशील यादव

ना राहत  की योजना ,ना विकास के पाँव
जिसको पूछे वो कहे ,छुआ तरक्की  गांव

सुख के पत्तल चांट के ,गया पुराना साल
दोना भर के आस दे , बदला लिया निकाल
 
कलेंडर सब उतार दो ,गया पुराना साल
नये साल की  स्वागते,रंग नई दीवाल
सुशील यादव


तेरे पास अकल नहीं ,ले ले ज़रा उधार

तुझसे रिश्ता यूँ लगे ,कोई कर्ज उधार
पीसा की जमीन खड़ी, झुकती सी मीनार

बीते साल यही  कसक,हुए रहे भयभीत
कोसो दूर हमसे रहे ,सपने औ मनमीत

नवा साल उतरे मुड़ी ,जाबे काखर गांव |
साधन तोर घटे हवे ,काला खात-बचांव ||

सुरतावत बनते  बने,अइसन पाछू साल
अतका खिलिस कमल इहां,गाले गाल गुलाल
सुशील यादव दुर्ग



अंगद के जैसा जमे,उखड़े कहीं न पाँव
लूटे सौ-सौ गजनवी,उजड़ न पाए गाँव `

टोपी आम आदमी की

टोपी आम आदमी की… – सुशील यादव

टोपी के बारे में मेरी बचपन से कई अच्छी धारणायें थी|
गांधी जी के अनुमार्गी होने की वजह से, मेरे पिता के पहनावे में ये,जवाहर कोट के साथ शामिल जो था|
वे जब भी घर लौटते, हम भाई –बहनों में टोपी लेने की जंग छिड़ जाती|
भले ही मिनटों –सेकण्डो कि लिए सही, टोपी जो हाथ लगती, मन खिल उठता|
माँ टोपी के गंदे हो जाने के भय से ,जतन से उसे खूंटी पर टांग देती|
हम बापू की टोपी को , गांधी-बाबा के  फेम के बगल में , टंग जाने के बाद अपने –अपने खेल में खो जाते|

टोपी में जाने क्या-क्या संस्कार थे,बरसों हम उन संस्कारों से बंधे रहे|
हमारी शालीनता शादी होने के बाद, पत्नी के तानों से, ज़रा छिन्न-भिन्न हुई| लोग टी व्ही ,फ्रिज,कार ,बंगले जाने क्या क्या कमा के धर दिए,आपसे एक ढंग का स्कूटर नहीं लिया जाता|बिरादरी में नाक कटती है|

आदमी इसी 'बिरादरी' ,'नाक' और 'पत्नी' के चुंगुल में फंस कर,अगल-बगल की दुनिया  देखते हुए  शायद चुपके से , टोपी को जेब में धर लेता है|

इस कहर ने मेरे अनुमान से पिछले बीस-तीस  सालों से ‘टोपी’ को शहर से, मानो गायब सा कर दिया है |
केवल २६ जनवरी ,१५ अगस्त के दिन इक्के-दुक्के नेता टोपी पहने शौकिया दिख जाते हैं |
कांग्रेस के जमाने में ,चुनाव नजदीक आते-आते टोपी का चलन थोड़ा जोर मारता|
टिकट लेने ,पार्टी कार्यालय का चक्कर, टोपी पहन के जाओ तो असर पड़ता है ,जैसे विचार टोपी पहनने की बाध्यता पैदा कर देती थी|लोग दुखी मन से पहन लेते थे|

वैसे हमारे शहर में एक मारवाड़ी गजब की टोपी पहने रहता था|भोजनालय चलाता था|

साफ –सुथरी टोपी की बदौलत, उनकी काया में निखार ,बोली में माधुर्य ,व्यवहार में कुशलता, आप ही आप समा गई थी |

एक ‘टपोरी भोजनालय’ से, आलीशान चार मंजिला होटल तक का सफर करते, उस आम-साधारण आदमी के चश्मदीद , शहर के अनेक लोग हैं|

अफसोस कि अब , उनकी टोपी-युक्त फोटो पर, माला चढ गई है ,पर उस आदमी ने जब भी पहना, झकास पहना, कलफदार पहना , शान से पहना|

उनके व्यवसाय की वजह से उन्हें ‘पुरोहित जी’ कह के बुलाते थे|

उनके दिवंगत होने पर , कोई शहर-व्यापी मातम-पुर्सी नहीं हुई,कारण कि ,उन दिनों मीडिया जैसा कुछ होता नहीं था|

आज के मीडिया युग में, जो 'डेन्डरफ वाले तोते के घर’ को बहुत खास बना के परस देता है ,लोगो के हुजूम पे हुजूम टूट पड़ते हैं ,वे दिवंगत होते तो अलग बात होती|

तमाशा देखना,सनसनी में जीना इस जैसे नए युग का एक ख़ास शगल हो गया हो …लोग कान के कच्चे होने लगे हैं|

ये मीडिया वाले , पुरोहित जी को भी कुछ यूँ “ब्रेकिंग न्यज” के नाम पर घंटों चला लेते …..“आज आपके शहर से एक शख्श जिसने उम्दा भोजन की थालियाँ परोसी ,जिसने लोगों को विशुध्ध भोजन कराया ,जिसने हजारो –करोड़ो लोगों की क्षुधा-शान्ति का व्रत लिया था, जिसने मिलावट के किसी सामान का इस्तमाल नहीं किया ,इमानदारी से कम कीमत में सबके पेट तक भोजन पहुचाना जिनाक्क धर्म बन चुका था ,उस  शख्श का कल परमात्मा से अकाल  बुलावा आ गया ,एक आत्मा का परमात्मा में विलीन होना आज की सबसे बड़ी सदमे वाली खबर है|
सनसनी वाला ऐंकर ,यूँ कहता ,एक आदमी जिसने जिंदगी भर कलफदार टोपी पहनी मगर कभी इलेक्शन टिकट माँगने किसी दर पे नहीं पहुचा | वो आदमी जिसकी खासियत थी, कि गांधी –टोपी को यथा नाम तथा गुण अपने सर में आमरण धारण किये रहा आज दिवंगत हो गया |
आज के ज़माने का अजूबा ,क्या ऐसे लोग भी होते हैं जो बिना राजनैतिक सरोकार के टोपी को अपनी वेशभूषा में बनाए रखते हैं ?...
ऐसे आदर्श पुरुष को हमारे चेनल का नमन| हमारे चेनल की तरफ से उनके उठावना का लाइव टेलीकास्ट किया जाएगा|

सदर बाजार के एक और मारवाड़ी जिनका सोने-चांदी का बिजनेस था,पुरोहित के नक्शे –कदम में टोपी पहना करते थे|उनकी खासियत थी कि जब भी बड़ा ग्राहक आये, वे टोपी उतार के रख देते थे|टोपी पहन के ग्राहक को झांसा देने में जैसे उनकी अंतरात्मा धिक्कारती हो ,वे पेमेंट लेने,बाद ग्राहक को बिदा कर लेने पर  ही टोपी सर पर रखते थे| सात्विक विचार वाले उन जैसे लोग अब कहाँ बचे? उनके दान-पुन्य से अनेको आश्रम ,स्कुल चलते हैं|इन्कमटेक्स वाले उस ‘दानी-दयालु’ आदमी की तरफ कभी झांकने  नहीं गए|

टोपी के बारे में बचपन की सुनी एक कहानी अभी तक दिमाग में काबिज है|
एक व्यापारी टोपियों का व्यापार करता था|अपने टोकरे में ढेर सारी टोपियाँ लिए गाव-गाव फिरता था|चलते –फिरते जहाँ नदी-तालाब आ जाए ,नहाना ,खाना –पीना,झपकी लेना, कर लेता था|
एक बार एक पेड़ के नीचे आराम करते – करते सो गया|
पेड़ पे खूब सारे बन्दर बैठे थे, बंदरों ने नीचे उतर के, उसके टोकरे से टोपियाँ उठा के पहन ली और पेड़ पर चढ़ गये|व्यापारी की नीद जब खुली तो तो टोपियों गायब पाकर उसके होश उड़ गए|इधर-उधर देखने के बाद पता चला कि बंदरों ने सब टोपियाँ पहन रखी हैं|उसे कुछ सूझ नहीं रहा था कि टोपियों को वापस कैसे बरामद करे|उसके पास गनीमत से एक टोपी , जो उसके सर मे थी बच गई थी| उसने बंदरो की तरफ अपने सर से वो टोपी निकाल के उछाल दी|उसकी नकल में सब बन्दर, अपनी-अपनी टोपियाँ उछालने लगे|टोपियाँ नीचे गिरने लगी|व्यापारी ने टोपियाँ सम्हाली और फिर कभी पेड़ के नीचे , गहरी नीद में न सोने का निश्चय करके , आगे बढ़ गया|

इस कहानी का मुझमे कई दिनों तक असर रहा| तालाब और पेड़ के कम्बीनेशन में, मुझे टोपियों की याद आती रही|टोपीवाले का एक्शन,बंदरों का रि-एक्शन,वाला फ़िल्म मन में स्वत: चल जाता |
उस बिजनेस मेन की, तात्कालिक बुद्धि पर दाद देने का मन आज भी करता है|अपने छोटे-छोटे नाती-पोतो को कभी उनकी  जिद पर ये किस्सा सुना के, उनकी प्रतिक्रिया जानना चाहता हूँ|मुझे मालुम है उनके जेहन में 'सचिन-धोनी' वाली क्रिकेट की तिरछी टोपियाँ होती हैं|

‘टोपी-ज्ञान’ पाने के बाद अब बच्चे  कहीं  बंदर  दिखते ही, टोपियाँ ढूढ़ते हैं|वे बंदरों को ‘टोपी पहने’ देखना चाहते हैं|वे घर से बची-खुची टोपी ला के हाथ बढाते हैं|ले…ले… टोपी पहन …..|
दादा ये तो दान्त दिखा रहा है ……….!ये हंस रहा है…….,,
वो इधर को आ रहा है ………..|

मै बच्चो को सहज करने के लिए कहता हूँ ,चलो काउंट करो ,कितने हैं|गिनती शुरू हो जाती है वन..टू…थ्री ….ट्वंटी सेवन ,ट्वंटी एट…|बच्चे आपस में ट्वंटी सेवन ,ट्वंटी एट…की लड़ाई में लग जाते हैं ,एक बंदर तब तक उछल के दूसरे पेड़ पर चल देता है|

मै सोचता हूँ, बच्चो को कल्पना की दुनिया के इतने नजदीक नही ले जाना चाहिए |कहीं बंदरों की छीन-झपट में कुछ नुकसान न हो जाए?

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर
जोन १ स्ट्रीट ३ दुर्ग छत्तीसगढ़
४.११.१८
मोबाइल 9408807420 /9426764552

आवारा कुत्तों का रोड शो .....

मार्निग-वाक में डागी ‘सीसेंन’ को घुमाने का काम फिलहाल मेरे जिम्मे आ गया है।

रास्ते में दीगर कुत्तों से बचा के निकाल ले जाने का टिप, गणपत ने जरूर दिया था, मगर प्रेक्टिकल में तजुर्बा अलग होता है।

एक हाथ में डंडा,एक हाथ में पटटा पकडे, कुत्ते के बताए मार्ग को तय करो | खुद खिंचते चले जाओ। सामने आये दूसरी नस्ल की बिरादरी वालो को भगाते रहो।यह आम कुत्ता प्रेमियों का शगल है |

उस दिन शर्मा जी साथ हो लिए ,पूछे कौन सा है ?मैंने कहा अल्शेशियन।



कितने का लिए ? मैंने कहा ,एक मित्र के यहाँ बोल रखा था ,उनने दिलवाया। वे बोले; और कोई मिले तो दिलवाइए हमें भी ।

मैंने कहा ,शर्मा जी ,कंझट का काम है, कुत्ते का शौक करना। अपना बस चले तो अभी ये पट्टा आपको थमा के छुट्टी पा लें ,मगर 'पिंटू' का शौक है; सो खींचे जा रहे हैं।

वैसे भी आप मांस-मच्छी,अंडा कहाँ खिला पाओगे ,ये नस्ल तो इनके बिना गाय-माफिक हो जायेगी।

शर्मा जी, नान-वेज पर टिक नहीं पाए| वे राजनीति में उतर आये। क्या कहते हैं ?किसकी बनेगी ?

मैंने कहा, जो ज्यादा भौक ले वही मैदान से दूसरों को खदेड़ने के काबिल होता है ,मैंने डार्विन से मिलते-जुलते विचार फेका .... वैसे  आपका क्या कहना है ?

आपकी बात तो सही है। आजकल टी-वी देख-देख ,सुन-सुन के तो कान पाक गए हैं।
एक सोची -समझी साजिश के तहत 'मेंडेट' के नाम पर बिना सर्वे के डाटा दे डालते हैं | दिया खींचने के लिए धमाके करके बताएँगे कि रूलिंग पार्टी का आधार खिसक रहा है | फिर यही लोग चार पैनलिस्ट को बिठाके प्रायोजित तू-तू ,मैं-मैं करके साबित कर देते हैं कि जनता का हुजूम उन्हें जिताने के लिए बेताब बैठी है |  ये ध्यान भटकाने वाले स्केंडल ,सेक्स ,और घोटाला की लंबी फेहरिस्त दे-दे के मुद्दों पर आपको टिकने नहीं देती | यहां ,विपक्ष को अधमरा करना, पहले एजेंडे में शामिल है |



हम  ,क्यों नहीं,अपना भटकना बन्द करते ..... ? ..... ऐ.... सीसेंन उधर नही ....रास्ते में चलो ....।

शर्मा जी ने कहा, आपकी बात समझ लेता है !देखो रास्त में आ गया।

मैंने कहा शर्मा जी यही तो खूबी है, इन कुत्ते लोगो की।

भौकते जबरदस्त हैं ,दौड़ाएंगे भी खूब, मगर जब तक मालिक न कहे काटेंगे नहीं।

आगे देखिये...... ,वे जो कुछ आवारा कुत्ते आ रहे हैं कैसे गुर्रायेगे इस पर....... लगेगा अकेला आये तो नोच लेगे........।

मगर वहीँ ,जब हमारा अल्शेशियाँ एक गुर्रायेगा तो दुम दबा के भाग खड़े हो जायेंगे स्साले .....।

शर्मा जी को तत्कालिक परिणाम भी देखने को मिल गया।

चक्रव्यूह की माफिक, आवारा रोड छाप कुत्तों से, अल्शेशियन सीसेन घिर गया। ,वो थोडा सहमा मगर जैसे ही हमने हिम्मत दी, वो उन सब पर भरी पडने लगा।

आवारा कुत्ते आपनी रोड शो रैली को, दूसरी गली की तरफ ले गए।

मैंने कहा देखा शर्मा जी ,यही हमारे इधर भी हो रहा है।
रैलियां देख के हम अंदाजा लगा लेते हैं उमीदवार में दम है।
जब तक कोई ताल ठोंक के सामने आके नहीं गुर्रायेगा, जनता बेचारी भ्रम पाले रहेगी और अपना वोट देते रहेगी।

हमारा मानना है ,आप क्वालिटी देखो नस्ल देखो ,दमखम देखो।
ये नहीं कि चोर,उठाईगीर धोखेबाज ,सुपारी-किलर ,ब्लेक मार्केटियर ,दलाल-ठेकेदार कोई भी टिकट हथिया ले, और उसे आप चुन लो।
शर्मा जी , इस गड़बड़ को रोकना होगा .... ! आजकल यही सबकुछ हो रहा है।

एक ने भाषण झाडने में महारत हासिल कर ली,दूसरे ने पोल खोलने की विद्या सीख ली | वे दोनों बन गए राजनीति के दिग्गज पंडित ।
गुंडे-मवाली,घूसखोरो,देश का पैसा लूट के भागने वालों  से देश को बचाओ भइ ... बहुत हो गया।

इतनी देर खड़े गपियाने में, सीसेन कब दिशा मैदान से फारिग हो गया ,पता ही नहीं चला।


सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर
जोन १ स्ट्रीट ३ दुर्ग छत्तीसगढ़
४.११.१८
मोबाइल 9408807420 /9426764552

हम दागी हैं

हाँ ! हम दागी हैं .....

मुन्ना भाई, जग्गू हठेला के साथ मेरा पता ढूढते हुए आये |
जग्गू हठेला  ने परिचय कराते हुए कहा ,ये मुन्ना भाई हैं , अपने इलाके के ख़ास नए उम्मीदवार | अब की बार रूलिंग पार्टी ने इनको टिकट दिया है | आप तो इन्हें  अखबार की सुर्ख़ियों में पढ़े होंगे ?
मुझे  दिमाग पर ज्यादा जोर डालने की मशक्कत नहीं करनी पड़ी | 302 का आरोपी मेरे सामने था | इलाके के दबंग मुन्ना भाई का कट्टा, मेरे बरामदे में रखे सेंटर टेबल के उस टांग पर पड़ गया, जो पहले से कमजोर था | लिहाजा वो महज तीन टांगो पर बिलकुल मेरे अधमरे पैरों की तरह काँप रहा था ..|
मैंने लड़खड़ाती जुबान को काबू रखने की कवायद करते उनको बतलाया , "भाई जान के अलावा  अपना और पूरे परिवार का  वोट कहीं गया नहीं है |" आप नइ भी आते तो आपको .....मैं अपनी बात पूरी करता उससे पहले हठेला ने बयान किया , हम वोट के लिए अभी निकले कहाँ हैं ...?

भाई जान को एक विज्ञापन ड्राफ्ट करवाना है .....?
विज्ञापन और मुझसे ...? मैं तो कवि और अदना लेखक हूँ ....| किस्से ,कहानी, कविता या चुनाव है तो कुछ जिंदाबाद के नारे लिख सकता हूँ | कोई तर्ज दो तो विरोधी को उखाड़ने की पैरोडी बना सकता हूँ |
आप आज  आइडिया दे जाइये कल सुबह तक 'माल' मिल जाएगा |
मुझे पहली बार किसी साहित्य विधा की चाशनी में पगे  चीज  को 'माल' कहते हुए शर्म सी आई |
मूढ़ लोगों के बीच में बात , उनकी भाषा में बताने से संप्रेषणीय हो जाता है,कुछ-कुछ इस टाइप का इल्म मुझे था |   

इस बीच भीतर कमरे में रखी मोबाइल की घण्टी बजी|
मैंने एक्सक्यूज मी वाले अंदाज में, चाय नाश्ता भिजवाने  की बात कह भीतर पहुचा |
श्री आदेश पलटवार जी, अपने नए अंक के लिए कुछ चाहते थे |
मैंने आई मुसीबत को बखाना .... |
-कौन हठेला .... वही तो नहीं जो गंज मण्डी में पल्लेदार था ,हाथ ठेला चलाता था | वहीं से उसका नाम हठेला पड़ गया | वो धीरे -धीरे मुन्ना ठाकुर के साथ छुटभैया नेतागिरी करते,आज  उसका दाहिना हाथ है |
मैंने कहा,पलटवार जी ,  मैं हेंडल नहीं कर पाउँगा | तुम्हारे पास भेजता हूँ |
उसने समझाया ,बेवकूफी मत करो ... वे लोग कौन साहित्य के शोध -छात्र हैं | कुछ भी लिख के टरका दो ...बस इतना ख्याल रखना कि 'मटेरियल' में कोई पकड़ की बात न रह जाए |
उन्हें पहले निपटा ,मैं फिर लगाता हूँ |
वापस उनके बीच पहुच के मैंने हठेला जी को कहा , (जी लगाना मेरी मजबूरी में शामिल जान के पढ़े) आप सविस्तार अपने विज्ञापन का मौजू बताइये ..... ?
हठेला ने पूछा ये मौजू क्या है ....?
मैंने कहा किस अखबार में कितने बड़े फांट में किस जगह छपना है |
वो बोला , अपने इलाके में चार अख़बार हैं ,मुन्ना जी चारो के एडीटर को नजदीकी से जानते हैं| जहाँ कहेंगे आयोग के दिशा-निर्देश मानते हुए छाप देंगे |
वे छपाई का खर्चा भी न लेंगे, बावजूद आयोग में जमा करने को पुख्ता  बिल देंगे | मुझ पर उनकी दबंगई हॉबी करवाने का नुस्खा चल पड़ा था |
हठेले ने मुझे आस्वस्त करते हुए कहा ,घबराओ नहीं | भाई जान खुश हुए तो आपके 'बिल'का पाई-पाई नगद दे जाएंगे | पारदर्शिता का मामला है |
हठीले ने भविष्य में  किसी काम को 'पास' करवाने का जिम्मा भी लिया|
मैंने मन ही मन सोचा लेखको को किसी एडीटर पर दबाव डालने की जिस दिन शुरुआत हुई, उस दिन से साहित्य का पतन चालु हुआ समझो .....| 
   वे चले गए ... एकाएक कट्टा उठा लेने से ,मेरे सेंटर टेबल की  चौथी टाँग पूर्व की स्थिति में लौट आई मगर मेरी हालत में पहले सा कुछ नही रह गया था |
अब मेरे सामने, उनके द्वारा दिए गए व्याखान से  'मुन्ना-चालीसा' विज्ञापन रस निचोड़ना था |
मैंने लिखा ,
मेरे प्यारे मतदाताओ !
 आज मैं आपके सामने अपना जी खोल के रखता हूँ |
मैं गरीब ,अछूत जात में पैदा हुआ | मुझमे संगठन क्षमता थी | साथियों से कभी धोखा नहीं किया | पार्टी वाले मुझे किसी बन्द या हड़ताल में ढूंढ के निकाल लेते | मैं उनके एवज डंडा खाता ,धरा 144 के उलंघन पर जेल जाता | इस किस्म के करीब 10 अपराध पर मेरी आये दिन  पेशी होती है | मेरा अपराध क्रमांक और आगे की पेशी तारीख का मैं उल्लेख नीचे कर रहा हूँ |
मुझ पर किडनेपिंग, फिरौती का भी आरोप है| इस अपराध के बारे में आपने तब के अखबार में पढा होगा | कई पत्रकारों ने मेरी भूमिका को सराहा है | मैंने, भष्टाचार में गले तक लिप्त अधकारियों के खिलाप, कई आंदोलन किये ,उस समय के सरकार को चेताया , मगर सरकार स्वयं उन्ही लोगो की हिफाजत में खड़ी थी, लिहाजा मुझे सामने आना पड़ा| इन अपराधों की संख्या छै है| इसे भी आपकी जानकारी में ला रहा हूँ |
अब रही बात 302  की ...? ये विरोधियों की चाल है | मामला अपराध क्रमांक 1111 पर मुझे बेल मिली है | अगर संगीन होता तो मैं बाहर नहीं होता | अभी यह अदालत के अधीन है अत: इस विषय में व्यापक पक्ष रखना उचित नहीं है |
आप मतदान के दिन निर्भयता से मुझ पर भरोसा करते हुए मेरे पक्ष में वोट दे सकते हैं |
आपका सदैव निर्भय भाई ,
मुन्नाभाई ठाकुर
उम्मीदवार ......सत्तापक्ष  दल

हठेले ने इस विज्ञपन राइटिंग पर इतना जरूर कहा, हम सत्ता  काबिज होते ही आपको, राज्य-राजभाषा आयोग का चेयरमेन  बनाने का वादा करते हैं |
मुझे लगा बन्दूक की नोक पर मेरा चयन 'हिंदी' के लिए कितना उत्साही परिणाम देगा पता नहीं ,,,,?   

 सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर
जोन 1 स्ट्रीट 3 
दुर्ग छत्तीसगढ़

मोबाइल 9426764552///9408807420


गड़े मुर्दे की तलाश

गड़े मुर्दों की तलाश
सुशील यादव

ये राजनीति भी अब गजब की हो गई है।
ज़िंदा लोगों पर आजकल की नहीं जाती। मुद्दे आला किस्म के  मिलते नहीं , सो मुर्दे उखाड़े जाते हैं।
राजनीतिज्ञ लोगों को आजकल फावड़ा-बेलचा ले के चलना होता है।
- क्या पता किस जगह किस रूप में क्या गड़ा मिल जावे?
एक अच्छे किस्म के, ताजा-ताजा, स्वच्छ, लगभग हाल ही में पाटे हुए, मुरदे की खुशबु नेता को सैकड़ों मील दूर से मिल जाती है।
एक अच्छा मुर्दा , किस्मत के खजाने खोल देता है, ऐसा जानकार, तजुर्बेकार, राजनीति में सैकड़ों चप्पल घिसे नेताओं का मानना है।

इन दिनों कनछेदी मेरे पास आकर ‘मुरदा पुराण‘ सुनाये जाने की जिद करने लगा।
गुरुजी ! आपने सन बावन से इस देश के पचासों इलेक्शन देखे हैं। आपके जमाने में कैसा क्या होता था ? इलेक्शन के कुरुक्षेत्र में  वेद-पुराण के आप पुरोधा पुरुष हैं। मुझे लगा कनछेदी "बचे हुए अंतिम-पुरोधा " की तरह मुझे ट्रीट कर रहा है |
हम आपके तजुर्बों को अक्षुण रखना चाहते हैं।
उसके ये कहने से लगभग यकीन की हद तक , ”क्या पता आप कब टपक जाओ”, वाली कनछेदी की अंदरुनी सोच ध्वनित होने लगी ।
कनछेदी हमें फ्लेश बेक में ले जाने की, गाहे-बगाहे भरपूर कोशिश करता है। वो कहता है अगर आप, हम जैसे आम लोगों का, या चेटिंग- सेटिंग में बीजी नौजवान पीढ़ी के बचे हुए समय में कुछ ज्ञान वर्धन करेंगे तो बड़ी कृपा होगी। मै कनछेदी को, इलेक्शन वाले किसी अपडेट से नावाकिफ रखना खुद भी कभी गवारा नहीं करता।
उसके अनुरोध को मुझे टालना कभी अच्छा नहीं लगा। मेरे पास इन दिनों समय-पास का कोई दूसरा शगल या आइटम, सिवाय कनछेदी के और कोई बचा भी तो नहीं  .....?  इसलिए उसे बातों के मायाजाल में घेरे रहना मेरी भी मजबूरी है। उसे पुराने किस्से सुनने और मुझे सुनाने का शौक बस यूँ ही पल गया  है।

आप लोगों के पास समय है तो चलें, 'टेम- पास' के लिए कुछ गड़े मुर्दे उखाड़ लें ....?
सन बावन से सत्तर तक के इलेक्शन में, ‘लोकतंत्र के पर्व की तरह’ खुशबू थी, सादगी और भाईचारे से लोग इस पर्व के उत्साह में झूमते रहे।यूँ जीत -हार को संजीदगी से लेने का चलन था जीते तो ठीक वरना अपना क्या गया ....? इलेक्शन में चवन्नी भर का बर्दाश्त काबिल ही तो पैसा लगता था | धीरे -धीरे बाद में  कुछ प्रदेशों में, कट्टा से वोट छापे जाने की शुरुआत हुई। बूथ पर काबिज हो के मजलूम लोगों के वोट के हक़ को छीन लेना नए फैशन में शामिल होने लगा ।
आहिस्ता-आहिस्ता , कट्टा संचालक आकाओ ने सोचा इससे बदनामी हो रही है। जीतने में मजा नहीं आ रहा, वे अपने आदमियों से बाकायदा हवाई गोलियाँ चलाकर लोगो को सचेत कर देने की कहने लगे।
हिन्दुस्तानी नेता, चाहे कैसा भी हो, उनमें कहीं न कहीं से गाँधी-बब्बा की आत्मा देर-सबेर घुस ही आती है, वे अहिंसा का पाठ भी पढ़े होने के हिमायती बने दीखते हैं।

वे अपने लोगों को सीखा के भेजते, आप को पेटी उठाने से पहले  बूथ पर ये जरुर कहना है कि, हम आपको लूटने-धमकाने आये नहीं हैं, हमें बस डिब्बा उठाना है। नेता जिताना है। वे डिब्बा उठाये चलते बनते। 'सत्यमेव-जयते-लोगो’ वाले खाकी वर्दीधारी, पोलिग बूथ के कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी, इस पुनीत कार्य को होते देखने में खुद को अभ्यस्त करते दिखते, वे मन ही मन ‘जान बची और लाखों पाए’ नामक  नोटों को गिनने में लग जाते।

अब ये हरकते, प्राय कम जगहों पर, या कहें तो नक्सलवाद-आतंकवाद प्रभावित क्षेत्रों को छोड़ कहीं देखने में नहीं आतीं। उन दिनों मुर्दा उखाड़ने का झंझट कोई नहीं पालता था, तब केवल  मुर्दे बनाने, टपकाने के खेल हुआ करते थे। सीमित जगहों पर खेला जाने वाला ,ये खेल था तो सांकेतिक मगर जबरदस्त था। एक चेतावनी थी, प्रजातंत्र पर आस्था रखने वालो चेतो, नहीं तो हम समूची बिरादरी में फैलाने के लिए बेकरार हैं।
कनछेदी ! जानते हो इसकी वजह क्या थी ?
कनछेदी भौचक्क देख के, ना वाली मुंडी भर हिला पाता।

मै आगे कहता, राजनीति में आजादी के बाद बेहिसाब पैसा आ गया। अपना देश, गरीब, शोषित, दलित, अशिक्षा, महामारी, अंधविश्वास, झाड़-फुक में उलझा हुआ था। या तो बाबानुमा धूर्त लोग या चालाक नेता इसे ठग रहे थे। योजना के नाम पर बेहिसाब पैसा, सड़कों, नालियों, बाँधों में, ठेकेदार इंजिनीयर के बीच बह रहा था। बाढ़ में पैसा, तूफान में पैसा, भूकंम्प में पैसा, सूखे में पैसा। पैसा कहाँ नही था.....? नेताओं ने इन पैसों को, दिल खोल के बटोरने के लिए इलेक्शन लड़ा। लठैत-गुंडे पाले ......दबदबा बनाया ......मुँह में राम बगल में छुरी लिए घूमे।
एक रोटी की छीन झपट, जो भूखों-नंगों के बीच हो सकती थी वो बेइन्तिहा हुई।
मेरा कहना तो ये है की कमोबेश आज भी आकलन करें तो कोई तब्दीली नजर नहीं आती, हाल कुछ बदले स्वरूप में वही है। अब, वोटर के दिल को जीतने का नया खेल यूँ खेला जाने लगा है कि गड़े हुए मुर्दे उखाड़ो।

बोफोर्स के मुर्दे उखाड़ते-उखाड़ते सरकार पलट गई | नेताओं के सामने नजीर बन गया|

 पिछले किये गए कार्यों का पोस्टमार्टम, उनके कर्ताधर्ताओं का चरित्र हनन अच्छे परिणाम देने लगे।
घोटालो को, घोटालेबाजों को हाईलाईट किये रहना, पानी पी-पी के कोसना, गले बैठने तक कोसना फैशन बन गया। लोग मानने लगे कि, दामाद जी को सूट सिलवा दो तो आफत, न दो तो जग हँसाई।
परीक्षा पास करा के लोगों को नौकरी दो, तो उनके घर के मुर्ग-मुस्सल्ल्म की उड़ती खुशबू सूघ के घोटाले की गणना करने में बाज नही आते ।

‘आय से ज्यादा आमदनी’ के मामले में, अपने देश में बेशुमार मुर्दे गड़े हैं।
इनको तरीके से उलटो-पलटो ,उखाड़ लो, तो, विदेशों से काला धन वापस लाने की तात्कालिक जरूरत नहीं दिखती। कोयला माफिया की कब्र उघाड़ के देख लो, माइनिग वाले, प्लाट आवंटन, मिलेट्री के टाप सीक्रेट सौदे पर तो हम अपनी आँख भी उठा नहीं सकते।
जो है जैसा है, की तर्ज पर, मुंबई फुटपाथ पर सोये हुए बेसहारा ग़रीब माफिक  जनता रात के सन्नाटे में कब लात की ठोकर खाने पर मजबूर हो जाए कह नहीं सकते |
 ये एक-एक शख्श अतीत के गड़े हुए मुर्दे हैं| किन-किन मुर्दों को को कहाँ-कहाँ से उठायें ?
सब एक साथ खोद डाले गए तो चारों तरफ बदबू फैल जायेगी। महामारी फैलने का खतरा अलग से हो सकता है।
चलो ! स्वच्छ भारत के आम स्वच्छ आदमी के मन से सोचे...
इस प्रजातंत्र में, कई इलेक्शन आने हैं...|
अपनी हिन्दू परंपरा में ये अच्छी बात है ,हम मुर्दों को गड़ाने की बजाय जला देते हैं। शरीर जला देने के बाद भी, अविनाशी आत्मा का अंश फकत कुछ दिनों के लिए हमारे दिलों में गड़ा रह जाता है बस वही कनछेदी को बताना था ।

कनछेदी की तन्द्रा भंग हुई। वह मायूस सा लौट गया।

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर
जोन १ स्ट्रीट ३ दुर्ग छत्तीसगढ़
४.११.१८
मोबाइल 9408807420 /9426764552



तैं सुशील ....

अतलंग लेवत  सरकार अडबड
नदिया  चढ़े मानो  धार अडबड

अर्जी देवैया यहु चिन्हारी
जगा-जगा कहे जोहार अड़बड़

का खा के उपजाए महतारी
तोर बाबू के गोहार अडबड

चीन्हे बर मोला,जुग लग जाही
चारो धाम हे  चिन्हार अडबड

परिया परे कस 'जी' लागत असो
करम के जुच्छा कन्हार अडबड

मिरचा सही तोला सुरतावंव
मरत-ले झन्नाथे  झार अड़बड़


तैं सुशील चिक्कन घड़ा के माफिक
मातम में मानस तिहार अडबड

सुशील यादव
फिलहाल ,वडोदरा गुजरात

अड़बड़ = बहुत ज्यादा
चिन्हारी=पहचान
जोहार= दुआ सलाम
गोहार =चीख चिल्लाना
जी = मन ,ह्रदय
परिया= फसल न उगाना
कन्हार=उपजाऊ  जमीन
जुच्छा= खाली
मानस = मनाना

12. 9.18

221 2122 221 2122
वरना कहाँ -चलोगे ...?
हम बेवजह ,जहां में  भटके गुमान लेकर
कोई जरूर आएगा नव-विहान लेकर

कुछ दाग आज भी  बाकी है, जिसे मिटाने
बरसो लगे, पुराने- बीते, निशान  लेकर

इतराये जो पड़ौसी उसको तमीज दे-दो
आदत सुधार लें वो अमिट पहचान लेकर

मजबूत हैं इरादे तो बात ही नहीं है
वरना कहाँ -चलोगे अपनी थकान लेकर

कोशिश करें  सभी जन ,ऊंचा ललाट पाएं
गौरव पलों में झूमे  सब , हिन्दुस्तान  लेकर

सुशील यादव
१३.६.१८/ ३०.९.१८


सबको  मंजिल एक मिले
@

मुझको गड़ा खजाना दे
उसका पता ठिकाना दे

वो दिन लौटा दे मौला
फिर से  पाई-आना दे

लौट सके हम कुनबे तक
गुजरा वही जमाना दे

कागज की हर नाव बहे
हमे हुनर नजराना दे

व्यथित जुलाहा घूम रहा
हाथों  ताना-बाना दे

इस भूगोल क्या भटकना
हर दुविधा  हर्जाना दे

जो कोलाहल के आदी
बड़ी  सजा वीराना दे

सबको  मंजिल एक मिले
सुलझा  पागलखाना दे
@

सुशील यादव

१०अक्टूबर

हम तो मत के दाता ठहरे ...
##
पाँव यहीं जमा लो भइया
धूनी इधर रमा लो भइया
#
तुम पाँच बरस बाद दिखे हो
फिर  हिसाब सम्भालो भइया
#
हम तो मत के दाता ठहरे
डाका जम के डालो भइया
#
हमें  पार तो  बाद लगाना
खुद को 'बेल' छुड़ा लो भइया
#
बनी हुई बरसों की आदत
सच से आँख चुरा लो भइया
#
चौराहा करके पसन्द मूरत
आदमकद बनवा लो भइया
#
देश भला की गर सोचो तो
तम्बू राम निकालो भइया
##
सुशील यादव

३१.१०.१८

दीप जले जब तूफानों में

किस -किस से तुम बातें करते ,किससे यारी पक्की हो गई
है निकट चुनाव तभी  , गठबंधन तैयारी पक्की  हो गई

छल कपट भरी दुनिया में, लेना- देना सब चलता है
तुमने सीखा लेना महज ,बगावत सारी पक्की हो गई

मुह देखी दुनिया में है,  खेल निराले मायावी सारे
लो पीछे की हलचल में अब,धार तुम्हारी पक्की हो गई
   
राह पकड़ लोगे जिस दिन ,शांती-अहिंसा बापू जैसे फिर
मैं समझूँगा उस दिन केवल ,दुनियादारी पक्की हो गई

कच्ची सड़के , गाव् अन्धेरा,दीप जले जब तूफानो में
जिस दिन भूखा सोय न कोई,पहरेदारी पक्की हो गई

बोल थके हम चौराहों पर ,आदमकद अपना लगवा दो
मरने की सब राह  देखते ,अपनी बारी पक्की हो गई

उन्मादों में घेरे  रखता ,बाटे फिरता कुनबों -जातों में
वे पैदल  के दिन लद गए,  घुड़सवारी पक्की हो गई

सुशील यादव
७.११. १८
शुभ दीपावली


@@@@

रिश्ता अतके बच पाही
##

हूके हस ना भूके हस
पान खाय अउ  थूके हस

चेत कभू चढय नही
उही जगा फेर  रुके हस

गांज समय, बड़ पैरावट
आगी- आगी  फुके हस

का  पंदोली पा सकबे
मनखे- मनखे भूके हस
 
रिश्ता अतके बच पाही
जती-जती अपटे-झुके हस

सुशील यादव
18.5.18

sushil yadav durg: है कौन जो

sushil yadav durg: है कौन जो: 2212 2212 1222 2 अहसास ....! है कौन,जो तन्हाई को सदा देता है मुझको कभी,बन के सबा हिला देता है मैं सुनने का आदी नहीं,मगर कानो में सुर...

सुशील यादव दुर्ग :      धनाक्षरी 1     $    'पर' जिनके कटे थे ,वो...

सुशील यादव दुर्ग :

     धनाक्षरी 1
     $
    'पर' जिनके कटे थे ,वो...
:      धनाक्षरी 1      $     'पर' जिनके कटे थे ,वो परिंदे कहाँ  गए      लो सीधे-सादे गाँव के, बाशिंदे  कहाँ गए      $      जमी...

Sunday, 12 August 2018

किरीट सवैया

किरीट सवैया नामक छंद आठ भगणों से बनता है।
इसमें 12, 12 वर्णों पर यती होती है।

तीरथ जाकर लौट गया वह,बीन रहा अब चांवल कंकर
जो मन में प्रभु वास रहे तब ,छीन सका उर से कब शंकर

महाभुजंगप्रयात आठ सगण| :सुशील यादव
यहां तो न बाकी रहा चाहतो का, इलाका जिसे  याद  तूने किया है
न आबाद है वो जमीने जहां तू ,उगा बालियां खेत में जी लिया है

बचा कोहरा-धूल-माटी निहारो ,जिसे चाहते हो उसे ही  पुकारो
सभी तो कहीं जा चुके हैं यहां से ,तु बीमार कैसे जिया है

वो आजकल इन दिनों

वो कुछ दिनों से ....
२२१२    २२१२  2२1२  1२
अपनी जुबा से, बात मन की  खोलता नहीं
वो कुछ दिनों से, आजकल फिर बोलता नहीं

खामोशियाँ उसकी, इशारा क्या करे बता
टूटे परो से, आसमा जो  तौलता नहीं

दिल टूटने की हर अदा में सादगी रखे
पी ले ज़हर चुपचाप, ज़हर वो घोलता नहीं

पानी सा हो, उस खून का, क्या करता वो भला
घिर के मुसीबत- आफतो में खौलता नहीं

सुशील यादव

गुमान लेकर

221 2122 221 2122
हम जगह-जगह, दुनिया भटके गुमान लेकर
कोई जरूर आएगा नव-विहान लेकर

कुछ दाग जहन में बाकी है, जिसे मिटाने
जख्मो सहित निकल भी दौड़ो, निशान लेकर

इतराये जो पड़ौसी उसको तमीज दे-दो
आदत सुधार लें वो अमिट पहचान लेकर

मजबूत हैं इरादे तो बात ही नहीं है
वरना चले-चलोगे कैसे थकान लेकर

कोशिश करे सभी जन ,ऊंचा ललाट पाये
गौरव पलों में घूमे सब , हिन्दुस्तान  लेकर
सुशील यादव
१३.६.१८

दुनिया रंग -बिरंगी


२*८ दुनिया रंग-बिरंगी

दुनिया रंग-बिरंगी देखो
फिर से चाल फिरंगी देखो
हम हैं अपने सूबे में खुश
बारा- मासी तंगी देखो
#
आज यही केवल सच्चाई
है भाई का नाम कसाई
हम ख़र्चे हैं आना जिस पे
वो छोड़े न हिसाबी पाई
#
#
हम पर आग बबूला होते
हम क्या सावन झूला होते
मौसम की है मार सभी को
सब को परखो सब से सीखो
#

पीतल को समझा था सोना
मिटटी को था मिटटी होना
लाख सजा लो घर को चाहे
प्यार बिना चमके कब कोना

#

 

१५.६.१८

वीरांगना लक्ष्मीबाई


वीरांगना रानी लक्ष्मी बाई के  बलिदान दिवस १८जून पर
##

तुम रक्षक हो सीमा-प्रहरी ,पथ में आगे बढे चलो
पहाड़ दुर्गम  को लाघों,दुरूह घाटी चढ़े चलो
मानवता के तूल तुम्ही  ,मिट्टी के हो कारीगर
बिन मन्दिर पूजे जावो ,मूरत वो भी  गढ़े चलो
#
एक दिया तम में रखना ,एक जले  आंधी  आगे
हो अडिग विश्वास तुम्हारा ,सर-पैर ले दुश्मन भागे
सीमा से जब वापस आओ ,माँ के लाल बहन-वीरा
हर  सुहागन दृग देखना , कैसे सोये दिन जागे
#
शांति जिसने जकड़ लिया, 'पर' अहिंसा के हैं काटे
मक्कारी  चादर ओढ़े ,परचम जिहाद के  बांटे
मजहब के चण्डालों का,मखौल क्यों नहीं  उड़ाये ,
इनकी मकसद के जड़ को,क्यों न अभी कतरें- छांटे
#
लक्ष्मी-बाई सा साहस ,अपने भीतर आप भरो
जीवन शब्दकोश निकालो ,कायरता से काश डरो
लोहा लेने की बारी , कतार पीछे  क्या रहना
जन-जन में चिश्वास जगे ,आपतकाल   तुझे    लड़ना
#
मर्दानों की शक्ति लेकर , एक रानी  रण में आई
उम्र की कोमल काया थी ,उतरी न थी  तरुणाई
अंग्रेजो को रण में तब ,कैसे  खूब छकाती थी
वो थी  रानी झाँसी या ,संदेश भरी  पाती थी
सुशील यादव
16.6.18

है कौन जो

2212 2212 1222 2
अहसास ....!

है कौन,जो तन्हाई को सदा देता है
मुझको कभी,बन के सबा हिला देता है

मैं सुनने का आदी नहीं,मगर कानो में
सुर-ताल-नगमा सा कहीं,सुना देता है

हिलती रही दीवार पर,तेरी परछाई
अहसास, अक्स कई तरह,बना देता है

जिस राह पर होती रही मुलाकाते,आज
उस रास्ते पहरा कोई बिठा देता है

गुमनाम से अँधेरे हम निकल भी आये
हालात जीना, हाल हर सिखा देता है

अंजान सा बैठा छिपा हुआ नासूर अब
खुद हरकतों अपनी कभी डरा देता है

मत सोचना, मेरे कदम के नक्शो चलना
जंगल करीब यकबयक पहुचा देता है

है तलब हमको तेरी किया क्या जाए
ये नाव गलत सुराख ही डुबा देता है

मजबूरियां है या समय फरेबी जाने
दीवार साझा बीच में उठा देता है

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग
10.7.17


मश्वरा


गलत राय गलत मशवरा देने वाले
मुंसिफी की आड़ फतवा देने वाले
बिजलियाँ सौ -सौ गिरे तेरे घरों में
ओ जन्नते काश्मीर जला देने वाले
सुशील यादव

दहशत ,दीवारें और  अदावत केवल
सीख लिए होते काश  बगावत केवल
माथा सहजादों का है  झुकते देखा
जिनका  मकसद होता मोहब्बत केवल
##

खोज लिया जिसने

 लिया जिसने .....

जब दुश्मन जाने पहचाने हैं
यारो हम भी बहुत सयाने हैं

लेकर अपनी बस राम-कहानी
समझौतों के सहज निशाने हैं

मुस्कान मिली तो जीवन छलका
यूँ गम के सौ-सौ अफसाने हैं

जग को दे न सके अपना परिचय
कहने के कई लाख बहाने हैं

किसने हमको कब तौला-परखा
हम बीते इतिहास पुराने हैं

खोज लिया जिसने दिल को भीतर
पाए असल 'सुशील' खजाने हैं

सुशील यादव
14.7.17

सुशील जो भुला

'सुशील' जो भूला ....

दिल रखने को तुझे दिया क्या है
तू ही बता कि फ़ायदा क्या है

यारा बुझा दिया चिरागो को
जलता हुआ यहाँ बचा क्या है

मुहताज हैं खुदा यहाँ हम भी
ये मुफलिसी सिवा मिला क्या है

अब तिलस्मी लगी हमे दुनिया
देखे ये  फैलता नशा क्या है

चारो तरफ है भीड़ का उन्माद
नारो के बीच निकलना क्या है

मजबूरियों 'सुशील' जो भूला
अब तो बता सही पता क्या है

सुशील यादव दुर्ग

लोग कहते अब

लोग कहते अब.....

अब यहां ना आशियाँ- परिंदा बचा
यार बारूद का धुँआ बस धुँआ बचा

ले गया फिर  छीन बस्ती कोई अमन
डबडबायी आँख आँगन कुँआ बचा

कौन सूरत  आप  पहचानता यहाँ
पास किसके आजकल  आइना बचा

वो सभी पल याद हमको  करीब से
वो जहां बस  आदमी  झुनझुना बचा

हाँ मुझे भी लौटना है 'सुशील' पास
लोग कहते अब वहीँ मन 'घना' बचा

सुशील यादव दुर्ग
2122   2122  1212

शब्द

शब्द ....

जाने किन पैरों पर
खड़ा रहता है
आसमान
दिन रात
बिना थके हुए ....?
मेरे
तुम्हारे
शब्दों को अब
बैसाखी की
जरूरत
महसूस होती है ...
हम आहत-
अपाहिज मन से
बोलते हैं या
सहानुभूतियों की किताब
उस जगह से खोलते हैं
जहां पृष्ठ भर
हाशिये के सिवा
होता नहीं कुछ
#
हम सिद्धार्थ की तरह
खोजने
निकल पड़ते हैं
यथार्थ ...
मगर हमारा
'यक्ष -प्रश्न'

हमे
घेरता है
बरबस

हम आकाश की बैसाखी
उसके पांव
उसकी जमीन को
तलाशने में जुट जाते  हैं,
न जाने किन पैरों पर खड़ा रहता है
आसमान ...?
#
काश ,
हमे पहले
बता दिया गया होता
आसमान कुछ नहीं
एक हवा है
धुँआ है
शून्य  है
और
हवा को
धुँआ को
शून्य  को
बैसाखी की जरूरत नहीं होती
वह अपने
शास्वत वजूद पर
स्वयं चलता है
दिन -रात बिना थके हुए
#
काश हमारे शब्द
यूँ ही
हवा की तरह
धुँआ की तरह
शून्य की तरह
बिना पैरों
चलते
तैरते
अनवरत
लगातार
संप्रेषित होते
बिना किसी बैसाखी के

सुशील यादव दुर्ग

समझौते की सूरत

222222222

समझौते की कुछ सूरत देखो
है किसको कितनी ज़रूरत देखो

ढेर लगे हैं आवेदन के अब
लोगों की अहम शिकायत देखो

लूटा करते, वोट गरीबों के
जाकर कुनबों की हालत देखो

भूखों मरते कल लोग मिलेंगे
रोटी होती क्या हसरत देखो

फैला दो उजियारा चार तरफ़
एक दिए की कितनी ताक़त देखो

साहित्य शिल्पी में


मुहब्बत में गर

१२२ १२२ १२२ १२२
सदी एक लगे है
मुहब्बत में गर ये तल्खियाँ न होती
जमाने में उडती तितलियाँ न होती

नहीं रोकता राह, बादल उजाला
सुर्ख़ियां सुबह की बदलियाँ न होती

इसी घर अहाते में छुप कर रहा है
जहाँ अब जरूरत बिजलियाँ न होती

ख्यालों में आने लगे आजकल वो
भुला बैठने जिसको खुशियाँ न होती

कमा के रखे माल असबाब सारे
सदी एक लगे है, गिनतियाँ न होती

सुशील यादव दुर्ग

आम आदमी की नजर

२१२२ २१२२ २ १२ २ २
चेहरे क्यों हैं मलीन,.....
जिन्दगी को आदमी, आम की, नजर देखो
रख कभी सीने , वजन कोई , पत्थर देखो

डूबने लग जाए, स्वयं ही वजूद कभी
लहर उठती,रह किनारे, समुंदर देखो

आग नफरत की लगाकर, जो छिपा करते
उतरता 'खूनी' वहां कब , खंजर देखो

जो हमे बेख़ौफ़ मिलते, हर-कहीं हरदम
चेहरे क्यों हैं मलीन, आँखे भी अन्दर देखो

एक तमाशा सा, हुआ तेरे शह्र में कल भी
आज की, ताजी फिजा क्या है ,खबर देखो
@@@१८.१२.१५ ....सुशील यादव ..

कभी नींद कभी

१२२ १२२ १२२ १२२
कभी नीद तो कभी ख़्वाब छिनता है
वो खिलने से पहले गुलाब छिनता है

मेरी उतरन कभी पहनता रहा जो
वही मुझसे मेरा नकाब छिनता है

कहाँ क्या बुरा जो मेरे नाम जुड़ता
जमाना मुझी से खिताब छिनता है

अगर तू कहे आसमा ला के दे दूँ
हथेली कोई आफताब छिनता है

बुझे लोग, बदहाल बस्ती बीच लगता
यहाँ याद का हर हिजाब छिनता है

सुशील यादव

रंगों में बनत गया


रंगों में बट गया...
#
दर्द का दबाव
बढ़ गया ऐ दोस्त
पहले सा
खुशियों का
आयतन नहीं है
#
लुप्त हो गई
पवित्र पूजा की थाली
मन की श्रद्धा
अक्षत कुमकुम लाली
शेष कहें क्या बच पाया
केवल कांसा
बर्तन नहीं है
#
न बदली हवा
न मौसम का मिजाज
वही जगह वही जमीन
लोग वही ,
मगर जब से बदली
'रंगों'  की परिभाषा
क्यूँ लगता मेरा
वतन नही है ?
##
सुशील  यादव
  

मसखरी युग

मसखरी युग

निगाहें हटा के ज़माना चला है
गरीबो यही तो बहाना चला है

बताओ कि है आदमी का वजूद क्या
घिरा आप ही खुद निशाना चला है

बचा के रखें क्या विरासत की खातिर
कगार आजतक आब-दाना चला है

मुकदमो में जीतें कि हारें बराबर
घड़ी-फैसला मुंसिफ-थाना चला है

हमे गुदगुदा के छिपा कौन बोलो
कहीं मसखरी युग पुराना चला है
सुशील यादव
१३६१८

कहाँ तक छुपाएं

कहाँ तक छुपाये,,,?

कहाँ तक छुपाएं ,किस किस से छुपाएं
फटी कमीज हो गई ,तार-तार जिंदगी

  याचना में जब भी
हाथ ये उठाये
लोग हमें शातिर
चोर ही ठहराए

कहाँ तक बताये किस किस को बताये
पार पर ही डूबी , बार -बार जिंदगी

हौसलो की पतंग
जब से कटी है
राहगीरों ने डोर
आस्था लुटी है

कहाँ  तक मनाएं किस -किस को मनाएं
बची कहाँ है अब , सार -सार जिंदगी

पिछले कुछ दिन से
मन को हम झांकते
ईमान  की तुला में
कद- वजन नापते

कहाँ तक बचाये, किस -किस को बचाएं
चक्रव्यूह में घिरी ,धार-धार जिंदगी

कलयुग में होता
हमको  पछतावा
दुष्कर्मो का जब
फूटता है लावा

कहाँ तक हटाएँ, किस-किस को हटाएँ
ईंट-रोडे ये हैं बने ,द्वार-द्वार जिंदगी

सुशील यादव
१६.जुलाई १८

बुन रहे केवल अनुभव

बुन रहे केवल अनुभव

मेरी नियति का नीड़ न जाने
पायेगा कब प्रिय कलरव ...?
तुम प्रकृति या भीड़ से जाने
लौट आओ कब बन उत्सव ..?

मेरी दुविधा हरदम
चर्चित रहती है |
कोलाहल की बाढ़ लिए ,
अधमरी
नदिया बहती है |
पीड़ा ऐसी मन की मानो
हो जननी उद्धत  प्रसव ...

प्रयोग कितना चल पायेगा
जगत को धोखा छल पायेगा
मर्यादा ,लाज बचाने खातिर
शब्द सार्थक, निकल पायेगा ...?

संयोग के ताने-बाने में बुन रहे केवल अनुभव |

नहीं शिकायत कुछ भी लेकिन
बात तो पूरी कर जाते .
गुम हुए थे मेले में
मिलन बेला क्या  मुकर जाते
अगर आता सुधरना हमको
अभिनय नहीं करते अभिनव

सुशील यादव
१६.जुलाई १८
 

आँखी के कोन्टा


आखी के कोंटा लुकाय होबे ना
पीरा ल अंगना सुताय  होबे ना

कहाँ बिलम गे मोर सुघ्घर परेवा
जाते जावत, कहु, बताय होबे ना
तोर चिन्हारी देखत ले रोवव्

नइ भावे परसे परसाए  जेवना
बरा सोहारी तैं, अघाय होबे ना
  कहाँ बिलम गिस  .....
पीरा ल अंगना सुताय  होही ना
आखी ल कोंनटा , लुकाय होही ना

कहाँ बिलम गिस  तोर सुघ्घर परेवा
जाते जावत, कछू , बताय होही  ना

तोला नइ भावे  परसाए  जेवना
खावत सोहारी वो ,अघाय होही  ना

बोहे हस, अक्केला, संसो के टुकनी
संग देवैय्या, दुआरी  आय होही ना

लबरा के गोठ म, ‘कबरा’ ल चिन्ह ले
अन बन के गारा, मताय होही ना

ये बच्छर  देवारी, “टिकली फटाका”
महंगाई टोनही फुस्फुसाय  होही ना

सुशील यादव
     
 

कबीरा

2122 2212  2212  2122
हर किसी के आगे ....

आँख में आंसू ,तलब का जखीरा ले के क्या करोगे
हर किसी के आगे अपना, रोना ले के  क्या करोगे

पाँव में हो जंजीर, तो वाजिब नहीं सोचना ये
ढोल-ढपली, या हाथ मंजीरा ले के क्या करोगे

सितम के कितने मायने होंगे, पता था किसे तब
महज फतवो में आदमी, हीरा ले के क्या करोगे

लेखनी में, बाजार में, बलिदान में याद आते
सूर- मीरा, या सिरफिरा  कबिरा, ले के क्या करोगे

वो किताबो के लोग थे, इतिहास के सब पुरोधा
दरअसल वो रुतबा ,वही दर्जा ले के क्या करोगे

हो नहीं चरित्र में कोई बदलाव जब आदमी के
घर दिखावा तुलसी कहीं चौरा ले के क्या करोगे

ऊंट तक पहुँचानी है तुमको बात अपनी  सुशील जी
मुठ्ठियों बोलो कहने भर जीरा ले के क्या करोगे

सुशील यादव दुर्ग

आजादी के क्या माने...?

साया हट गया है फिर नया बरगद तलाशिये
मेरी सरकती, हुई है जमी, सरहद तलाशिये

माहिर घूंट कडुए पीने में, सुकरात चल दिया
पीता आदमी है खून महज,शहद तलाशिये

है कारीगरी का ये नमूना साफ जान लो
ये मंदिर ढके या मस्जिद ढके गुंबद तलाशिये

उनके पांव न उठाए उठेंगे अब जमीन से
कलयुग में सियासी अमन के अंगद तलाशिये

लिए परचम जिहादी घूमता चारों तरफ यहां
आजादी के क्या माने भला मकसद तलाशिये
सुशील यादव

धुआं -धुआं ,है शहर में, हवा नहीं है
मैं जो बीमार हूं ,मेरी दवा नहीं है

तलाश उस शख्स की, है अभी जारी
जिसके पांव , छाले छाले जो थका नहीं है

कहां तक लादकर, हम बोझ को चले
बनके श्रवण, मां-बाप को पूजा नहीं है

दंगो के शहर, दहशत लिए जीता हूं मैं
कोई हादसा करीब से, छुआ नहीं है

लहरो से मिटी रेतों की इबारत
सीने से मिटे नाम जो लिखा  नहीं है


1413 characters
258 words

Saturday, 21 July 2018

दोहे

दोहे

कम्बल भीतर खा डरिस ,बटकी भर के खीर
बिना निशाना छोड़ दिस,टुटहा-टुटहा तीर



टोपी थी बे  नाप की ,भगवा रंग अभाव
बीचो- बीच पहन सभा ,दिखलाते क्या भाव
सुशील यादव

सूने घर जैसे बुने , मकड़ी अपना जाल
वैसे ही प्रभु नाम का,आता रहे ख्याल

बनना प्रभु का धाम भी ,कैसे बने विवाद
आधार-शिला में रखो ,समझौता बुनियाद

एक तुम्हारी सादगी ,दूजा व्यापक प्यार
उनतालिसवां है बरस,फूले-फले दयार

जी चाहा वैसा मिला,अतीव अतल अथाह
प्रेम भरी थी सादगी, अनुपम था उत्साह

किस दधीचि से मांगना , वज्र बनाने हाड
खतरे में आ बैठ लो,हिला हुआ है झाड़

कौन दधीची दे भला , वज्र बनाने हाड
खतरे में आ बैठ लो,हिला हुआ है झाड़


वर्षगाँठ का आज है ,उनतालिसवां साल
बीते सुख-दुःख साथ में ,प्रभु  रखना  खुशहाल
सुशील यादव

मन में हो गर आस्था ,ह्रदय विराजे प्रेम
वहां कभी क्या पूछना ,कुशल-मंगलम क्षेम

ह्रदय द्वार को खोलिये , करना हो व्यापार
अंधविश्वास  'सेल' में  ,लूटो अपरंपार
  सुशील यादव

मन्दिर बनवा राम का ,ह्रदय बसा लो राम
एक तीर  से हो सके ,शायद दो-दो काम



दो आगे दो को मिला ,हो जाए जब चार
समझौतों का तब दिखे ,होना बेडा पार
सुशील यादव

जी को अपने खोल कर ,दिखलाओ जी आज
दिखे योजना कागजी ,बन्दर बाँट समाज
सुशील यादव

लेना प्रभु का नाम भी ,जी का है जंजाल
हमें  वहीं पे छोड़ दो,होता जहां बवाल



  मंसूबा दिल से बता ,होता  कहाँ  सटीक
  कल भी तू बीमार था ,आज लगे  बस ठीक


कैसे कह दें हम  तुम्हे ,मर्यादा के राम
गिनती के दो-चार तो ,गिनवा दो बस काम


घर से मर्यादा गई ,मन से गया विवेक
आगे मस्तक क्या धरें ,कौन करे अभिषेक

मन  की अंतर्वेदना ,तन में करे खिंचाव
उलझे तनाव  दायरे , कैसे करें बचाव



मत जाओ तुम लांध कर ,गृह-मर्यादा आज
दिशा-हीन हर चाह को ,दण्डित करेसमाज


राजनीति में पालते ,भ्रष्टाचार-रखैल
सबकी माया  एक है,पैसा- पैसा खेल
सुशील यादव दुर्ग

दांत दर्द ..
दन्त कथा ..

दांती वज्र  प्रहार शनि,कैसे करे उपाय
इसी कृपा बूते कभी ,लाखों को निपटाय
##
आज कहूँ फिर से सुनो,कोई साधु न सिद्ध
आसमान से ताकता , सांप-छछुंदर गिद्ध
##
तन से मर्यादा गई ,मन से गया विवेक
आगे मस्तक क्या धरें ,कौन करे अभिषेक
##
सुशील यादव दुर्ग

 २३ जून १८


२३.६.१८


जेखर ये संसार में, लबरा हवे मितान
ठलहा मन के गोठ में,झन फूको जी प्रान
##

उजड़ चुका है बाढ़ में ,संयम का अब खेत
फसलो की मोती कहाँ ,दूर-दूर तक रेत

किस्से और कहानियां ,सब थी कल की बात
आज समय की मार है ,घूसा  लाठी लात

मुझे चाहता है मगर, नहीं बोलता यार
दो-दिन की बस दोस्ती,चार दिनों तकरार


अच्छे दिन के फेर में,किसको चुनते  आप
वजन बराबर तौल कर ,कद को फिर से नाप

झट से चढ़ जा सीढियां ,इस पीढ़ी की मांग
कोई कल को तोड़ दे ,भीम गदा से जांघ

हम पर ये किसने किया ,ऐसा वज्र-प्रहार
आज-अभी से ढूंढ़ लें ,कल का तारणहार


बाहर बैठे लोग हैं ,ज्ञान चक्षु को खोल
अगर चढा कोई नशा,चाणक्य बन के बोल


मोह गया-ममता गई ,राह-चाह  की सून
सर में गोली मार के  ,टेंशन फ्री कानून

पथ दिखलाता था कभी ,पथ से भटका आज
सबको  जिसपे  नाज था ,उतरा वो ही  ताज

कितनी हुई कवायदें ,  तुझको जाएँ  भूल
पर तेरी नादानियाँ , फिर करती मशगूल


तेरी मेरी नादानियां,अतीत समय की बात
दिशा- ध्रुव से ज्ञात है,तारा चमक प्रभात

मन के द्वार विराजिए , नटखट-मोहन- श्याम
धुला-ह्रदय मैं खोलता ,सुबह-दोपहर-शाम



बाहर बैठे लोग हैं ,ज्ञान चक्षु को खोल
अगर चढा कोई नशा,राजनीति में बोल


शायद मेरी साधना,निहित कहीं है खोट
हर ऊंचाई नाप कर,मैं पाता हूँ चोट

आज सभी ने खा लिया , पेट-भरा दो जून
कल की केवल राम पर , कैसा हो कानून

अब तो मेरे हाल पर, मुझको छोडो यार
करते-करते  तंग हूँ ,अपना ही किरदार
सुशील यादव दुर्ग

४जून १८

मेरे कद से नाप ले , कद यूँ  कभी- कभार
कुर्ता उजला साफ हो,नीयत हो  चमकार
जून 7

पाप  मुक्त सबको करे ,तेरा यह भगवान
उसके बाद मुझे  कहे ,आका कोई काम
सुशील यादव दुर्ग ,२ जून १८

शायद मेरी साधना, निहित कही पर खोट
हर ऊंचाई नाप कर,पाता रहता चोट
सुशील यादव दुर्ग, ३ जून १८


अब तो मेरे हाल पर ,मुझको छोडो आप
जो मुड़ कर देखा नहीं,मेरा रुदन विलाप
सुशील यादव दुर्ग, ३ जून १८

खूंटे पर ज्यों बांध दे ,निरीह कोई बैल
रुकती साँसे देखती ,जीवन उतरन मैल

परम सत्य आकाश है ,झूठ मोह पाताल
नया बसेरा  खोज तू,अपना आज सँभाल

क्यों कर अब तू पालता,परहित व्यापक मोह
अंत-शरण में दीखते ,केवल खाई-खोह

कभी  परों  को खोल दो, देखो सहज उड़ान
स्थापित करती बेटियां, आसमान  पहचान

नेकी के अब दिन लदे ,सेवा है बेकार
नाम कमा के क्या मिले ,ले जाए सरकार

मन की हर अवहेलना,दूर करो जी टीस
व्यवहारिकता जो बने ,ले लो हमसे फीस
सुशील यादव



तेरा दिल बस छोड़ के ,बाकी सब बकवास
तुझको केवल देख के ,आनन रहे उजास
सुशील यादव

साल नया स्वागत करो ,हो व्यापक दृष्टिकोण
अंगूठा छीने फिर  नहीं ,एकलव्य से  द्रोण
सुशील यादव

ध्वनि की आहट में सहज,मारा करता तीर
प्रतिमा केवल पूज के ,एकलव्य  गंभीर
सुशील यादव ,दुर्ग

भारी जैसे हो गए,नये साल के पांव
खाली सा लगने लगा,यही अनमना गांव
सुशील यादव

ना राहत  की योजना ,ना विकास के पाँव
जिसको पूछे वो कहे ,छुआ तरक्की  गांव

सुख के पत्तल चांट के ,गया पुराना साल
दोना भर के आस दे , बदला लिया निकाल
 
कलेंडर सब उतार दो ,गया पुराना साल
नये साल की  स्वागते,रंग नई दीवाल
सुशील यादव


तेरे पास अकल नहीं ,ले ले ज़रा उधार

तुझसे रिश्ता यूँ लगे ,कोई कर्ज उधार
पीसा की जमीन खड़ी, झुकती सी मीनार

बीते साल यही  कसक,हुए रहे भयभीत
कोसो दूर हमसे रहे ,सपने औ मनमीत

नवा साल उतरे मुड़ी ,जाबे काखर गांव |
साधन तोर घटे हवे ,काला खात-बचांव ||

सुरतावत बनते  बने,अइसन पाछू साल
अतका खिलिस कमल इहां,गाले गाल गुलाल
सुशील यादव दुर्ग

हाइकू

नहीं नाप की टोपी
रंग भगवा नहीं
कैसे पहने योगी

समय अब चलता नहीं
रुकी है ये घड़ी
कबाड़ निकलता नही

आप  मेहमान जहां
बातों की आंधी
बस  तूफान वहां

अपनी कद काठी के
तलाशें आदमी
बिना सुई-लाठी के

आराम किसे बोलो
बाट तराजू ला
देखो, झटपट तौलो

२७ जून१८

धरती की डोली ,उठ नहीं सकती
आसमा हिंडोले झूल नहीं सकता
मेरा मन वैसे ही तुम्हे ,भूल नहीं सकता
सुशील यादव    २८ जून १८
विवाह के चालीसवे प्रवेश द्वार पर स्वागत


दानी पिता का ऋण
#
दधीचि
की तरह थे ,मेरे पिता !
हम भाइयों ने जब भी मांगा
अपने हिस्से की अस्थियां
वे चुपचाप
समय के अंतराल में
एक -एक कर
हम सब को  देते गए ,
भीतर से खोखला  होते तक
बाटते  रहे अपनी अस्थियां
हम भाइयों के बीच |
#
हमे, उन अस्थियों को धार कर
आता नहीं था
वज्र बनाने का हुनर
सीखे नहीं थे किसी गुरुदेव की पाठशाला में
हो के एकाग्रचित्त
रण कौशल की
बारीकियां
आता नहीं था किसी चक्रव्यूह का
भेदना-निकलना,
अभिमन्यु  से हम भी
अधूरी जानकारी के अभिशप्त थे, पिता !...
#
-हम आपकी दी हुई इन अस्थियों की आहुति
आपकी चिता को साक्षी मान आज
इस मुक्तिधाम में करने को  हैं
प्रतिबद्ध,तत्पर
हम जीवन के रण  में
स्वत: को मानते हैं
पराजित योद्धा
नहीं जानते अब ,
किस पवित्र गंगा किनारे
आपकी समाधि बनाएं
और ...
आपको अनन्त काल तक
ऋणी बन के पूजते रहें
उन अस्थियों के
ऐवज ....?
###
 सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर जोन १ स्ट्रीट ३
दुर्ग छत्तीसगढ़
9408807420
susyadav7@gmail.com

@@

अश्वस्थामा ...

मेरे अश्व सापेक्ष  हिनहिनाने पर
मुझे नाम मिला अश्वस्थामा |
-जन्म से मेरे माथे पर
थी एक मणि
-देव -दानव
शस्त्र -व्याधि
देवता नाग से हरदम
रहता था मैं निर्द्वन्द
निर्भय
#
मेरे पिता,
द्रोणाचार्य की
धनुर्विद्या की पाठ-शाला में
अर्जुन जैसे धनुर्धारी  का हुआ
ज्ञानार्जन |
मेरे पिता थे
राजकीय निष्ठा के प्रतीक
जिसने
कौरव-पांडव युद्ध में
लिया राज का पक्ष
और बने
कौरवों के तरफदार
सेनापति ...
#
-युद्ध भूमि पर
पिता के संहार ने
भीम पुत्र घटोत्कच.
घटोत्कच पुत्र अंजनपर्वा
द्रुपदकुमार . शालानिक , बयानीक
राजा जयास्व,श्रुताहू
और कुंती भोज के दस पुत्रों को
किया धराशायी ....
@
उसी युद्ध भूमि में
पिता को साथ देने का
अकल्पनीय सुख
और सौभाग्य पाने का
मैं भी रहा  साक्षी ....
#
हमे परोसी जा रही जीत को
देख पाने का साहस
पांडव-दल को लगाने लगा
अकल्पनीय और
क्षीण होने लगी उनकी
रण जीतने की लालसा ..
@
पांडव सेना को
तितर-बितर होते देख
श्री कृष्ण ने
युधिष्ठिर से
कूटनीति का सहारा लेने
को कहा ,
एक सूत्र वाक्य नियोजित हुआ
"अश्वस्थामा मारा गया, परन्तु हाथी"
इसमें 'परन्तु हाथी' शब्द  को धीमे स्वर में
बोले जाने पर दिया गया जोर...
एक अफवाह के तौर
फैल गया 'अश्वस्थामा मारा गया "
#
अश्वस्थामा के आत्मज
गुरु द्रोण ने
सुनी हुई अफवाह का
निराकरण करना चाहा
धर्मराज युधिषिठर से
सत्यापित करने की गरज से पूछा
तब , वही संवाद को
वैसे ही व्यक्त किया
-'अश्वस्थामा मारा गया '
"परन्तु हाथी"
शब्द'परन्तु हाथी ' को
युद्ध की  शंख ध्वनि की भेट
चढा दिए जाने का
षड्यन्त्र
कर गया अपना काम

@@
पुत्र-मृत्यु शोक से ग्रस्त
द्रोण
शस्त्र त्याग कर
शोक मुद्रा में बैठ गए
निशब्द ,निष्चेष्ट ,तभी
द्रोपदी के भाई धृष्टधुम्न ने
काट दिया उनका गला
एक शक्तिशाली सेनापति
युद्ध-भूमि में हो गया
शांत ...
दूसरी तरफ
मल्लयुद्ध में भीम ने
चीर दी
दुर्योधन की जांघ।।।
#
एक साथ दो योद्धाओं की शिकस्त
दो आत्मीय का विछोह
दो ध्रुवो का अस्त
कर गया सर से पाँव तक
अश्वस्थामा को अस्त-व्यस्त
#
पांडव के रुख में
जीत की  ध्वनि
गूँजते हुए  आकाश से
पिघले हुए शीशे की तरह
उतरने लगे
पिता की ह्त्या और
अपने राजा की अकाल दशा ने
बना दिया अश्वस्थामा को अधीर
@
उनके आहत ह्रदय में उठे
सवालो का उत्तर  है कहाँ ?
आघात न सह  सकने वाला मन
एकाएक कैसे हो जा है विक्षिप्त
द्रोणपुत्र के अलावा कोई जान पायेगा ?
@
"मेरे क्रोध की ज्वाला
बुझा सकोगे कृष्ण ...?"
@
मेरे पिता की ह्त्या की साजिश के
तुम  थे सृजनकर्ता
नीति के निर्धारण में
तुम नहीं थे क्या अग्रणी ...
क्या तुमने गजराज के मरने वाले
सूत्र वाक्य को
उस मुह से नहीं बुलवाया था
जिनसे सत्य  के सिवा और कुछ
सीखा नहीं था बोलना
धर्म के विरुद्ध किसी राह का
जो अनुशरण कर्ता
अनुगामी नहीं था जो
##
ठीक भटकाव के
इसी जगह पर,
क्रोध की आग में
उठा लिया उसने
'नारायण- अस्त्र'
और ठान लिया
मारना
जन्मे -अजन्मे
पांडव  के 'कुल-कारको'  को
इस नराधम शौर्य प्रदर्शन पर
सभी योद्धाओं ने
डाल दिए अपने हथियार
द्रोपदी के पाँच पुत्र और भाई
धृष्टधुम्न को उतार दिया
मौत के घाट..
एक विकराल सनाटा
पसर गया चारो ओर
##
द्रोपदी विलाप सुन
उसी सन्नाटे में
अर्जुन की एक प्रतिज्ञा गूंजी
किसी भी सूरत
अश्वस्थामा का
काटना है सर
#
इस प्रतिज्ञा को सुन कर
भागा अश्वस्थामा ,
श्रीकृष्ण सारथि बन
अर्जुन गांडीव धरे
पीछा करते रहे....
-कहीं आश्रय मिलाता न देख
चला दिया, अश्वस्थामा ने ब्रम्हास्त्र
जिसे चलाने की,
विधा भर थी उसे मालुम
लौटाना ब्रम्हास्त्र का
आता नहीं था उसे,
इस ब्रम्हास्त्र से बचने का
अर्जुन और उसके सारथी के सामने
न था कोई उपाय
फिर सारथि- मन्त्रणा से प्रेरित हुआ अर्जुन
प्रत्युत्तर
छोड़ना पड़ा उसे भी
बचाव में ब्रम्हास्त्र ,,,
अग्नि, दावानल, कोहराम
हाहाकार मच गया तब चारों ओर
जनता होने लगी दग्ध ,
गनीमत अर्जुन को
आती थी विद्या
ब्रम्हास्त्र को  लौटाने की
सो लौटा लिया |और ..
बच गए लाखो निरीह ...
तत्पर,बांधा ,
धर दबोचा अश्वस्थामा को
बंधे हुए दीन अश्वस्थामा को
देख कृष्ण ने कहा
हे  अर्जुन,
यूँ तो
धर्मात्मा ,सोये हुए
असावधान
मतवाले ,पागल, अज्ञानी , रथहीन
स्त्री तथा बालक को मारना
धर्म के अनुसार है वर्जित ...
परन्तु इसने धर्म के विरुद्ध
किया है आचरण
इसने सोये हुए निरपराध बालको की
की है ह्त्या .
यदि रहेगा तब भी जीवित
फिर दुहरायेगा कलंक-गाथा
तुम करो अपनी प्रतिज्ञा पूरी
ले जाओ द्रोपदी समक्ष कटा सर
इस युद्ध -द्रोही का |
#
अर्जुन को गुरुपुत्र पर प्रहार करने में
आई दया
उसने जीवित अश्वस्थामा को कर दिया
द्रोपदी सम्मुख
#
पशु सदृश बंधा मानव देख
द्रोपदी विवश हो गई
करुणा  आगे
गुरुपुत्र!
उस पर ब्राम्हण
फिर उसकी ह्त्या का पाप ...?
बाँध दिए इन तर्कों ने
हथियार उठाने को उकसाने  वाले हाथ
इनकी माता कृपी को मैं,
दे न सकूँगी कोई जवाब ..
वो मां जिसने
पुत्र मोह के चलते
नकार दिया सती होना ,,,
फिर यह भी तो,
मेरे मरे पुत्र
इनके वध से
लौटाए नहीं जा सकते ...?
कई बार
बुरे अपमान से आहात नेत्री
फिर एक बार भटक  गई
दुविधाओं के जंगल में..
#
... किन्तु भीम नहीं हुआ शांत,
आक्रामक थे उनके तेवर ...

-मध्यस्थ कृष्ण ने  दिया सुझाव
वैसे अपराधी  नहीं होता क्षम्य
दंड का वो भागी हो जरूर
रही बात ,
पतित ब्राम्हण को ,दंड देना है पाप
तो आतताई को मुक्त करना भी, है पाप
अर्जुन तुम वो करो जो है उचित,
अर्जुन ने काटे,
अश्वस्थामा के सर के बाल
फिर निकाल ली मस्तक की मणि
वो मस्तक मणि जिसकी औरा में था
गजब का तेज ...
मणिहीन मस्तक और केश विहीन सर ने
कर दिया उसे श्रीहीन ...
इतना लज्जित नहीं हुआ था कभी
अश्वस्थामा ....|
अश्वस्थामा आज
भी  कहते
हैं जीवित
श्रीकृष्ण के श्राप से
है वह  कुष्ठ रोग से ग्रस्त
अपने पापो के पीप-लहुँ को
रिसते हुए देखने को
आजीवन अभिशप्त
###

 सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर जोन १ स्ट्रीट ३
दुर्ग छत्तीसगढ़
9408807420
susyadav7@gmail.com


पत्नी का अविष्वास प्रताव

पत्नी का अविश्वास प्रस्ताव

ऐ जी आप पहले जैसे नहीं रह गए ...!
एक वाक्य में पत्नी ने अविशास प्रस्ताव प्रस्तुत कर दिया |
हम सरकार के गिरने की उम्मीद लगा बैठे |
पगली तुम्हे आज चालीस साल बाद ये महसूस क्यों हुआ ..?
देखो हमने विकास के कितने सारे काम किये हैं |तुमने सब चूल्हे में झोक दिया ...?
बताओ क्या कमी देखती हो अपने सरकार में
फिर हम भी अपनी सरकार की सुनाएंगे तो, समझो चलती गाड़ी का पहिया बिलकुल रुक जाएगा |
मेरी चेतावनी पर ध्यान वो अक्सर नहीं देती ,इस बार भी वो इसे इग्नोर कर जाती ,मगर हम जज्बाती होकर ज़रा तल्खी में बोल गए थे लिहाजा मामले ने दाम्पत्य जीवन के शांति भंग की सीमा लांघ ली थी | वह कुछ नरम पड़ी |
हम जानते थे कि दिलासा का ज़रा सा भी हाथ फेरा तो,वह सुबक पड़ेगी ....!
नार्मल करने के अंदाज में पूछा ,देखो तुम्हारा बैल जैसा पति आफिस से सीधे घर आता है | अद्धी-पौव्वा का औरों की तरह चक्कर नहीं पालता | ढेरो बालाएं-बलाएं  आफिस से घर के बीच टकराती घूमती  हैं उनसे बच के निकला रहता है ,फिर बताओ, ये क्या बात हुई "आप पहले जैसे नहीं रह गए ".... ?
चलो पहले वाली खूबियां गिनवा दो ,खामिया बाद में सुन कर देखेंगे क्या बात है ?आज शादी के चालीस साल बाद तुमने विपक्ष की तरह लंबा मुह खोला है |
जब हनीमून में गए थे तब आप कैसे आगे आगे हर काम किये रहते थे | स्टेशन से बेग लादना ,हर रेस्टोरेंट में आर्डर देने के पहले बाकायदा पसन्द का पूछना ,हर शापिंग माल में बिना ऐतराज के मेरी ली हुई चीजो का तारीफ करना ,उस पर ये कहना वेणु तुम्हारी पसन्द लाजवाब है | मैं विभोर हो जाती थी | तुम ये भी कहते तुम्हार टेस्ट अच्छा है वेणु
इस चक्कर में शायद मैं भी पसन्द आ गया ना ?
सभी मर्द  शादी की शुरुआत यूँ ही करते हैं क्या ....?
मैंने कहा वेणु ,अरसा पहले कहीं पढ़ा था ,जब आदमी नई कर लेता है और बीबी बैठने को आती है तो पति दरवाजा खुद खोलता है | इसे देखकर लोग दो अनुमान लगाते हैं, या तो कार नई है या शायद बीबी ....,मेरे इस जोक की पालिश उसको कुछ उतरी हुई लगी |
वह तर्क के दूसरे सिरे को पकड़ने को हुई ,जनाब ! शादी के शुरूआती दिनों में आपकी हालत अपने स्टेट जैसी जर्जर थी ,न सलीके का पहनना आता था न कोई खाने-पीने की टेस्ट थी | मैं सिर्फ खाने की कह रही हूँ ,पीने की शुरूआती टेस्ट तो आपने, दोस्तों की संगत में आजमाना चालु कर दिया था |
-मैं आपकी  डेंटिंग-पेंटिंग क्लास सख्ती से न लेती तो आप ढोलक माफिक फूल गए होते ....?
उलाहना दर उलाहना मुझे झुकाने, नीचे पटकने का यह अर्धवार्षिक कायर्क्रम पिछले कुछ दिनों से तिमाही के स्तर पर सेंसेक्स की भाँती लुढ़क गया है |
मुझे  अपनी टी आर पी सुधारर्ने का नुस्खा तब हासिल होता है, जब कोई धांसू चीज लिख के उम्दा मैगजीन में छपवा लूँ |
-मैं  फक्र से उन्हें दिखा कर कहता, ये छपी है देख लो| इस प्र्दशन नुमाइश में वह आर्थिक पहलू पर नजर रखती है ,इस छपे पर कितना मिलेगा ...? मैं कहता, वे आजकल कुछ देते-वेते नहीं | उलटे ईमेल से भेजो तो नखरे दिखाते हैं ,हम ईमेल की रचना स्वीकार नहीं करते | भाई लोग हार्ड कॉपी माँगते हैं | चार रचनाओं के स्पीड पोस्ट में भेजते,किसी गरीब लेखक का क्या होता होगा पता नहीं ..?

मैं देखती हूँ ,जब भी अपने गुस्से का व्यावहारिक इजहार करती हूँ तो आप अपनी साहित्य-यात्रा में निकल पड़ते हैं या इसे  बीच में ढल बना खड़े हो जाते हैं | साहित्यक भाव  हम्मे भी मौजूद हैं मगर आपके चूल्हे-चकले के झंझट में वहीँ रोटी माफिक गोल हो जाते हैं | हाँ तो मैं कह रही थी ,"आप आजकल बदल गए है",
-मैंने बात को फिर मरोड़ा , हाँ साठ साल की उम्र बदलने की ही होती है |
रिटायरमेंट के फकत छह महीनों में ये हाल है,हमे घर बैठे देख ऊब जाने का , तो आगे अल्ला जाने क्या होगा ,मौला जाने क्या होगा ?
-देखो घर में दिन भर, कोट-टाई में, हिंदुस्तान का कोई भी माई का लाल नहीं रहता |
देशी स्टाइल, यानी लुंगी -पाजामा कुरता ,बनियान यही लपेटे रहता है |
हमसे ज़रा नीचे लेबल बाले लोग तो धारीदार चड्डियों में ही पाए जाते हैं |
अब इसे बदलना कहते हैं तो बेशक हम बदल गए हैं |
-वह बेकार की बातों पर कान धरने की फुरसत नहीं पा रही थी |
उसने झल्लाते हुए अंतिम हथियार की सौगात ब्रम्हास्त्र के रूप में दी ,गुस्से में पूछी ,
आज तारीख क्या है ,मैंने सहजता से कहा छह अगस्त .....? कल ही तो बैंक  से विथ-ड्रावल करके घर खर्चे वाली रकम दी थी की नहीं ,मैंने याददास्त पर जोर देकर बताया |
-उधर से  दांत पीसने की प्रतिक्रिया नजर आई ..... बस छह अगस्त .....
फिर कल .....?
मैंने उसी सहजता से फिर कहा एक दिन पहले तो पाँच अगस्त हुआ न ..न..न ..?
पांच अगस्त याद करते ही  मेरी जीभ लड़खड़ा गई .....!
- सारी वेणु डार्लिंग मुझे तुम्हारा बर्थडे परसों तक बामुक़म्मल याद था मैंने आराधना ज्वेलर्स को एक तारीख को बाकायदा आर्डर दिया है नए डिजाइन के नेकलेस का| ये वही नेकलेस है जिसे तुम हसरत से रिटायरमेंट के पहले उस ज्वेलर्स की शाप में देख रही  थी| मैंने खुद से  वादा किया था रिटायरमेंट के बाद की पहली   बर्थडे पर इस बार वो तोहफा तुम्हे दूंगा |
उसके मुरझाये चहरे पर तनिक विश्वास लौटा |
वह मेरे चरण छूने को झुकी मैंने बाहों मे थाम लिया |
मैंने उससे कहा, हर बर्थडे पर तुम पैर छूती थी कल क्या हुआ जो ....?
अगर छू लेती तो मुझे याद नहीं आ जाता क्या ....?
-मैं ये देखना चाहती थी मेरे भुल्लकड़ राम क्या-क्या भूल सकते हैं .....?मैंने मौन व्रत ले रखा था अपनी तरफ से ...कई बहाने किये आपको याद आ जाए,मगर आप अब अलग दुनिया में खोये रहते हैं |
चलो ज्वेलर्स के पास चलें वरना .....?
मैंने चलने की तैयारी करते पूछ लिया ,बच्चो ने विश किया ....?
-वह फिर उदासी की लंम्बी गुफा में समाने आ गई,उच्छवास के साथ बोली ,
'आजकल सब अपनी लाइफ जीते हैं .... पता नहीं उन्हें याद भी हो या नहीं ...?'
हो सकता है , उधर की तारीख एक दिन बाद आती है, शायद आज कोई याद कर ले ...?
मैंने कहा कोई बात नहीं , छोडो , मेरी तरह भूल जाओ उनको ,
-तुम अपनी मर्जी की आज पूरी शापिंग कर लो ....मैंने ऐ. टी. एम, कार्ड को चेक कर वालेट में रखा ...... बाहर ही खाकर लौटेंगे |
वह निशब्द साथ हो ली ....|
मुझे लगा ...
अविश्वास प्रस्ताव ने आखिर दम तोड़ दिया |

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर
जोन १ स्ट्रीट ३ दुर्ग छत्तीसगढ़






Wednesday, 20 June 2018

.एक एकलव्य
##
अँधेरे में मैं अब भी
तीर चला लेता हूँ
और सही मानो तो सही
निशाना लगा लेता हूँ |
तुम्हे जरूरत होगी
या तो मेरे अंगूठे की या
पूरा हाथ मांग लोगे ..?
***
तुम नहीं थे मेरे आदर्श
नहीं झुकाया था सर तुम्हारे आगे
तुमने नहीं दी थी मुझे दिशाएँ
तुम्हारी उंगली थाम के भी एक पग
चला नहीं था मैं...
नहीं किया था अनुशरण
तुम्हारे किसी दिकबोध का
तुम्हारे पग चिन्हों को ढूढते
नहीं गया था दूर अरण्य, दलदल  में
पता नहीं क्यों
बावजूद इसके
तुम्हे लगता रहा
मेरी उपलब्धियों में कहीं न कहीं हो तुम
केवल तुम
**
अपनी इस सोच के दायरे से
जरा भी नहीं डिगते तुम
साधिकार
आ जाते हो
सुबह -शाम  दरवाजे पर
इस तगादे में कि,
तुम्हे काट कर दे दूंगा
मैं
अपना अंगूठा
**
मेरे पिता ,
तुम्हे मालुम है आदमी जब
भूख की
अहम् की
अस्तित्व की
लड़ाई में
जब होता है
उसके सामने बौने हो जाते हैं
सभी किरदार
वे खुद लिख लेता है
अपने भोगे
यथार्थ का इतिहास
उसे याद हो आये
पुराने लनम की कोई बात
खून से लथपथ अंगूठा
अंगूठे के बीच
प्रत्यंचा में अब -तब छूटने को
तीर की नोक पर उसकी
अपनी आजीविका ...
***
सुशील यादव


२. ये वो सुबह तो नहीं ,
**
ये वो सुबह तो नहीं ,
जिसकी बांग
किसी मुर्गे ने दी हो
और
जाग गया हो
सोते से
सारा गाँव ..
वो सुबह ,कि
घण्टियाँ बजाते
चल रहे हो बैल
किसी खेत की पगडंडियों पर
और हुर्र की आवाज से चौंक कर
उड़ गई हो चहचहाट करती चिड़ियाएं
वही मस्जिद की किसी मीनार पर जा बैठते
बरबस गूंज गई हो अजान
वो सुबह जब
शब्द -कीर्तन की आवाज संग उठने को
आतुर हुई हो
सूरज की पहली आभा वाली किरणे
या जाड़े में ठिठुरते
रामायण की चौपाई बांचता
बगल से गुजर गया हो
कोई पण्डित
ये सुबह वो तो नहीं
जब
अलगू और जुम्मन
एक ही छाते में
कुछ भीगते, कुछ भागते
पड़ौस के गाँव से
बुला लाये हो डाक्टर
और बचा ली हो
प्रसव वेदना से कराहती किसी
गऊ माता की जान
ये वो सुबह भी नहीं
जब
झुर्रियों भरे चरहरों से
पर्दा करती
चुपचाप निहरे
पानी भरने
निकल रही हो औरतें
या पीछे ,नँगे-अधनंगे बच्चे
रात की बासी रोटियां लिए
माँ की घुड़कियों सुन
खपरैल के घरों को लौट रहे हो
***
शायद गाँवों में
इन दिनों भी
ऐसी सुबह हुआ करती हो
अम्न,चैन ,भाई चारे की
पर रोना तो ये है
मेरी नींद
इन दिनों
देर से खुलती है
***
सुशील यादव


२१22 २१२२   २१२
अब यहां ना आशियाँ परिंदा बचा
धूल के  साये बचे,या धुँआ बचा

ले गया छीन कर बस्ती से अमन
आंसुओ खारा-सफेद कुँआ बचा

कौन वाकिफ है भली  सूरत यहाँ
किसके पास कहो  आइना बचा

है अदावत की खड़ी दीवार बस
आखिरी पहचान मानो निशा बचा

बीते कल को तुम भुला बैठे कैसे
स्लेट-माजी खूब सारा लिखा बचा



२ २ १ २   २ २ १ २  २1२
वो कुछ दिनों से ....
वो कुछ दिनों से इधर नहीं बोलता
मुझे चाहता है मगर नहीं बोलता

खोया रहे अपनी धुनों में मगन
उसपे नशा कोई जहर नहीं बोलता

शायद चली तलवार किसी बात पर
अपना कभी ख़ंजर नहीं बोलता

कितनी कवायद की तुझे भूलने
हमसे हमारा जिगर नहीं बोलता

तेरी  महक रहती है फूलो यहाँ
यूँ खिल के तो इतर नहीं बोलता

कुछ समझ में आने लगी बात फिर
तुमसे भले बेहतर नहीं बोलता
सुशील यादव


12२ 12२   12२ 12२
कहीं चोट  खाए सवालो घिरे हैं
बंधे हम  मुस्काए सवालो घिरे हैं

जनाजा किसी गैर का और शामिल
रहे मुह  छिपाए सवालो घिरे हैं

नहीं बात बनती दिखे तो समझिये
बुद्दू लौट  आए सवालो घिरे हैं

जिसे नींद में चलने की आदत नहीं
तजुर्बे भुनाए, सवालो घिरे हैं

जनाजे को उनके कंधा क्या दिये हम
रहे  सर चढ़ाए ,सवालो घिरे हैं

नहीं जानता  था सबूतों में शामिल
दस्ताने छुपाए ,सवालो घिरे हैं
सुशील यादव
२. ४. १८
12२ 12२   12२ 12२
कहीं चोट  खाए हैं मेरी तरह वो
बंधे हाथ  मुस्काय हैं मेरी तरह वो

  जनाजा किसी गैर का और शामिल
  रहे मुह  छिपाए हैं मेरी तरह वो

नहीं बात बनती दिखे तो समझिये
बुद्दू लौट  आए हैं मेरी तरह वो


जिसे नींद में चलने की आदत यहाँ
तजुर्बे भुनाए हैं  मेरी तरह वो

@@
जनाजे को उनके कंधा क्या दिये हम
बेजा  सर लगे  खाये हैं  मेरी तरह वो




1222  1222 २१2

नफरतो के घने जंगल
 मुहब्बत या  जंग बराबर सा लगा
 पड़ौसी फिर  मुझे रहबर सा लगा

यकीन के बाजुओं सर पटका किए
अचानक वो कड़ा पत्थर सा लगा

लकीर जिसे नसीब कहे आदमी
कहीं वो  बेसबब अजगर सा लगा

नफरतो के घने जंगल क्या घिरे
दुआ भी पलट ढाई अक्षर सा लगा

हमेशा सावधानी की सोचिये
भले ही सांप मोम-रबर सा लगा
सुशील यादव
21.7.17


२१22  2१22    2१22
सच कहो तो आजकल दर-ब-दर हैं हम
दस्त बस्ता  शहर में बे-हुनर हैं हम

नोचता है  चेहरा मासूम कोई
अब किसे बतलाय कितने निडर है हम

ये अमानत सौप जानो- जिस्म देकर
ढूढने को निकले क्या-क्या  गुहर हैं हम

हम कहानी किस्से की बुनियाद हो गए
सोचते हैं खलवतों  जादुगर हैं हम

खबर ये   वादा खिलाफी की उड़ा दे
जग ने जाना सच,चलो बे फिकर हैं हम

पुल बना कर आप चलना चाहते हो
ये हकीकत जान लो  पुरखतर हैं हम

अब न रूठती है अनारकली यहां पर
नए जमाने खैरख्वाह  अकबर हैं हम


घनाक्षरी गजल // दिल चीर के दिखाऊं

सिरफिरा सा अजीब ,मै सपना लिए रहा
अंधों के शहर ख़ास, आइना लिए रहा

तमाम उम्र मुझे ,मंजिलें ढूढती रही
मै कातिलों के घर पे ,बसेरा लिए रहा

वो छुप के अब वार, करने लगे मुझपे
जिनके सामने कभी, तमंचा लिए रहा

गांधी की शक्ल यहाँ ,कोई आए तो आदमी
दिल चीर के दिखाऊ ,अहिसा लिए रहा

अब नहीं होती किसी, फूल इतनी महक
दबा के किताबों में जो, तनहा लिए रहा

/// सुशील यादव


@@


करोड़ बारह  सौ फूंके हैं ,बांटे मोबाइल सरकार
गंवार-अपढ़  जनता होवे,मोबाइल की क्या दरकार

जिन गावो में भूखा प्यासा,खेती करता दिखे किसान
मोबाइल उन हाथो देकर,तुम समझो खुद धन्य महान

नक्सलवादी वहीँ जमे हैं ,ले पैसा इस नाम अकूत
रोजाना ताबूत भेजे जाते ,भारत वीर जवान सपूत

किस मिटटी के तुम हो माधो ,ह्रदय तुम्हारा हाय कठोर
विपदा- संकट  रखते साथी  ,नेता- अफसर चिन्दी चोर

कौन  योजना के बलबूते ,होगी अब की नैय्या पार
जनता और भरम में डालो ,कर लो फिर से छल व्यापार

विकास मुद्दे चुनाव गायब , कहो  राज के तारणहार
मोबाइल दे के लूट रहे , सरकारी संचित भंडार

पढ़ने वाले बच्चो को देकर ,करते यहां गहन अपराध
भटकाने-दौड़ाने  पथ में ,छोड़ दिए हो क्रोधित बाघ

जनमत को अब मत भटकाओ,देना होगा सभी हिसाब
बन्द करो ये दारू खाने, मुफ्त बांट चुनावी शराब

सुशील यादव दुर्ग
१ जून १८


वज़्न---1222---1222---1222-1222

गली तेरे करम.की ..

मैं तुझसे मिलने का कोई बहाना ढूढ़  लेता हूँ
घने-जंगल, गड़ा-भूला, खजाना ढूढ़ लेता हूँ

गली तेरे करम की,दूर तक है अधबनी चाहे
नसीबो में लिखा अपना ,जमाना ढूढ़ लेता हूँ

न भाये है,जिसे तारीफ के पुल से गुजरना भी
उसी लम्हा झुका दूँ सर ,बहाना ढूढ़ लेता हूँ

मेरे नजदीक आके दूर मालिक था अगरा जाना
हकीकत सा ख्यालो में ,फसाना ढूढ़ लेता हूँ

जिगर में ,बात की तल्खी, लिये जीना 'सुशील'आया
तभी चुपचाप हटने का ,ठिकाना  ढूढ़ लेता हूँ

सुशील यादव दुर्ग

@@


चौपाई :बरसात में ....

पानी-पानी, आया पानी |  गर्मी दूर भगाया पानी ||
सबने खूब निकाले छाते | रंग-बिरंगे, काले छाते ||

सुख की गिनती कौन करेगा, अब जो भीतर भीग डरेगा |
यूँ ना देखी  होगी बारिश , सहमी-विनती और गुजारिश |

लो कृषको का मन हर्षाया, मेघ-घटा, उमड़- घुमड़ आया |
हल लेकर ये  खेतों निकले ,मिटटी कोना- सोना पिघले |

हो जाती हर शाम-सुहानी, देखो छेड़ अतीत कहानी |
बचपन की नावों का मिटना ,भीगे-भीगे  आकर  पिटना |

बारिश पानी बहता जाता ,सूखा -नाला भी  उफनाता |
किन्तु हमी-हम  ठहरे होते ,नम रिश्ते भी गहरे होते |

सुशील यादव दुर्ग


पिता  की अस्थियां ....
@@
पिता ,
बस दो दिन पहले
आपकी चिता का
अग्नि-संस्कार कर
लौटा था घर ....
माँ की नजर में
खुद अपराधी होने का दंश
सालता रहा ...
पैने रस्म-रिवाजों का
आघात
जगह जगह ,बार बार
सम्हालता रहा ....
@@
आपके बनाए   दबदबे
रुतबा,गौरव ,गर्व
अहंकार का साम्राज्य ,
होते देखा छिन्न-भिन्न,
मायूसी से भरे  देखे
पिछले कुछ दिन...
खिंचे-खिंचे से,
चन्द माह ,
दबे-दबे से
साल
-गुजार दी
आपने
बिना किसी शिकवा
बिना शिकायत  चेतना शून्य
वजूद के साथ
जीवन  का अहम एक हिस्सा
दबी इच्छाओं की परछाइयां आपने
न जाने किन अँधेरों  के
हवाले कर दी
चुपचाप
@@
मुझे एक  खुशबु
पिता की
पहले छुआ करती थी दूर से
विलोपित हो गई अचानक
न जाने कहाँ ...?
न जाने क्यों मुझसे आप
अचानक रहने लगे खिन्न
>>>
आज इस मुक्तिधाम में
मैं अपने अहं के 'दास्तानों' को
उतार कर
चाहता हूँ
तुम्हे छूना ...!
तुम्हारी अस्थियों में,
तलाश कर रहा हूँ
अतीत की उन उंगलियों को,
जो मेरे हाथ को
किसी भी कोण से
गिरते वक्त पकड़ लेते थे
आज आप की वही उँगलियाँ ,
हैं मेरे वही हाथ ,मगर दोनों
अपनी जगह
छिन्न-भिन्न ,छितराये हुए
नियति के इस कठोर -क्रूर क्षणों में
टटोलने का खुद को
करता हूँ प्रयास ...
पाना चाहता हूँ एक बार ...
फिर वही स्पर्श ,
वो आप कि ,
जिसने मुझे उचाईयों तक पहुचाने में
अपनी ताकत
समूचे में झोकने से नहीं चुके थे किसी बार
>>>
मेरा बस चले तो
सहेज कर रख लूँ तमाम
उँगलियों के पोर-पोर
हथेली ,समूची बांह
कंधा ...आपके   कदम ...
जिसने मुझमें  साहस का
'दम'जी खोल के भरा
>>>
पिता
जाने-अनजाने
आपको इस ठौर तक
अकाल ,
नियत- समय से पहले
ले आने का
अपराध-बोध
मेरे
दिमाग की कमजोर नसें
हरदम महसूस करती रहेगी

सुशील यादव
21.5.17

  की अस्थियां ..२..

इन हाथों से पिता मैंने
दी थी चिता को आग
बस दो दिन पहले ...
आज राख में बटोरने आया हूँ
बची हुई बेबस अस्थियां
>>>
अहंकार का एक बनाया हुआ
साम्राज्य ,
होते देखा छिन्न-भिन्न
पिछले कुछ दिनों से
तुम्हारी परछाइयों से
जो खुशबु मुझे पहले छुआ करती थी
विलोपित हो गई अचानक
न जाने कहाँ ...?
न जाने क्यों मुझसे अचानक रहने लगे खिन्न
>>>
मैं अपने अहम् के दास्तानों को
अब उतार कर
फिर से चाहता हूँ
तुम्हे छूना ...
तुम्हारी उन उंगलियों को
टटोलने का भ्रम
पाना चाहता हूँ एक बार ...
जिसने मुझे उचाईयों तक पहुचाने में
अपनी ताकत
समूचे में झोकने से नहीं चुके थे किसी बार
>>>
मेरा बस चले तो
राख में बिखरी अस्थियों से
सहेज कर रख लूँ तमाम
उँगलियों के पोर-पोर
हथेली ,समूची बांह
कंधा ...
आपके कदम ...
>>>
दिल न जाने आपका
जल कर कहाँ विलीन हुआ है
दिमाग की कमजोर नसें
तमाम अग्नि दग्ध लोपित हैं
केवल प्राणायाम की मुद्रा में
सर की कुछ अस्थियां
अब भी मुझे गौर से देख रही हैं
मेरे पिता ....
मुझे मेरी गलतियों के साथ अब भी स्वीकार कर लो
मैं गंगा में तुम्हे बहा कर
केवल खुद पाप मुक्त
नहीं होना चाहता
 @@@
 ....

जाने किन पैरों पर
खड़ा रहता है
आसमान
दिन रात
बिना थके हुए ....?
मेरे
तुम्हारे
शब्दों को अब
बैसाखी की
जरूरत
महसूस होती है ...
हम आहत-
अपाहिज मन से
बोलते हैं या
सहानुभूतियों की किताब
उस जगह से खोलते हैं
जहां पृष्ठ भर
हाशिये के सिवा
होता नहीं कुछ
#
हम सिद्धार्थ की तरह
खोजने
निकल पड़ते हैं
यथार्थ ...
मगर हमारा
'यक्ष -प्रश्न'

हमे
घेरता है
बरबस

हम आकाश की बैसाखी
उसके पांव
उसकी जमीन को
तलाशने में जुट जाते  हैं,
न जाने किन पैरों पर खड़ा रहता है
आसमान ...?
#
काश ,
हमे पहले
बता दिया गया होता
आसमान कुछ नहीं
एक हवा है
धुँआ है
शून्य  है
और
हवा को
धुँआ को
शून्य  को
बैसाखी की जरूरत नहीं होती
वह अपने
शास्वत वजूद पर
स्वयं चलता है
दिन -रात बिना थके हुए
#
काश हमारे शब्द
यूँ ही
हवा की तरह
धुँआ की तरह
शून्य की तरह
बिना पैरों
चलते
तैरते
अनवरत
लगातार
संप्रेषित होते
बिना किसी बैसाखी के

सुशील यादव दुर्ग



लोग कहते अब.....

अब यहां ना आशियाँ- परिंदा बचा
यार बारूद का धुँआ बस धुँआ बचा

ले गया फिर  छीन बस्ती कोई अमन
डबडबायी आँख आँगन कुँआ बचा

कौन सूरत  आप  पहचानता यहाँ
पास किसके आजकल  आइना बचा

वो सभी पल याद हमको  करीब से
वो जहां बस  आदमी  झुनझुना बचा

हाँ मुझे भी लौटना है 'सुशील' पास
लोग कहते अब वहीँ मन 'घना' बचा

सुशील यादव दुर्ग
2122   2122  1212

20.6.18

' जो भूला ....

दिल रखने को तुझे दिया क्या है
तू ही बता कि फ़ायदा क्या है

यारा बुझा दिया चिरागो को
जलता हुआ यहाँ बचा क्या है

मुहताज हैं खुदा यहाँ हम भी
ये मुफलिसी सिवा मिला क्या है

अब तिलस्मी लगी हमे दुनिया
देखे ये  फैलता नशा क्या है

चारो तरफ है भीड़ का उन्माद
नारो के बीच निकलना क्या है

मजबूरियों 'सुशील' जो भूला
अब तो बता सही पता क्या है

सुशील यादव दुर्ग


खोज लिया जिसने .....

जब दुश्मन जाने पहचाने हैं
यारो हम भी बहुत सयाने हैं

लेकर अपनी बस राम-कहानी
समझौतों के सहज निशाने हैं

मुस्कान मिली तो जीवन छलका
यूँ गम के सौ-सौ अफसाने हैं

जग को दे न सके अपना परिचय
कहने के कई लाख बहाने हैं

किसने हमको कब तौला-परखा
हम बीते इतिहास पुराने हैं

खोज लिया जिसने दिल को भीतर
पाए असल 'सुशील' खजाने हैं

सुशील यादव
14.7.17
गलत राय गलत मशवरा देने वाले
मुंसिफी की आड़ फतवा देने वाले
बिजलियाँ सौ -सौ गिरे तेरे घरों में
ओ जन्नते काश्मीर जला देने वाले
सुशील यादव

दहशत ,दीवारें और  अदावत केवल
सीख लिए होते काश  बगावत केवल
माथा सहजादों का है  झुकते देखा
जिनका  मकसद होता मोहब्बत केवल
##

2212 2212 1222 2
अहसास ....!

है कौन,जो तन्हाई को सदा देता है
मुझको कभी,बन के सबा हिला देता है

मैं सुनने का आदी नहीं,मगर कानो में
सुर-ताल-नगमा सा कहीं,सुना देता है

हिलती रही दीवार पर,तेरी परछाई
अहसास, अक्स कई तरह,बना देता है

जिस राह पर होती रही मुलाकाते,आज
उस रास्ते पहरा कोई बिठा देता है

गुमनाम से अँधेरे हम निकल भी आये
हालात जीना, हाल हर सिखा देता है

अंजान सा बैठा छिपा हुआ नासूर अब
खुद हरकतों अपनी कभी डरा देता है

मत सोचना, मेरे कदम के नक्शो चलना
जंगल करीब यकबयक पहुचा देता है

है तलब हमको तेरी किया क्या जाए
ये नाव गलत सुराख ही डुबा देता है

मजबूरियां है या समय फरेबी जाने
दीवार साझा बीच में उठा देता है

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग
10.7.17

वीरांगना रानी लक्ष्मी बाई के  बलिदान दिवस १८जून पर
##

तुम रक्षक हो सीमा-प्रहरी ,पथ में आगे बढे चलो
पहाड़ दुर्गम  को लाघों,दुरूह घाटी चढ़े चलो
मानवता के तूल तुम्ही  ,मिट्टी के हो कारीगर
बिन मन्दिर पूजे जावो ,मूरत वो भी  गढ़े चलो
#
एक दिया तम में रखना ,एक जले  आंधी  आगे
हो अडिग विश्वास तुम्हारा ,सर-पैर ले दुश्मन भागे
सीमा से जब वापस आओ ,माँ के लाल बहन-वीरा
हर  सुहागन दृग देखना , कैसे सोये दिन जागे
#
शांति जिसने जकड़ लिया, 'पर' अहिंसा के हैं काटे
मक्कारी  चादर ओढ़े ,परचम जिहाद के  बांटे
मजहब के चण्डालों का,मखौल क्यों नहीं  उड़ाये ,
इनकी मकसद के जड़ को,क्यों न अभी कतरें- छांटे
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लक्ष्मी-बाई सा साहस ,अपने भीतर आप भरो
जीवन शब्दकोश निकालो ,कायरता से काश डरो
लोहा लेने की बारी , कतार पीछे  क्या रहना
जन-जन में चिश्वास जगे ,आपतकाल   तुझे    लड़ना
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मर्दानों की शक्ति लेकर , एक रानी  रण में आई
उम्र की कोमल काया थी ,उतरी न थी  तरुणाई
अंग्रेजो को रण में तब ,कैसे  खूब छकाती थी
वो थी  रानी झाँसी या ,संदेश भरी  पाती थी
सुशील यादव
16.6.18

२*८ दुनिया रंग-बिरंगी

दुनिया रंग-बिरंगी देखो
फिर से चाल फिरंगी देखो
हम हैं अपने सूबे में खुश
बारा- मासी तंगी देखो
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आज यही केवल सच्चाई
है भाई का नाम कसाई
हम ख़र्चे हैं आना जिस पे
वो छोड़े न हिसाबी पाई
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हम पर आग बबूला होते
हम क्या सावन झूला होते
मौसम की है मार सभी को
सब को परखो सब से सीखो
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पीतल को समझा था सोना
मिटटी को था मिटटी होना
लाख सजा लो घर को चाहे
प्यार बिना चमके कब कोना

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चाँद-चौथ  करवा अभी ,छलनी ओट निहार
साजन तुमसे मांगती ,सुख जीवन आधार
सुख जीवन आधार ,मांगती रजत न सोना
रखू भविष्य निखार ,समर्पित तुझको कोना
दया-क्षमा औ त्याग,लूँ रथ में सबको फांद   ,
सुविधा से फिर जाग ,मैं देखूं करवा-चाँद

१.
तेरा दिल बस छोड़ के ,बाकी सब बकवास
तुझको केवल देख के ,आनन रहे उजास
आनन रहे उजास ,कहीं मिल जाय तसल्ली
दे  इतना वरदान ,गिरे ना अपनी गिल्ली
भूखे रख लो आप ,शाम से होय सबेरा
सभी मुखड़े से सटीक,परी सा मुखड़ा तेरा

२.
मौसम काटों का कभी ,हो जाए अनुकूल
वेलेंटाइन तुम भेजना ,मुझे प्यार से  फूल
मुझे प्यार से फूल .महक हो  तेरी प्यारी
सुन लेती फरियाद,सुकोमल हृदया नारी
शनै-शनै हर बात , घाव पर लगना  मरहम
आता वापस लौट ,वहीं  काटों का मौसम

३.
देखूं करवा- चौथ में ,छलनी चाँद निहार
साजन तुमसे चाहती ,सुख जीवन आधार
सुख जीवन आधार ,मांगती रजत न सोना
रखू भविष्य निखार ,समर्पित तुझको कोना
दया-क्षमा  औ त्याग ,प्रेम यश सबसे सीखूं
सुविधा से फिर जाग, चाँद मैं करवा देखूं


गिनती की हैं रोटियां,मतलब  के रखवाल
जनता अपने  खून में,पाती नहीं उबाल
पाती नहीं उबाल , किसे आ कौन  उबारे
है माया छल-कपट, छोड़ दें कौन  सहारे
पापी-लोभी-दुष्ट,बात व्यभिचारी खलती
गली नहीं जब  दाल,रोटी की किधर गिनती

सुशील यादव
 6
सबकी नजरों से गिरे ,बदले दल हर बार
आँखों पट्टी बाँध जो ,गिन-गिन थके हजार
गिन-गिन थके हजार, समझ कुछ ये सब पायें
जब निर्धन  के हाथ ,पांच-दस मुश्किल आवे
मन्नत की  उस बात ,लगा -लेते सौ डुबकी
लालच तेरी देख ,झुकी नजरे हैं सबकी
सुशील यादव

7

टेलीपेथी ...
बिना पते की चिट्ठियां ,देता कौन पठाय
आंसू-धड़कन साथ ही ,मन सारा अकुलाय
मन सारा अकुलाय,व्यर्थ का रोना-धोना
लिखा हुआ जो भाग ,कहे ग्यानी वो होना
प्रीतम मिलती  सीख,संग दुख के जब जीना
दिखे ऊंच ही नीच ,सभी सुख आधार बिना
##
8
आज ...
कौन-कहाँ जा बैठता,माया रूप जहाज
ना कुनबे की छाँव ना,नियमो भरा समाज
नियमो भरा समाज ,उलंघन से  छुटकारा
नहीं खेद-दण्ड-दहशत ,आपसी भाईचारा
क्रूर- क्रूर अपराध,आदमी है  मौन यहाँ
कोई कुछ भी कर रहा ,फिक्र करता कौन कहाँ
सुशील यादव

9
खंगाल रहे क्यों मिया ,नियम और कानून
फतवा एक निकालिये ,सब लो भट्टी  भून
सब लो भट्टी  भून,गड़े  मजहब का  झंडा
रखना अपने पास ,सड़े करतूतों फंडा
गौरवशाली देश ,निरे तुम कंगाल रहे
वैसे अपना अहित ,आप ही खंगाल रहे
सुशील यादव दुर्ग

१0
हैरान कहीं देखकर ,बदल न पाए लोग
पाखंडी-पापी  चढ़े,छप्पन- छप्पन भोग
छप्पन- छप्पन भोग,ऊँगलिया पाँचो घी में
आस्था की ये लाश ,बहा दो कहीं नदी में
रहते बेबस लोग,दिखे ना मुस्कान सहीं
करती है ये बात ,मुझे बस हैरान कहीं
 @@@
११
रखोगे किस किस का ,मन में ख्याल हिसाब
भूलो छीटें खून के ,ये तकदीर जनाब
ये तकदीर जनाब ,भूल हिस्सा बटवारा
जो किस्मत मिल जाय,उसी पे आस-गुजारा
अपने हिस्से स्वांग,ख़ुशी के और भरोगे
जब अरमानो दीप ,बराबर ध्यान रखोगे
सुशील यादव
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१२
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निकला जगत खरीदने,कौड़ी हाथ छदाम
इस माया संसार का,किसके पास लगाम
किसके पास लगाम,कौन करता रखवाली
हाथ इशारो पुलिस,उच्चके  चोर मवाली
ऐसे में लूटो झपट,यही सोचे मन पगला
चोला  है बैराग ,खरीदने जगत निकला
१३
कमर झुकी लाचार बन ,चलता रहा समाज
बेइलाज बूढ़ा हुआ  ,सत्तर साल सुराज
सत्तर साल सुराज ,आँख पहचान सके  कम
कभी  सुन सका  कान. कौन है सरकार  नरम
दिखे  लाचार बहुत ,रहा कोई  अजर-अमर
लाठी गम की टेक ,करो सीधी झुकी कमर
१४


गिनती की हैं रोटियां,मतलब  के रखवाल
जनता अपने  खून में,पाती नहीं उबाल
पाती नहीं उबाल , आकर कोई उबारे
है माया छल-कपट,किसके कौन सहारे
पापी-लोभी-दुष्ट,व्यभिचारी  बात बनती
गली कहाँ ये दाल,रोटी की किधर गिनती

सुशील यादव

सबकी नजरों से गिरे ,बदले दल हर बार
आँखों पट्टी बाँध जो ,गिन-गिन थके हजार
गिन-गिन थके हजार, समझ कुछ ये सब पायें
जब निर्धन  के हाथ ,पांच-दस मुश्किल आवे
मन्नत की  उस बात ,लगा -लेते सौ डुबकी
लालच तेरी देख ,झुकी नजरे हैं सबकी
सुशील यादव



टेलीपेथी ...
बिना पते की चिट्ठियां ,देता कौन पठाय
आंसू-धड़कन साथ ही ,मन सारा अकुलाय
मन सारा अकुलाय,व्यर्थ का रोना-धोना
लिखा हुआ जो भाग ,कहे ग्यानी वो होना
प्रीतम मिलती  सीख,संग दुख के जब जीना
दिखे ऊंच ही नीच ,सभी सुख आधार बिना
##

आज ...
कौन-कहाँ जा बैठता,माया रूप जहाज
ना कुनबे की छाँव ना,नियमो भरा समाज
नियमो भरा समाज ,उलंघन से  छुटकारा
नहीं खेद-दण्ड-दहशत ,आपसी भाईचारा
क्रूर- क्रूर अपराध,आदमी है  मौन कहाँ
कोई कुछ भी कर रहा ,फिक्र करता कौन कहाँ
सुशील यादव


खंगाल रहे क्यों मिया ,नियम और कानून
फतवा एक निकालिये ,सब लो भट्टी  भून
सब लो भट्टी  भून,गड़े  मजहब का  झंडा
रखना अपने पास ,सड़े करतूतों फंडा
गौरवशाली देश ,निरा तू कंगाल रहा
वैसे अपना अहित ,आप ही खंगाल रहा
सुशील यादव दुर्ग

रखोगे किस किस का ,मन में ख्याल हिसाब
भूलो छीटें खून के ,ये तकदीर जनाब
ये तकदीर जनाब ,भूल हिस्सा बटवारा
जो किस्मत मिल जाय,उसी पे आस-गुजारा
अपने हिस्से स्वांग,ख़ुशी के और भरोगे
जब अरमानो दीप ,बराबर ध्यान रखोगे
सुशील यादव
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कुण्डलिया छन्द का विधान उदाहरण सहित
कुण्डलिया है जादुई, छन्द श्रेष्ठ श्रीमान|
दोहा रोला का मिलन, इसकी है पहिचान||
इसकी है पहिचान, मानते साहित सर्जक|
आदि-अंत सम-शब्द, साथ बनता ये सार्थक|
लल्ला चाहे और, चाहती इसको ललिया|
सब का है सिरमौर छन्द, प्यारे, कुण्डलिया||


कुण्डलिया छन्द का विधान उदाहरण सहित

कुण्डलिया है जादुई
२११२ २ २१२ = १३ मात्रा / अंत में लघु गुरु के साथ यति
छन्द श्रेष्ठ श्रीमान|
२१ २१ २२१ = ११ मात्रा / अंत में गुरु लघु
दोहा रोला का मिलन
२२ २२ २ १११ = १३ मात्रा / अंत में लघु लघु लघु [प्रभाव लघु गुरु] के साथ यति
इसकी है पहिचान||
११२ २ ११२१ = ११ मात्रा / अंत में गुरु लघु
इसकी है पहिचान,
११२ २ ११२१ = ११ मात्रा / अंत में लघु के साथ यति
मानते साहित सर्जक|
२१२ २११ २११ = १३ मात्रा
आदि-अंत सम-शब्द,
२१ २१ ११ २१ = ११ मात्रा / अंत में लघु के साथ यति
साथ, बनता ये सार्थक|
२१ ११२ २ २११ = १३ मात्रा
लल्ला चाहे और
२२ २२ २१ = ११ मात्रा / अंत में लघु के साथ यति
चाहती इसको ललिया|
२१२ ११२ ११२ = १३ मात्रा
सब का है सिरमौर
११ २ २ ११२१ = ११ मात्रा / अंत में लघु के साथ यति
छन्द प्यारे कुण्डलिया||
२१ २२ २११२ = १३ मात्रा
at 12:39

छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या ,मारो हकन कुदारी
घर के आगी बुताय खातिर,खोद कुंआ  तैय्यारी

छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या ,फटे ढोल जब होली
मतलब साफ झलकता जैसे ,बोतल ज्यादा खोली


छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या ,पारे बर हे हाना
कोनो अतलंगी छूटे झन ,नजदीक हवे थाना

छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या ,मिठलबरा के बोली
भांग के शरबत बगरा चलिस, कोस आठ होली

छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या ,छोलाय दिखे माड़ी
तोरे बाबू पी के टूरा ,हपटत आइस ताड़ी

छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या ,कतेक करन अगोरा
गंगा में डुबकत नन्दागे ,गंगा बाजू छोरा

छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या ,हमरो अतका  अरजी
आनी -बानी गुलाल मलेव ,मनमाने मन-मरजी

छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या ,बदलिस मौसम मर्जी
टोपी सीयत हवे  आजकल , चड्डी सिलय्या दर्जी


छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या ,दू के बोल पहाड़ा
पीट-पीट के फोडे डरेव,जात- कुजात नगाड़ा



छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या ,काखर घी हे असली
पद्मावत के छाती छलनी ,तोड़त काबर पसली

सुशील यादव  दुर्ग



 सार छंद

छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या,भौजी मारे ताना
कतका असन कती गंवागे ,देवर पारत हाना

छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या ,दुनो हाथ में लाडू
चलव सफाई अभियान अभी,मारे बर हे झाड़ू

छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या ,वेलेंटइन अगोरा
गंगा किनारे घुमत खानी ,टकरा जाही छोरा

छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या ,मड़ई ऐसो फीका
बिलइ के भाग टूटत नइये,मजबूत हवय छींका

छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या ,छेदा- छेदा पनही
टेटकु किस्मत कइसे जगही ,जाने कइसे बनही

सुशील यादव  दुर्ग



छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या, चिर्पोटी बंगाला

अमसुर होवत राज तुंहरे ,हमरो देश निकाला



छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या, राजनीति खपचल्हा

दिन बहुरे काखर हे देरी ,होवय नकटा- ठलहा



छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या, होवय नेता लबरा

सपनावत रहिबे बाँध-बनही ,खनाय रहिथे डबरा


छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या, दोनों हाथ म लाडू

सूट- पेंट पहिरे खातिर अब , दिल्ली मारो झाड़ू



छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या,सीखो गा बदमाशी

दारु दुकान खोले मिलही ,परमिट बारामासी



छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या,गुरतुर जेखर बोली

सब्सीडी एसो रंग मिलही ,खेलेबर जी होली

15.2.16

वेलेंटाइन छत्तीसगढ़ी स्टाइल

छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या,मनाव वेलेन्टाइन

जरहा बीडी कान खुचैया,तुम्हला का समझाइन



छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या,बासा होटल चलबो

जलईया मन के छाती मा,मुंग-मसूर दलबो



छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या, टुटहा जेखर पनही

वेलेंटाइन राग गवइया , लबरा नेता बनही



छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या,करव टोटका टोना

वेलेंटाइन गाँव म घुसरत ,बचाव कोना कोना



छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या, हवय दाम दू पइसा

पान खवातेन वेलेन्टाइन,खोजब पाछू भइसा



छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या,सूट बूट ला पहिरो

वेलेंटाइन मनाय खातिर,हमर सेती सम्हरो


छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या, उतरिस घर में डोला

अनारकली, मुमताज, हीरा ,देवव खिताब तोला



छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या, बजा बजा के दफडा

टूरा के हमरो ताका झांकी , वेलेन्टाइन लफडा


छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या,जीवरा करय कुल-कुल

डिपरा के रहवइया संगी ,खचका जावय ढुल २



छन्न पकैय्या छन्न पकैय्या,टूरा हे खपचल्हा

दाई ददा के बखान सहय,काबर नकटा- ठलहा



कुम्भ ठिठुरते मेले में

कंबल ओढा कोई संत है क्या

सागर की निर्मम लहरों का

किनारे सुखद अंत है क्या

सूनी राह मिल गई हो मुझको

जंगल को सौगात बसंत है क्या



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