Tuesday, 27 September 2022

मुफ्त चंदन

 

2122   1222 2

मुफ्त चंदन.....

कल जिसे तू मिला है भाई
 दूध का वही धुला है भाई

आदमी चाहे जो अपनापन 
खैरियत से मिला है भाई

हिन्दु मुस्लिम सँग रहते हों 
पास क़ोई जिला है भाई

फूल कितने बिछाए रखते 
तेरा कांटा गिला है  भाई 

बो रखे  हैं बबूल हजारों
फूल कह दो खिला है भाई

राग कैसे अलापे जीवन
ये गला तो छिला है भाई

मुफ्त  चंदन घिसा जो करते
दिल मेरा वो सिला है भाई 

सुशील यादव::: न्यू आदर्श नगर दुर्ग

2122 2122 1222
वो जो मोहब्बत की तकदीर लिखता है
किसी-किसी के हाथ जागीर लिखता है
#
कोई चाहे कुछ गरम कोई ठंडा यूं
मांग के माफ़िक वो तासीर लिखता है 
#
साथ चलते भाँप लेते हवा का रुख
नाम उनके वक़्त ही समीर लिखता है
#
  हो जिसे अँधेरे का खौफ जीवन भर
  बस खुदा ही समझ तनवीर लिखता है  
#
हम रहें जिसे पाने आवेग  से आतुर
ये जमाना अब हमें अधीर लिखता है
#
दर्द के हर कोण की नाप ले जीता
वो ख़लाओ तेरी तस्वीर लिखता है

सुशील यादव

1222 1222 1222 22
गज़ल
#
जमीनों में छिपा रक्खा खजाना मिल जाए
जुदा बरसों कोई साथी पुराना मिल जाए
#
हमें ख़त क़े नहीं मिलते पढ़े होने का सबूत
फकत मजनून भाँपे हों,हर्जाना मिल जाए
#
नहीं मिलते कभी शहरों सहज रिश्ते जन्मों क़े
बनावट क़े विज्ञापन कुछ बहाना मिल जाए
#
गली में जो गुजरती शाम क्या कहने उनके
मेरी तकदीर मौसम वो सुहाना मिल जाए
#
मुकम्मल ही नहीं खाना -बदोशी क्या कीजे
खुदा की बारहा रहमत ठिकाना मिल जाए

सुशील यादव

122२    1222  1222
वही बस्ती, वही टूटा  खिलौना है
वही अलगू,मिया जुम्मन का रोना है
#
बना जाते सलीके से मुझे लायक
ये मिटटी अगरचे ढूढो कि सोना है

कहाँ बनते यहाँ रिश्ते सलीके  से
किसे मोती कभी आया पिरोना है
#
वफा के बीज डालो ये पता तो चले
खफा मौसम रहा या नसीब बौना है
#
उसे पैगाम दे दो, खैरियत है मेरी
मिसाल के तौर सुइयां जिसे  चुभोना है
#
तरीके से मिला करती खुशी कल तक
अभी उस दौर का ख़्वाब ही सलोना है
#
सुशील यादव दुर्ग छत्तीसगढ़

आजकल जाने क्यों.....
#
एक गलत सोच, आखों की स्याही बदल देता है
समूचे शहर को बारूदी , तबाही बदल देता है
#
फर्क पड़ता नहीं तुम्हारे ऐशो- आराम में तनिक
आंकड़ो की मुनादी ही बस गवाही बदल देता है
#
रिश्तों को निभाना इतना नहीं  आसान आपस में
जुबान की जरा तलखी आवाजाही  बदल देता है
#
मजबूरी ये कि हम बदल नहीं सकते खुद पडोसी
सामने का मुल्क बातों की कड़ाही बदल देता है
#
छीन कर ले जाता था कोई मेरा चैन -करार वही
आजकल जाने क्यों तरीका उगाही बदल देता है
#
सुशील यादव
2212  2212 222
बात तल्ख़ सी
#
मेरी जुबां जब भी फ़िसल जाती है
कुछ बात तल्ख़ सी बस निकल जाती है
#
खामोश हो जीने का मकसद भी क्या
खामोशियाँ गम में बदल जाती है
#
बैसाख या आषाड़ सावन भादो
मजबूरियां मौसम निगल जाती है
#
उसको तराशे  थे हमी जी जान से
हीरे की सूरत अब तो खल जाती है
#
लाखों की  चाहे हो कमाई दौलत
सरकार की नजर आजकल जाती है
##
सुशील यादव

2212     2212      2122
सनसनी....
अब तो यहाँ  इस बात की सनसनी है
हाथों में पत्थर, और जान पे बनी है
#
हमने तराशा  हीरे की शक्ल-सूरत
लिपटी वहीं पे तरबतर  चाशनी है
#
सरकार क्यूँ हैं आग बबुला से मेरे
दब कौन सी नस गई, चढ़ी  झुंझुनी है
#
खामोश हो जीने का मकसद यहाँ क्या
आसार बारिश ,मेघ परतें घनी  है
#
ये फैसलों क़े बाल सारे हैं सफेद
राहत यहां कमजोर सी संगनी है
#
तुम हो कहां सब आजमाने लगे हैं
उम्मीद की हर किरण अब अनमनी है
#
रहबर मिले तो मंजिले खूब आसान
वरना तो  खुल्ले आम अब रहजनी है
##
सुशील यादव
2122 2122 2122
कातिलों क़े शहर में.....
#
फूल की खुशबू  कहीं तो चमक क़े लिए
होश वालों की लड़ाई है नमक के लिए
#
वक़्त ने देखा जहर नफ़रत का घुलता
बोलते क्या- क्या रहे तुम सनक क़े लिए
#
आज मायूसी मे तेरी याद आई
आज छलका दर्द मीठी  कसक के लिए
#
एक हम  जो दे रहे हैँ आप  दस्तक
यूँ सभी लापता हैं शफक क़े लिए
#
कहने को  बाक़ी बचा  क्या पास मेरे
कातिलों क़े इस शहर में रमक़ क़े लिए
#
रहगुजर में बैठ कर देखना कभी तुम
आस तो मिटती कहां इक झलक क़े लिए
#
मयकदे में जो नसीहत पी गया हो
खैर उसकी क्या मनाएं शतक क़े लिए
#
शफक = क्षितिज की लाली
रमक़ = रही सही जान, थोड़ी सी जिंदगी
#

सुशील यादव

2212  2212 2212 112/22
माथे शिकन  कब  चेहरा आकर तनाव गया
सच बेचने  निकला जहाँ लाखो का भाव गया

क्यूं तौलते अपनी गरज से लोग आजकल
लगता तुम्हारे शहर से होकर चुनाव गया

माथे पे शिकन, चेहरे पर चाहे  तनाव आ जाये
सच कभी न बेचिये लाखों भले भाव आ जाये

लोगों को तौलते हैं अक्सर अपनी गरज में आप
बिना मकसद कब पूछते,जब न चुनाव आ जाये

उनके इशारों में तो फिजूल लाख लुटा देते हैं
बात तब हैं ईंट पत्थरो क़े घर लगाव आ जाये

अपना कुनबा छोड़ क़े यायवर  कब तक जियें चढ़ती उमर क़े फैसलों में कहीं कसाव आ जाये

बारिश क़े भरोसे में नदी उफनाती रही यक़ीनन
किसे मालूम किस ढलान कहां  रिसाव आ जाये

26.6.22

मौसम....
#
मेरे चाहने से कब बदला है मौसम
तेरे कहने पे जो चलता है मौसम
#
घुटने - घुटने पानी  जब नावें चलती
ठहरा - ठहरा  तब तो लगता है मौसम
#
नदिया बीच  भंवर  मेँ फँस कर ये जाना
खुद भी कैसे रह लेता तन्हा मौसम
#
एक दूजे की करते पूछ परख तब तक
तिरपाल तले हो कुनबा सूखा मौसम
#
सालों बाद भटकते आया है जाने
कुछ तिलस्मी, फिल्मी कुछ गोया मौसम
#
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर,जोन 1 स्ट्रीट 3 A
दुर्ग छत्तीसगढ़
मोबाईल :7000226712

2212  2212   2212 1222
@@
1222 1222 1222
तमाचा वक़्त का...
#
किताबों में  कहां अब  फूल मिलता है
बचे लोगों  ले दे क़े उसूल मिलता है
#
सभी पाशे चले शकुनी की अब चालें
जिसे मौका सही अनुकूल मिलता है
#
विरासत को बचाने की कवायद हो
वगरना मशवरा उल जुलुल मिलता है
#
नहीँ है कायदे से कोइ रखवाला
सियासत सादगी अब धूल मिलता है
#
क़ोई कांटे बिछा क़े जब चला जाता
तमाचा वक़्त का माकूल मिलता है
#
सुशील यादव





समय मिले तो

 

समय मिले तो ढूढना .....
##
सुख की चादर तान के, सोए रहते आप
समय मिले तो ढूंढना , आस्तीन के सांप
#
सभी समझ को भूलकर,बातें रख लो  याद
हरा -भरा भी सूखता, बिन मिट्टी बिन खाद
#
शनै-शनै छोटा  हुआ, संयम का आकार
अब तो केवल क्रोध का, फैला खरपतवार
#
छोटा अब लगने लगा, रोटी का अनुपात
आश्वासन की बेड़ियां नियमित शाम-प्रभात
#
करते-करते तंग हूं, मैं अपना किरदार
अब तो मेरे हाल पर, मुझको छोडो यार
#
गांधी मिलकर गोडसे, पूछते कुशलक्षेम
इसे नोट महिमा कहें, या मानवता प्रेम
#
शायद मेरी साधना,निहित कहीं है खोट
हर ऊंचाई नापकर,पाते रहता चोट
#
तेरा होना इतर सा ,देता था एहसास
तेरे बगैर यूं लगे, चला गया मधुमास
#
कैसे जाने  फैलता  ,जीवन का आकार
साँसों से होता नहीं ,घड़ियों का व्यापार
सुशील यादव

2212   2212    1222  2
अहसास ....!

है कौन,जो तन्हाई को सदा देता है
मुझको कभी,बन के सबा हिला देता है

मैं सुनने का आदी नहीं,मगर कानो में
सुर-ताल-नगमा सा कहीं,सुना देता है

हिलती रही दीवार पर,तेरी परछाई
अहसास, अक्स कई तरह,बना देता है

जिस राह पर होती रही मुलाकाते,आज
उस रास्ते पहरा कोई बिठा देता है

गुमनाम से अँधेरे हम निकल भी आये
हालात जीना, हाल हर सीखा देता है

अंजान सा बैठा छिपा हुआ नासूर अब
खुद हरकतों अपनी कभी डरा देता है

मत सोचना, मेरे कदम के नक्शो चलना
जंगल करीब  यकबयक  पहुचा देता  है

है तलब हमको तेरी  किया क्या जाए
ये नाव गलत सुराख  ही डुबा  देता है

मजबूरियां है या समय फरेबी  जाने
दीवार साझा बीच में उठा देता है

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग
10.7.17
लोग  सम्हलने नहीं देते
1222 1222     1222     1222
हमारी नजर में लोग हमे
सम्हलने नहीं देते
यहां माकूल सा माहौल तो
बदलने नहीं देते

न जाने लौट आता सोच क्या,
दिल का बसन्त यहाँ
तेरी रहगुजर होकर, कुछ हैं ,
बस  निकलने नहीं देते

न कायदा है न कानूनी फिकर
देखो जिसे आजकल
हुकूमत के उसूलो से हमे
बाख़बर हो चलने नहीं देते

तलब होती, तेरे दीदार की
मायूसियों में जब
बचा के नजर सैलाब आंख में
उतरने नहीं देते

सुशील यादव

आदमियत की पहचान...
XxX
मैं खुद अपने आप का मुखबिर सा हो गया हूँ यायावर हूँ आजकल मुसाफ़िर  सा हो गया हूँ
XxX
दरख़्त था जो शातिरों को भी छाँव देता रहा
रहमत के नाम से जग - जाहिर सा हो गया हूँ
XxX
लोग  सभी, वजूद मेरा , नकार के, निकले यहाँ-वहाँ
लगता उनके उसूल से, लगभग, बाहिर सा हो गया हूँ
XxX
कितनी बार, आजमाने की,मुझको हुई कोशिशे
मतलबी दुनियां देख यहाँ, काफ़िर  सा हो गया हूँ
XxX
तुम्हारे हाथ आऊं,कि गैर के हिस्से गिना जाऊं तेरे कुनबे मे लौट कर , वही फिर सा हो गया हूँ
XxX
आदमियत की पहचान,जरा- जरा होने लगी
ठोकर  खा सम्हलने मे अब, माहिर सा हो गया हूँ
XxX
मैं भी लगा था उस्तादों की कतार मे, उम्मीद से
जीतूंगा जंग मगर, आदमी आखिर सा हो गया हूँ
XxX
यूँ तो ख्याल तेरा दुरुस्त रहता है यार आजकल
शक के दायरे मे मैं ही बस शातिर सा हो गया हूँ
XxX
बंन्द हूँ, बेजान हूँ, अब तक किसी ने सुधारा नहीं  चौराहे पर नगर घड़ी मैं , स्थिर सा हो गया हूँ
XxX
खजाना ईमान का अकेले मे कल खोल के देखा
बेशकीमती हीरा -मोती जवाहिर सा हो गया हूँ
XxX

सुशील यादव दुर्ग

जिसे सिखलाया बोलना…..2122 १२२२ 2212

चश्म नम और दामन तर होने लगा
जिन्दगी सादगी से बसर होने लगा

जो निचोड़ के रखा है अपना आस्तीन
अब पसीने से नम कालर होने लगा

दाउदों के पते पूछो तो हम कहें
पाक-दोहा कभी तो कतर होने लगा

बाज आऊं बुरी हरकत से मै कभी
मय नशी में इधर-ऊधर होने लगा

अब मेरी मंजिलो के मिलते हैं निशान
पांव के छालो का असर होने लगा

बेजुबां बुत जिसे सिखलाया बोलना
पलटते ही मेरे पत्थर होने लगा
सुशील यादव

कातिलों के chehre

 

कातिलो के चेहरे ....
खून के छींटे पड़े ,पत्थर  में अब
कातिलो के चेहरे हैं खबर में अब
##
कठिन था वो दौर जुल्मो-सितम का
फैलती अफवाह ये  बंजर में अब
##
कल  लुटेरा बन के लूटा गजनवी
तुमने पहचाना उसे रहबर में अब
##
याद हमको हैं खरोचें भी जरा
लोग रहते आग-झुलसे शहर में अब
###
फैसलों की ये घड़ी शायद  नहीं
जीत कर जीते जी क्यूँ कबर में अब
##
मेरी पेशानी में है यायावरी
कुछ नफा दिखने लगा दरबदर में अब
##
सुशील यादव

चिंतन....

आस्था के अंगद अड़े हैं भाई
हम अर्जी लिए खडे है भाई

मनमानी से तुम बाज न आते
माना कद में तुमसे बड़े हैं भाई

बेईमानी से चाहे पुल बना लो
रिश्ते तो खंबो  में गड़े हैं भाई

लूटने वाले सब दल में आते
पकड़े गए सभी छड़े है भाई

क़ानून को जिसने हाथ लिया
हाँ जेल में वो ही सड़े है भाई

राजनीति में क्या उसूल ढूंढते
तस्वीर पुरानी पकड़े हैं भाई

व्यर्थ पानी को इनमें खर्चना
कहते ये चिकने घड़े हैं भाई

सुशील यादव न्यू आदर्श नगर दुर्ग
मो.7000226712

तेरे प्यार अलावा
#
ये कैसी नइय्या?
कैसा खेवनहार मिला है

सब्र की फसल कहाँ उगाएं
काटें क्या इन खेतो से?
धीरज की मिट्टी में बाक़ी
क्या रहा सिवा रेतों के

रिश्तो को जितना हमने सींचा
उतना ही खर -पतवार मिला हैं
#
हम सूरज से रहे मुकाबिल
समुद्र लहर - लहर टकराये
लेकिन तुमसे मिलने केवल
तुफानी चेहरा छोड़ के आए

वादों की बस्ती में  बतलाएं
जहाँ गए तकरार मिला हैं
#
आज हमारी हरकत पर
नजर टिकी है जमाने की
तेरे प्यार अलावा क़ोई
चाबी नहीं खजाने की

निज़ाम में हासिल जगह नहीं
चार तरफ मातम अंगार मिला हैं
##
सुशील यादव न्यू आदर्श नगर दुर्ग

छोड़े हम बैठे hote

 

छोड़े हम बैठे होते,,,,,
संभव हमको दिखता सब,आसान अगर हो जाना
छोड़े हम बैठे होते, बेमतलब  का हकलाना
#
हमको समझे होते,ऊपर से नीचे तक जिस दिन
मुमकिन उस दिन हो जाता,चाहत का और ठिकाना
#
बारिश का मौसम भी,आता है केवल खामोशी से
यादों के जंगल भीतर फिर ,  पैरहन भिगा जाना
#
लेकर अपनी सूरत रोनी सी, बैठे हैं कल से
खुशियों का लगता, इस दीवाली लौट नहीं आना
#
सुशील यादव
2122  2122 212
कातिलो के चेहरे ....
खून के छींटे पड़े ,पत्थर  में अब
कातिलो के चेहरे हैं खबर में अब
##
कठिन था वो दौर जुल्मो-सितम का
फैलती अफवाह ये  बंजर में अब
##
कल  लुटेरा बन के लूटा गजनवी
तुमने पहचाना उसे रहबर में अब
##
याद हमको हैं खरोचें भी जरा
लोग रहते आग-झुलसे शहर में अब
###
फैसलों की ये घड़ी शायद  नहीं
जीत कर जीते जी क्यूँ कबर में अब
##
मेरी पेशानी में है यायावरी
कुछ नफा दिखने लगा दरबदर में अब
##
सुशील यादव

वही बस्ती

 

1222   1222  1222
वही बस्ती, वही टूटा  खिलौना है
वही अलगू,मिया जुम्मन का रोना है
#
बना दोगे  मुझे लायक सलीके से
महज पीछे नजर की धूल  सोना है

कहाँ बनते यहाँ रिश्ते तरीके से
कभी आया किसे मोती  पिरोना है
#
वफा के बीज डालो ये पता भीचले
खफा मौसम रहा या नसीब बौना है
#
उसे पैगाम दे दो, खैरियत की मेरी
मिसाल के तौर जिस को सुई चुभोना है
#
तरीके से मिला करती खुशी कल जो
अभी उस दौर का ख़्वाब ही सलोना है

# सुशील यादव दुर्ग छत्तीसगढ़
7000226712

छोटी उम्र में

 

2221   2221  2221  212
छोटी उम्र में ...
जाकर दूर, वापस लौटना, अच्छा नहीं लगा
रिश्तों को, अचानक तोड़ना,अच्छा नहीं लगा
# $#
मातम भी जताने लोग अब इस तरह आ रहे
रस्मों को तराजू-तौलना अच्छा नहीं लगा
# $#
काबिल हो अभी माफी के दीगर बात साहबान
बारिश में जी भर के खौलना अच्छा नहीं लगा
# $#
तुम सम्हाल लो  सल्तनत ये बेखौफ आजकल
कल तो और का है बोलना, अच्छा नहीं लगा
# $#
गम के दौर में कब चलन से बाहर हुआ 'सुशील'
रातो मोम बन के पिघलना अच्छा नहीं लगा
# $#
लाखों तक रटी गिनती, करोड़ कभी सुने कहाँ
छोटी उम्र ज्यादा बोलना , अच्छा नहीं लगा
# $#
अपनी हैसियत अनुसार हम रहते यहाँ कहां
मन का ठोकरों से बहलना अच्छा  नहीं लगा
@@
सुशील यादव

उम्र के इस पड़ाव में

 

गीत
उम्र क़े इस पड़ाव में.....
#
दर्द जहाँ मैं टांगा करता,
टूटी आज वो खूंटी लगती
सारे संबल सभी आसरे,
बिना असर की बूटी लगती
##
लेकर चलना उसी गली में,
यादों का भरता हो मेला
बचपन खेल घरोंदे वाले,
नाव डूबता रहूँ अकेला
0
अब उम्र क़े इस पड़ाव में,
कितनी बातें छूटी  लगती
##
अरमानों जब पँख नहीं थे,
आकाश लगा करता छोटा
उड़ने की जब ताकत आई,
व्यवधानो ने अक्सर टोका
0
शेष नहीं कुछ कहने जैसा,
नगीना  खोई अंगूठी लगती
##
इन बाजुओं का दम है,
पहले जैसा आज भी क़ायम
आज भी  मिलने की चाहत,में
रत्ती भर उत्साह नहीं कम
0
चाहत की अब दुनियां तुझ बिन
खाली - खाली झूठी लगती
##
उमंग उजालों की सजती,
सदा रहे पहचान दिवाली
मुस्कान बांटते जाना यूँ,
तमाशबीन  बजा दे ताली
0
मंहगाई की हाथ थमी हो ,
विपदा की लम्बी सूटी लगती
##
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर,जोन 1 स्ट्रीट 3 A
दुर्ग छत्तीसगढ़

Thursday, 15 September 2022

धोये से

 

धोये से फिर ना धुले ,

##
इस राग को कहाँ अलापे
मिले ज़ख्म कहाँ सहलाएं
जीवन के कोलाहल मे
शांति गीत अब कैसे गायें
@
मन परिंदे कहाँ उड़े
जीवन आपा-धापी में
खोज न पाये दो ढाई अक्षर
किसी किताब कॉपी में
##
दाने-दाने मुहताज रहे
खाने के जब दिन थे अपने
अब  दानों को फेक रहे
पाकर ऊँचे बेहतर सपने
##
संशय में पहचान न पाये
होली के हम गडमड चेहरे
कितने साफ रखे थे दर्पण
हालांकि कुछ दाग थे गहरे
##
दिशाहीन सा कोई भटका
दिक -भ्रमित हुआ है क़ोई
तेरे रचे माया जाल को
जाकर नजदीक छुआ है क़ोई
@
अब संशय  हर संबोधन मे
हर परिचय अंगार भरा है
आहत है रिश्तों का आँगन
पिछले चोट का घाव हरा है
@
कैसे तुझको परखें तौलें
कितना तुझपे विश्वास  करें
मनमानी जो आप करो तो
किसके आगे प्रलाप करें
@

##धोये से फिर ना धुले ,

##

इस राग को कहाँ अलापे

मिले ज़ख्म कहाँ सहलाएं

जीवन के कोलाहल मे

शांति गीत अब कैसे गायें

@

मन परिंदे कहाँ उड़े हैं 

जीवन आपा-धापी में

खोज न पाये दो ढाई अक्षर

किसी किताब कॉपी में

##

दाने-दाने मुहताज रहे

खाने के जब दिन थे अपने

अब  दानों को फेक रहे

पाकर ऊँचे बेहतर सपने

##

संशय में पहचान न पाये

होली के हम गडमड चेहरे

कितने साफ रखे थे दर्पण

हालांकि कुछ दाग थे गहरे

##

दिशाहीन सा कोई भटका

दिक -भ्रमित हुआ है क़ोई

तेरे रचे माया जाल को

जाकर नजदीक छुआ है क़ोई

@

अब संशय  हर संबोधन मे

हर परिचय अंगार भरा है

आहत है रिश्तों का आँगन

पिछले चोट का घाव हरा है

@

कैसे तुझको परखें तौलें

कितना तुझपे विश्वास  करें

मनमानी जो आप करो तो

किसके आगे प्रलाप करें

@

जो वसन हम पहना करते

चरखा हमी चलाने वाले

बूढ़े हाथ बता तुम कंपन

इतिहास में रहते छाने वाले

@

सौ -सौ साल अगर हम चाहें

नीयत साफ तो पा न सकेंगे

धोये से जो ना धुले पाप वो

पीढ़ी को कल बतला न सकेंगे

@#

सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर,जोन 1 स्ट्रीट 3 A

 दुर्ग छत्तीसगढ़

7000226712

  ये वो सुबह तो नहीं ,

**

ये वो सुबह तो नहीं ,

जिसकी बांग

किसी मुर्गे ने दी हो

और

जाग गया हो

सोते से

सारा गाँव ..

वो सुबह ,कि

घण्टियाँ बजाते

चल रहे हो बैल

किसी खेत की पगडंडियों पर

और हुर्र की आवाज से चौंक कर

उड़ गई हो चहचहाट करती चिड़ियाएं

वही मस्जिद की किसी मीनार पर जा बैठते

बरबस गूंज गई हो अजान

वो सुबह जब

शब्द -कीर्तन की आवाज संग उठने को

आतुर हुई हो

सूरज की पहली आभा वाली किरणे

या जाड़े में ठिठुरते

रामायण की चौपाई बांचता

बगल से गुजर गया हो

कोई पण्डित

ये सुबह वो तो नहीं

जब

अलगू और जुम्मन

एक ही छाते में

कुछ भीगते, कुछ भागते

पड़ौस के गाँव से

बुला लाये हो डाक्टर

और बचा ली हो

प्रसव वेदना से कराहती किसी

गऊ माता की जान

ये वो सुबह भी नहीं

जब

झुर्रियों भरे चरहरों से

पर्दा करती

चुपचाप निहरे

पानी भरने

निकल रही हो औरतें

या पीछे ,नँगे-अधनंगे बच्चे

रात की बासी रोटियां लिए

माँ की घुड़कियों सुन

खपरैल के घरों को लौट रहे हो

***

शायद गाँवों में

इन दिनों भी

ऐसी सुबह हुआ करती हो

अम्न,चैन ,भाई चारे की

पर रोना तो ये है

मेरी नींद

इन दिनों

देर से खुलती है

***

सुशील यादव

 

पर जिनके कटे थे

पर जिनके कटे थे ,परिन्दे कहाँ गए
भोले-भाले,सीधे-सादे, बाशिंदे कहाँ गए

जमीन खा गई उसे ,या निगला आसमान
वो निगरानी शुदा थे ,दरिन्दे कहाँ गए

यही है जगह जहाँ ,कल्पना का लोक था
सब मिले सलीके से,घरौंदे कहाँ गए

मजहब की ये जमी ,बारूद और धुँआ
लाशों के सब ढेर में,जिन्दे कहाँ गए

सुकून तेरे होने का, रहता कहीं भीतर
जहाँ सर रखे रोते ,कन्धे  कहाँ गए

सुशील यादव

२ २ १ २   २ २ १ २  २1२
वो कुछ दिनों से ....
वो कुछ दिनों से इधर नहीं बोलता
मुझे चाहता है मगर नहीं बोलता

खोया रहे अपनी धुनों में मगन
उसपे नशा कोई जहर नहीं बोलता

शायद चली तलवार किसी बात पर
अपना कभी ख़ंजर नहीं बोलता

कितनी कवायद की तुझे भूलने
हमसे हमारा जिगर नहीं बोलता

तेरी  महक रहती है फूलो यहाँ
यूँ खिल के तो इतर नहीं बोलता

कुछ समझ में आने लगी बात फिर
तुमसे भले बेहतर नहीं बोलता
सुशील यादव

यही रिश्ता बचा ....
अब यहां ना आशियाँ, परिंदा बचा
बारूद का यार  केवल धुँआ बचा

ले गया छीन कर बस्ती से अमन
खारे आंसूओ, आंगन कुंआ  बचा

सब ना-वाकिफ अपनी सूरत से
किसके पास कहो  आइना बचा

दहशत ,दीवारें , अदावत केवल
दरमियान अपने यही रिश्ता बचा
सुशील यादव

१.एक एकलव्य
##
अँधेरे में मैं अब भी
तीर चला लेता हूँ
और सही मानो तो सही
निशाना लगा लेता हूँ |
तुम्हे जरूरत होगी
या तो मेरे अंगूठे की या
पूरा हाथ मांग लोगे ..?
***
तुम नहीं थे मेरे आदर्श
नहीं झुकाया था सर तुम्हारे आगे
तुमने नहीं दी थी मुझे दिशाएँ
तुम्हारी उंगली थाम के भी एक पग
चला नहीं था मैं...
नहीं किया था अनुशरण
तुम्हारे किसी दिकबोध का
तुम्हारे पग चिन्हों को ढूढते
नहीं गया था दूर अरण्य, दलदल  में
पता नहीं क्यों
बावजूद इसके
तुम्हे लगता रहा
मेरी उपलब्धियों में कहीं न कहीं हो तुम
केवल तुम
**
अपनी इस सोच के दायरे से
जरा भी नहीं डिगते तुम
साधिकार
आ जाते हो
सुबह -शाम  दरवाजे पर
इस तगादे में कि,
तुम्हे काट कर दे दूंगा
मैं
अपना अंगूठा
**
मेरे पिता ,
तुम्हे मालुम है आदमी जब
भूख की
अहम् की
अस्तित्व की
लड़ाई में
जब होता है
उसके सामने बौने हो जाते हैं
सभी किरदार
वे खुद लिख लेता है
अपने भोगे
यथार्थ का इतिहास
उसे याद हो आये
पुराने लनम की कोई बात
खून से लथपथ अंगूठा
अंगूठे के बीच
प्रत्यंचा में अब -तब छूटने को
तीर की नोक पर उसकी
अपनी आजीविका ...
***
सुशील यादव

 2122 2122   2122  2122

सच कहो तो आजकल दर-ब-दर हैं हम

दस्त बस्ता  शहर में बे-हुनर हैं हम


नोचता है  चेहरा मासूम कोई

अब किसे बतलाय कितने निडर है हम


ये अमानत सौप जानो- जिस्म देकर

ढूढने को निकले क्या-क्या  गुहर हैं हम


हम कहानी किस्से की बुनियाद हो गए

सोचते हैं खलवतों  जादुगर हैं हम


खबर ये   वादा खिलाफी की उड़ा दे

जग ने जाना सच,चलो बे फिकर हैं हम


पुल बना कर आप चलना चाहते हो

ये हकीकत जान लो  पुरखतर हैं हम


अब न रूठती है अनारकली यहां पर

नए जमाने खैरख्वाह  अकबर हैं हम


बाअदब वा बा-मुलाहिजा अकबर हैं हम


122 122 122 122 

कहीं चोट  खाए सवालो घिरे हैं

बंधे हम  मुस्काए सवालो घिरे हैं

 

जनाजा किसी गैर का और शामिल

रहे मुह  छिपाए सवालो घिरे हैं


नहीं बात बनती दिखे तो समझिये

बुद्दू लौट  आए सवालो घिरे हैं


जिसे नींद में चलने की आदत नहीं

तजुर्बे भुनाए, सवालो घिरे हैं

 

जनाजे को उनके कंधा क्या दिये हम

रहे  सर चढ़ाए ,सवालो घिरे हैं


नहीं जानता  था सबूतों में शामिल

दस्ताने छुपाए ,सवालो घिरे हैं

सुशील यादव

२. ४. १८

122 122   122 122

कहीं चोट  खाए हैं मेरी तरह वो

बंधे हाथ  मुस्काय हैं मेरी तरह वो

 

  जनाजा किसी गैर का और शामिल

  रहे मुह  छिपाए हैं मेरी तरह वो


नहीं बात बनती दिखे तो समझिये

बुद्दू लौट  आए हैं मेरी तरह वो



जिसे नींद में चलने की आदत यहाँ

तजुर्बे भुनाए हैं  मेरी तरह वो

 

@@

जनाजे को उनके कंधा क्या दिये हम

बेजा  सर लगे  खाये हैं  मेरी तरह वो





1222  1222 २१2


नफरतो के घने जंगल

 मुहब्बत या  जंग बराबर सा लगा

 पड़ौसी फिर  मुझे रहबर सा लगा


यकीन के बाजुओं सर पटका किए

अचानक वो कड़ा पत्थर सा लगा


लकीर जिसे नसीब कहे आदमी

कहीं वो  बेसबब अजगर सा लगा


नफरतो के घने जंगल क्या घिरे

दुआ भी पलट ढाई अक्षर सा लगा


हमेशा सावधानी की सोचिये

भले ही सांप मोम-रबर सा लगा

सुशील यादव

21.7.17


यकीन के काँधे जो  सर पटका किए

अचानक वो कड़ा पत्थर सा लगा


 1222---1222---1222-1222


गली तेरे करम.की ..


मैं तुझसे मिलने का कोई बहाना ढूढ़  लेता हूँ

घने-जंगल, गड़ा-भूला, खजाना ढूढ़ लेता हूँ


गली तेरे करम की,दूर तक है अधबनी चाहे

नसीबो में लिखा अपना ,जमाना ढूढ़ लेता हूँ


न भाये है,जिसे तारीफ के पुल से गुजरना भी

उसी लम्हा झुका दूँ सर ,बहाना ढूढ़ लेता हूँ


मेरे नजदीक आके दूर मालिक था अगरा जाना

हकीकत सा ख्यालो में ,फसाना ढूढ़ लेता हूँ


जिगर में ,बात की तल्खी, लिये जीना 'सुशील'आया

तभी चुपचाप हटने का ,ठिकाना  ढूढ़ लेता हूँ


सुशील यादव दुर्ग


@@


 221 2122 221 2122

फ़िलबदीह - 1104🌺

221 2122 221 2122

हम जगह-जगह, दुनिया भटके गुमान लेकर

कोई जरूर आएगा नव-विहान लेकर


कुछ दाग जहन में बाकी है, जिसे मिटाने

जख्मो सहित निकल भी दौड़ो, निशान लेकर


इतराये जो पड़ौसी उसको तमीज दे-दो

आदत सुधार लें वो अमिट पहचान लेकर

 

मजबूत हैं इरादे तो बात ही नहीं है

वरना चले-चलोगे कैसे थकान लेकर


कोशिश करे सभी जन ,ऊंचा ललाट पाये

गौरव पलों में घूमे सब , हिन्दुस्तान  लेकर

सुशील यादव

१३.६.१८


मसखरी  युग


निगाहें हटा के ज़माना चला है

गरीबो यही तो बहाना चला है


बताओ कि है आदमी का वजूद क्या

घिरा आप ही खुद निशाना चला है


बचा के रखें क्या विरासत की खातिर

कगार आजतक  आब-दाना चला है

 

मुकदमो में जीतें कि हारें बराबर

घड़ी-फैसला मुंसिफ-थाना चला है


हमे गुदगुदा के छिपा कौन बोलो

कहीं  मसखरी युग  पुराना चला है

सुशील यादव

१३६१८

$$



वो कुछ दिनों से ....

२२१२    २२१२  2२1२  1२

अपनी जुबा से, बात मन की  खोलता नहीं

वो कुछ दिनों से, आजकल फिर बोलता नहीं


खामोशियाँ उसकी, इशारा क्या करे बता

टूटे परो से, आसमा जो  तौलता नहीं


दिल टूटने की हर अदा में सादगी रखे

पी ले ज़हर चुपचाप, ज़हर वो घोलता नहीं


पानी सा हो, उस खून का, क्या करता वो भला

घिर के मुसीबत- आफतो में खौलता नहीं


सुशील यादव


@@@


हम वहम की दुनिया भटके गुमान लेकर

कोई जरूर आएगा नया विहान लेकर



किरीट सवैया नामक छंद आठ भगणों से बनता है।

इसमें 12, 12 वर्णों पर यती होती है।


तीरथ जाकर लौट गया वह,बीन रहा अब चांवल कंकर

जो मन में प्रभु वास रहे तब ,छीन सका उर से कब शंकर


महाभुजंगप्रयात आठ सगण| :सुशील यादव

यहां तो न बाकी रहा चाहतो का, इलाका जिसे  याद  तूने किया है

न आबाद है वो जमीने जहां तू ,उगा बालियां खेत में जी लिया है


बचा कोहरा-धूल-माटी निहारो ,जिसे चाहते हो उसे ही  पुकारो

सभी तो कहीं जा चुके हैं यहां से ,तु बीमार कैसे जिया है

 

@@@

 

२*८ दुनिया रंग-बिरंगी

दुनिया रंग-बिरंगी देखो
फिर से चाल फिरंगी देखो
हम हैं अपने सूबे में खुश
बारा- मासी तंगी देखो
#
आज यही केवल सच्चाई
है भाई का नाम कसाई
हम ख़र्चे हैं आना जिस पे
वो छोड़े न हिसाबी पाई
#
#
हम पर आग बबूला होते
हम क्या सावन झूला होते
मौसम की है मार सभी को
सब को परखो सब से सीखो
#

पीतल को समझा था सोना
मिटटी को था मिटटी होना
लाख सजा लो घर को चाहे
प्यार बिना चमके कब कोना

#

 

१५.६.१८

 

वीरांगना रानी लक्ष्मी बाई के  बलिदान दिवस १८जून पर
##

तुम रक्षक हो सीमा-प्रहरी ,पथ में आगे बढे चलो
पहाड़ दुर्गम  को लाघों,दुरूह घाटी चढ़े चलो
मानवता के तूल तुम्ही  ,मिट्टी के हो कारीगर
बिन मन्दिर पूजे जावो ,मूरत वो भी  गढ़े चलो
#
एक दिया तम में रखना ,एक जले  आंधी  आगे
हो अडिग विश्वास तुम्हारा ,सर-पैर ले दुश्मन भागे
सीमा से जब वापस आओ ,माँ के लाल बहन-वीरा
हर  सुहागन दृग देखना , कैसे सोये दिन जागे
#
शांति जिसने जकड़ लिया, 'पर' अहिंसा के हैं काटे
मक्कारी  चादर ओढ़े ,परचम जिहाद के  बांटे
मजहब के चण्डालों का,मखौल क्यों नहीं  उड़ाये ,
इनकी मकसद के जड़ को,क्यों न अभी कतरें- छांटे
#
लक्ष्मी-बाई सा साहस ,अपने भीतर आप भरो
जीवन शब्दकोश निकालो ,कायरता से काश डरो
लोहा लेने की बारी , कतार पीछे  क्या रहना
जन-जन में चिश्वास जगे ,आपतकाल   तुझे    लड़ना
#
मर्दानों की शक्ति लेकर , एक रानी  रण में आई
उम्र की कोमल काया थी ,उतरी न थी  तरुणाई
अंग्रेजो को रण में तब ,कैसे  खूब छकाती थी
वो थी  रानी झाँसी या ,संदेश भरी  पाती थी
सुशील यादव
16.6.18

 

लोग कहते अब.....

अब यहां ना आशियाँ- परिंदा बचा
यार बारूद का धुँआ बस धुँआ बचा

ले गया फिर  छीन बस्ती कोई अमन
डबडबायी आँख आँगन कुँआ बचा

कौन सूरत  आप  पहचानता यहाँ
पास किसके आजकल  आइना बचा

वो सभी पल याद हमको  करीब से
वो जहां बस  आदमी  झुनझुना बचा

हाँ मुझे भी लौटना है 'सुशील' पास
लोग कहते अब वहीँ मन 'घना' बचा

सुशील यादव दुर्ग
2122   2122  1212

20.6.18

122                   12
मुझे चाहता है मगर वो  नहीं बोलता
जुबा सादगी नाम से ही नहीं खोलता

'सुशील' जो भूला ....

दिल रखने को तुझे दिया क्या है
तू ही बता कि फ़ायदा क्या है

यारा बुझा दिया चिरागो को
जलता हुआ यहाँ बचा क्या है

मुहताज हैं खुदा यहाँ हम भी
ये मुफलिसी सिवा मिला क्या है

अब तिलस्मी लगी हमे दुनिया
देखे ये  फैलता नशा क्या है

चारो तरफ है भीड़ का उन्माद
नारो के बीच निकलना क्या है

मजबूरियों 'सुशील' जो भूला
अब तो बता सही पता क्या है

सुशील यादव दुर्ग

खोज लिया जिसने .....

जब दुश्मन जाने पहचाने हैं
यारो हम भी बहुत सयाने हैं

लेकर अपनी बस राम-कहानी
समझौतों के सहज निशाने हैं

मुस्कान मिली तो जीवन छलका
यूँ गम के सौ-सौ अफसाने हैं

जग को दे न सके अपना परिचय
कहने के कई लाख बहाने हैं

किसने हमको कब तौला-परखा
हम बीते इतिहास पुराने हैं

खोज लिया जिसने दिल को भीतर
पाए असल 'सुशील' खजाने हैं

सुशील यादव
14.7.17

गलत राय गलत मशवरा देने वाले
मुंसिफी की आड़ फतवा देने वाले
बिजलियाँ सौ -सौ गिरे तेरे घरों में
ओ जन्नते काश्मीर जला देने वाले
सुशील यादव

दहशत ,दीवारें और  अदावत केवल
सीख लिए होते काश  बगावत केवल
माथा सहजादों का है  झुकते देखा
जिनका  मकसद होता मोहब्बत केवल
##

2212 2212 1222 2
अहसास ....!

है कौन,जो तन्हाई को सदा देता है
मुझको कभी,बन के सबा हिला देता है

मैं सुनने का आदी नहीं,मगर कानो में
सुर-ताल-नगमा सा कहीं,सुना देता है

हिलती रही दीवार पर,तेरी परछाई
अहसास, अक्स कई तरह,बना देता है

जिस राह पर होती रही मुलाकाते,आज
उस रास्ते पहरा कोई बिठा देता है

गुमनाम से अँधेरे हम निकल भी आये
हालात जीना, हाल हर सिखा देता है

अंजान सा बैठा छिपा हुआ नासूर अब
खुद हरकतों अपनी कभी डरा देता है

मत सोचना, मेरे कदम के नक्शो चलना
जंगल करीब यकबयक पहुचा देता है

है तलब हमको तेरी किया क्या जाए
ये नाव गलत सुराख ही डुबा देता है

मजबूरियां है या समय फरेबी जाने
दीवार साझा बीच में उठा देता है

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग
10.7.17

१८६१८

 

२१२२ २१२२ २ १२ २ २
चेहरे क्यों हैं मलीन,.....
जिन्दगी को आदमी, आम की, नजर देखो
रख कभी सीने , वजन कोई , पत्थर देखो

डूबने लग जाए, स्वयं ही वजूद कभी
लहर उठती,रह किनारे, समुंदर देखो

आग नफरत की लगाकर, जो छिपा करते
उतरता 'खूनी' वहां कब , खंजर देखो

जो हमे बेख़ौफ़ मिलते, हर-कहीं हरदम
चेहरे क्यों हैं मलीन, आँखे भी अन्दर देखो

एक तमाशा सा, हुआ तेरे शह्र में कल भी
आज की, ताजी फिजा क्या है ,खबर देखो
@@@१८.१२.१५ ....सुशील यादव ..

१२२ १२२ १२२ १२२
कभी नीद तो कभी ख़्वाब छिनता है
वो खिलने से पहले गुलाब छिनता है

मेरी उतरन कभी पहनता रहा जो
वही मुझसे मेरा नकाब छिनता है

कहाँ क्या बुरा जो मेरे नाम जुड़ता
जमाना मुझी से खिताब छिनता है

अगर तू कहे आसमा ला के दे दूँ
हथेली कोई आफताब छिनता है

बुझे लोग, बदहाल बस्ती बीच लगता
यहाँ याद का हर हिजाब छिनता है

सुशील यादव
समझौते की कुछ सूरत देखो
सुशील यादव
222222222

समझौते की कुछ सूरत देखो
है किसको कितनी ज़रूरत देखो

ढेर लगे हैं आवेदन के अब
लोगों की अहम शिकायत देखो

लूटा करते, वोट गरीबों के
जाकर कुनबों की हालत देखो

भूखों मरते कल लोग मिलेंगे
रोटी होती क्या हसरत देखो

फैला दो उजियारा चार तरफ़
एक दिए की कितनी ताक़त देखो

साहित्य शिल्पी में

शब्द ....

जाने किन पैरों पर
खड़ा रहता है
आसमान
दिन रात
बिना थके हुए ....?
मेरे
तुम्हारे
शब्दों को अब
बैसाखी की
जरूरत
महसूस होती है ...
हम आहत-
अपाहिज मन से
बोलते हैं या
सहानुभूतियों की किताब
उस जगह से खोलते हैं
जहां पृष्ठ भर
हाशिये के सिवा
होता नहीं कुछ
#
हम सिद्धार्थ की तरह
खोजने
निकल पड़ते हैं
यथार्थ ...
मगर हमारा
'यक्ष -प्रश्न'

हमे
घेरता है
बरबस

हम आकाश की बैसाखी
उसके पांव
उसकी जमीन को
तलाशने में जुट जाते  हैं,
न जाने किन पैरों पर खड़ा रहता है
आसमान ...?
#
काश ,
हमे पहले
बता दिया गया होता
आसमान कुछ नहीं
एक हवा है
धुँआ है
शून्य  है
और
हवा को
धुँआ को
शून्य  को
बैसाखी की जरूरत नहीं होती
वह अपने
शास्वत वजूद पर
स्वयं चलता है
दिन -रात बिना थके हुए
#
काश हमारे शब्द
यूँ ही
हवा की तरह
धुँआ की तरह
शून्य की तरह
बिना पैरों
चलते
तैरते
अनवरत
लगातार
संप्रेषित होते
बिना किसी बैसाखी के

सुशील यादव दुर्ग

 122 122 122 22


मेरी शक्ल का , आदमी मिल जाए

यूँ पहचान का अजनबी मिल जाए


 उदासी  मे घिर के रहा करती हो

बिखेरो  हँसी जिंदगी मिल जाए


सितम क्या सहे हम निज़ाम मे तेरे

फकत  चाहते सादगी मिल जाए 


उजड़ा चमन था कई दिनों से मेरा

बहारो खिले फूल तितली मिल जाए


अलग सपने दुनिया के होते माना

कभी खास  चाहें वही मिल जाए


 जमाना अभी बन गया दुश्मन सा 

पिघलती रहे बर्फ जमी मिल जाए


सुशील यादव दुर्ग


 १२२ १२२ १२२ १२२

सदी एक लगे है

मुहब्बत  हजारों तल्खियाँ न होती

जमाने में उडती तितलियाँ न होती


नहीं रोकता राह, बादल उजाला

सुबह सुर्ख़ियां में बदलियाँ न होती


इसी घर अहाते में छुप कर रहा है

यहाँ कौधती सी बिजलियाँ न होती


निगाहों समाने  लगे आजकल वो

भुलाना जिसे चाहु खुशियाँ न होती


कमा के रखे माल असबाब सारे

सदी एक लगे है, गिनतियाँ न होती


सुशील यादव दुर्ग


 


1212 212 1 2 2 1212 212 122

लगे रहो इस यकीन से, उर्वरा जमीन में बहार होगी

थको  नहीं नींद में पहाड़ों के राह कोई उतार होगी

ये आजमा लो बजी  सभागार में कभी तालियां जियादा

हजार बातो में एक काबिल-ए-गौर  उम्दा मजेदार होगी


 मसखरी युग


निगाहें हटा के ज़माना चला है

गरीबो यही तो बहाना चला है


बताओ कि है आदमी का वजूद क्या

घिरा आप ही खुद निशाना चला है


बचा के रखें क्या विरासत की खातिर

कगार आजतक आब-दाना चला है


मुकदमो में जीतें कि हारें बराबर

घड़ी-फैसला मुंसिफ-थाना चला है


हमे गुदगुदा के छिपा कौन बोलो

कहीं मसखरी युग पुराना चला है

सुशील यादव

१३६१८

 बुन रहे केवल अनुभव


मेरी नियति का नीड़ न जाने

पायेगा कब प्रिय कलरव ...?

तुम प्रकृति या भीड़ से जाने

लौट आओ कब बन उत्सव ..?


मेरी दुविधा हरदम

चर्चित रहती है |

कोलाहल की बाढ़ लिए ,

अधमरी

नदिया बहती है |

पीड़ा ऐसी मन की मानो

हो जननी उद्धत  प्रसव ...


प्रयोग कितना चल पायेगा

जगत को धोखा छल पायेगा

मर्यादा ,लाज बचाने खातिर

शब्द सार्थक,

निकल पायेगा ...?

संयोग के ताने-बाने में

बुन रहे केवल अनुभव |


नहीं शिकायत कुछ भी लेकिन

बात तो पूरी कर जाते .

गुम हुए थे मेले में

मिलन बेला क्या  मुकर जाते

अगर आता सुधरना हमको

अभिनय नहीं करते अभिनव


सुशील यादव

१६.जुलाई १८

 

अश्वस्थामा ...

मेरे अश्व सापेक्ष  हिनहिनाने पर
मुझे नाम मिला अश्वस्थामा |
-जन्म से मेरे माथे पर
थी एक मणि
-देव -दानव
शस्त्र -व्याधि
देवता नाग से हरदम
रहता था मैं निर्द्वन्द
निर्भय
#
मेरे पिता,
द्रोणाचार्य की
धनुर्विद्या की पाठ-शाला में
अर्जुन जैसे धनुर्धारी  का हुआ
ज्ञानार्जन |
मेरे पिता थे
राजकीय निष्ठा के प्रतीक
जिसने
कौरव-पांडव युद्ध में
लिया राज का पक्ष
और बने
कौरवों के तरफदार
सेनापति ...
#
-युद्ध भूमि पर
पिता के संहार ने
भीम पुत्र घटोत्कच.
घटोत्कच पुत्र अंजनपर्वा
द्रुपदकुमार . शालानिक , बयानीक
राजा जयास्व,श्रुताहू
और कुंती भोज के दस पुत्रों को
किया धराशायी ....
@
उसी युद्ध भूमि में
पिता को साथ देने का
अकल्पनीय सुख
और सौभाग्य पाने का
मैं भी रहा  साक्षी ....
#
हमे परोसी जा रही जीत को
देख पाने का साहस
पांडव-दल को लगाने लगा
अकल्पनीय और
क्षीण होने लगी उनकी
रण जीतने की लालसा ..
@
पांडव सेना को
तितर-बितर होते देख
श्री कृष्ण ने
युधिष्ठिर से
कूटनीति का सहारा लेने
को कहा ,
एक सूत्र वाक्य नियोजित हुआ
"अश्वस्थामा मारा गया, परन्तु हाथी"
इसमें 'परन्तु हाथी' शब्द  को धीमे स्वर में
बोले जाने पर दिया गया जोर...
एक अफवाह के तौर
फैल गया 'अश्वस्थामा मारा गया "
#
अश्वस्थामा के आत्मज
गुरु द्रोण ने
सुनी हुई अफवाह का
निराकरण करना चाहा
धर्मराज युधिषिठर से
सत्यापित करने की गरज से पूछा
तब , वही संवाद को
वैसे ही व्यक्त किया
-'अश्वस्थामा मारा गया '
"परन्तु हाथी"
शब्द'परन्तु हाथी ' को
युद्ध की  शंख ध्वनि की भेट
चढा दिए जाने का
षड्यन्त्र
कर गया अपना काम

@@
पुत्र-मृत्यु शोक से ग्रस्त
द्रोण
शस्त्र त्याग कर
शोक मुद्रा में बैठ गए
निशब्द ,निष्चेष्ट ,तभी
द्रोपदी के भाई धृष्टधुम्न ने
काट दिया उनका गला
एक शक्तिशाली सेनापति
युद्ध-भूमि में हो गया
शांत ...
दूसरी तरफ
मल्लयुद्ध में भीम ने
चीर दी
दुर्योधन की जांघ।।।
#
एक साथ दो योद्धाओं की शिकस्त
दो आत्मीय का विछोह
दो ध्रुवो का अस्त
कर गया सर से पाँव तक
अश्वस्थामा को अस्त-व्यस्त
#
पांडव के रुख में
जीत की  ध्वनि
गूँजते हुए  आकाश से
पिघले हुए शीशे की तरह
उतरने लगे
पिता की ह्त्या और
अपने राजा की अकाल दशा ने
बना दिया अश्वस्थामा को अधीर
@
उनके आहत ह्रदय में उठे
सवालो का उत्तर  है कहाँ ?
आघात न सह  सकने वाला मन
एकाएक कैसे हो जा है विक्षिप्त
द्रोणपुत्र के अलावा कोई जान पायेगा ?
@
"मेरे क्रोध की ज्वाला
बुझा सकोगे कृष्ण ...?"
@
मेरे पिता की ह्त्या की साजिश के
तुम  थे सृजनकर्ता
नीति के निर्धारण में
तुम नहीं थे क्या अग्रणी ...
क्या तुमने गजराज के मरने वाले
सूत्र वाक्य को
उस मुह से नहीं बुलवाया था
जिनसे सत्य  के सिवा और कुछ
सीखा नहीं था बोलना
धर्म के विरुद्ध किसी राह का
जो अनुशरण कर्ता
अनुगामी नहीं था जो
##
ठीक भटकाव के
इसी जगह पर,
क्रोध की आग में
उठा लिया उसने
'नारायण- अस्त्र'
और ठान लिया
मारना
जन्मे -अजन्मे
पांडव  के 'कुल-कारको'  को
इस नराधम शौर्य प्रदर्शन पर
सभी योद्धाओं ने
डाल दिए अपने हथियार
द्रोपदी के पाँच पुत्र और भाई
धृष्टधुम्न को उतार दिया
मौत के घाट..
एक विकराल सनाटा
पसर गया चारो ओर
##
द्रोपदी विलाप सुन
उसी सन्नाटे में
अर्जुन की एक प्रतिज्ञा गूंजी
किसी भी सूरत
अश्वस्थामा का
काटना है सर
#
इस प्रतिज्ञा को सुन कर
भागा अश्वस्थामा ,
श्रीकृष्ण सारथि बन
अर्जुन गांडीव धरे
पीछा करते रहे....
-कहीं आश्रय मिलाता न देख
चला दिया, अश्वस्थामा ने ब्रम्हास्त्र
जिसे चलाने की,
विधा भर थी उसे मालुम
लौटाना ब्रम्हास्त्र का
आता नहीं था उसे,
इस ब्रम्हास्त्र से बचने का
अर्जुन और उसके सारथी के सामने
न था कोई उपाय
फिर सारथि- मन्त्रणा से प्रेरित हुआ अर्जुन
प्रत्युत्तर
छोड़ना पड़ा उसे भी
बचाव में ब्रम्हास्त्र ,,,
अग्नि, दावानल, कोहराम
हाहाकार मच गया तब चारों ओर
जनता होने लगी दग्ध ,
गनीमत अर्जुन को
आती थी विद्या
ब्रम्हास्त्र को  लौटाने की
सो लौटा लिया |और ..
बच गए लाखो निरीह ...
तत्पर,बांधा ,
धर दबोचा अश्वस्थामा को
बंधे हुए दीन अश्वस्थामा को
देख कृष्ण ने कहा
हे  अर्जुन,
यूँ तो
धर्मात्मा ,सोये हुए
असावधान
मतवाले ,पागल, अज्ञानी , रथहीन
स्त्री तथा बालक को मारना
धर्म के अनुसार है वर्जित ...
परन्तु इसने धर्म के विरुद्ध
किया है आचरण
इसने सोये हुए निरपराध बालको की
की है ह्त्या .
यदि रहेगा तब भी जीवित
फिर दुहरायेगा कलंक-गाथा
तुम करो अपनी प्रतिज्ञा पूरी
ले जाओ द्रोपदी समक्ष कटा सर
इस युद्ध -द्रोही का |
#
अर्जुन को गुरुपुत्र पर प्रहार करने में
आई दया
उसने जीवित अश्वस्थामा को कर दिया
द्रोपदी सम्मुख
#
पशु सदृश बंधा मानव देख
द्रोपदी विवश हो गई
करुणा  आगे
गुरुपुत्र!
उस पर ब्राम्हण
फिर उसकी ह्त्या का पाप ...?
बाँध दिए इन तर्कों ने
हथियार उठाने को उकसाने  वाले हाथ
इनकी माता कृपी को मैं,
दे न सकूँगी कोई जवाब ..
वो मां जिसने
पुत्र मोह के चलते
नकार दिया सती होना ,,,
फिर यह भी तो,
मेरे मरे पुत्र
इनके वध से
लौटाए नहीं जा सकते ...?
कई बार
बुरे अपमान से आहात नेत्री
फिर एक बार भटक  गई
दुविधाओं के जंगल में..
#
... किन्तु भीम नहीं हुआ शांत,
आक्रामक थे उनके तेवर ...

-मध्यस्थ कृष्ण ने  दिया सुझाव
वैसे अपराधी  नहीं होता क्षम्य
दंड का वो भागी हो जरूर
रही बात ,
पतित ब्राम्हण को ,दंड देना है पाप
तो आतताई को मुक्त करना भी, है पाप
अर्जुन तुम वो करो जो है उचित,
अर्जुन ने काटे,
अश्वस्थामा के सर के बाल
फिर निकाल ली मस्तक की मणि
वो मस्तक मणि जिसकी औरा में था
गजब का तेज ...
मणिहीन मस्तक और केश विहीन सर ने
कर दिया उसे श्रीहीन ...
इतना लज्जित नहीं हुआ था कभी
अश्वस्थामा ....|
अश्वस्थामा आज भी हैं जीवित
श्रीकृष्ण के श्राप से
है वह  कुष्ठ रोग से ग्रस्त
अपने पापो के पीप-लहुँ को
रिसते हुए देखने को
आजीवन अभिशप्त
###

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर जोन १ स्ट्रीट ३
दुर्ग छत्तीसगढ़
9408807420
susyadav7@gmail.com

 

दानी पिता का ऋण
#
दधीचि
की तरह थे ,मेरे पिता !
हम भाइयों ने जब भी मांगा
हमारे हिस्से
की अस्थियां
वे चुपचाप
समय के अंतराल में
एक -एक कर
हम सब को  देते गए,
@
भीतर से खोखला  होते तक
बाटते  रहे उन अस्थियों को
कहते हैं जिनक़ी
मज्जा से समूचे शरीर के तंत्र को
जिन्दा रखने के लिए
बनता है रक्त....
पता नहीं क्यों ?
वे रक्त हीनता के शिकार होने से
रोक न पाते थे खुद को
हम भाइयों के बीच |
@
हमने , उनक़ी दी हुई अस्थियों को
धार करना कभी सीखा नहीं या
आता नहीं था हमें
वज्र बनाने का हुनर....!
@
जीवन की पाठशाला में
हो के एकाग्रचित्त
दुनियावी रण कौशल की
बारीकियां को जानने को
कोशिश नहीं की
पिता के रहते .
@
और उन्ही के रहते
महसूस नहीं हुआ किसी रणकौशल
की बारीकीयों का जानना,
सीखने  की ललक नहीं उपजी
किसी चक्रव्यूह का तोड़...
.....
@
मुश्किल से
अभिमन्यु  क़ी तरह
आता नहीं निकलना
अधूरी जानकारी के अभिशप्त रहे
हम भी पिता !...
@
-हम आपकी दी हुई
अस्थियों की आहुति
आपकी चिता को
साक्षी मान
इस मुक्तिधाम
आज  करने को  हैं
प्रतिबद्ध,....तत्पर
हम जीवन  रण  के
पराजित योद्धा...
@
स्वीकार करते हैं
कि,
हालात से तंग ....
होने के बावजूद
आपने हमारी परवरिश मे
अपने आप को समूचा झोंक दिया
हमारी खातिर
कहाँ कहाँ
कितना नहीं झुके आप ?
@@
ये कम नहीं होगा,
आपको अनंत काल तक
मन मे समाधि बना
हम पूजते रहें
उन अस्थियों के
ऐवज ....?
@@

 आवत साल के सपना...

*

सब झिन रस्ता, अपन रेंग दीन

मोला ,तहीं अगोरे होबे


ए बस्ती ले ओ गांव तक 

जरत  भोभरा,  पीपर छांव तक

आजू- बाजू झांक के सुरता,

आमा पक्का तोड़े होबे

*

मड़ई मोला बुलावा भेजे

नेवता घलो पठाये

दाई - भैय्या रोकिन - छेकिन

तैं तुनुक मिजाज रिसाये

रहचूली  चक्कर जईसन धुर्रा ,  गोड़ अंगठा  कोड़े होबे

रतिहा के नींद नंदावत होही

झांके बर संसो आवत होही

बईठे लेवैय्या तोर सुध खातिर

गोड अब्बड खजुवावत होही

अपने मन में हांसत फिक्का

चद्दर लाज के ओढ़े होबे

*

पाछु साल के  बिच्छल रद्दा 

कईसनो  करके पार लगायेन 

आवत साल के कान म झुमका

पहिनाये सेती परण सजायेन 

अपन सपना के चुनरी बर

बड़ चंदा - तारा जोड़े होबे

*

सुशील यादव दुर्ग 

30दिसम्बर 21

पंथी धुन में...

@

 घर बार छोड़ के

मोह माया तोड़ के

 आगेव मेहा जोड़ी मोर

मन निबुआ निचोड़ के....

राखे  रहिबे पिरीत के

धागा ल ग जोड़ के....

धागा ल ग जोड़ के.....


 @@

घर बार छोड़ के

मोह मया  तोड़ के

काबर आएस मोर करा

मन निबुआ निचोड़ के

तोर ददा भईया बना दी ही

मोला बिना गोड़ के..

मोला बिना गोड जोड़ी

मोला बिना गोड के

@@


सुशील यादव

 चार दिन जिनगी चहक लेते तैं

चार खुट बनठन चमक लेते तैं


लकर धकर  बोय तें संसो पताल

गोंदा बने बोते महक लेते तैं


करम के बोरे बासी हे सिटठा

नुनछुर करे नून -नमक लेते तैं


लुकाए  बीज़हा ,  किरहा घुनहा

सुरता के सुपा फाटक लेते तैं


किसान बर दू अकाल परे भारी

करम  होतीस मेचका छपक लेते तैं


बईहा संग कती तइहा रेगा गे

अंगना म सियान फफक लेते तैं


राख़ माटी सिरा जाबे कहू दिन

थोरकिन थिरा भभक लेते तैं


--

सुशील यादव ::7000226712







कतेक हमर अघाना जी

@

कतका हमला खाय बर मिलथे,

कतेक हमर अघाना जी

हकन के काम करइया हमन   ,

नइ जानेन कोनो  बहाना जी

@

तुहरे बोली- बानी तुहरे ,

तुहरे झंडा-डंडा होवन

तुहर तरक्की नार चढ़े,

 बीजा वहू हमी-मन बोवन

हमर कन्धा  रखेव चलाएव,तुमन अपन निशाना जी

@

हमर खेती तें अधिया मालिक ,

हमर छाती मूंग दलईय्या

तुमन नँगा-नँगा ले जाथव,

हमर भाग के पानी -पसिया

धोवन जइसन होगेन हम,काखर संग पारन हाना जी

@

हमर भाग के नाप-जोख म,

तुमला सबो घुरवा लगथे

तुंहर नीयत-सफेदी हमला ,

काबर करिया- भुरवा लगथे

बात -बुलेट बइठा देव हमला  ,छुटिस हमर ठिकाना जी

@

सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर दुर्ग

21.4.19

 

पूछ मेरा ठिकाना बचा
बाढ़ डूबा खजाना बचा
##
खूब पानी भेट जो चढ़ा
शाख कब वो पुराना बचा
##
आंधियां लें उड़ी सादगी
मुफलिसो को सजाना बचा
##
ऐंठ  की  जब जली रस्सीयां
तिनका- तिनका जमाना बचा
##
क़ोई ना हो किसी से जुदा
हाथ किसके नजराना बचा
##
जिंदगी की क़वायद यही
भागते जां निभाना बचा
## A
यूँ गले भी मिला तो करो
जोश मे कब शर्माना बचा

@@#

 सरसी छंद में परिवर्तित दोहे 2

*

हमको सिखा गए हैं जाते ,ये गोरे अंग्रेज।

खूब करो सरहद रखवाली  , रख तलवारें तेज ।।

*

आप कभी हिम्मत ना हारें,  साहस ना दें छोड़ ।

बात भला क्या एक करोना  , जग में रोग करोड़ ।।

*

कर गया हाथ हजार वाला,उल्टे सीधे काम ।

मुंह ढाप के अब है सोना ,दर्शन दुर्लभ राम ।।

*

यहां भला हो किसे शिकायत  ,कोई क्यूं नाराज। 

है नगरी सारी  माया की।  ,सब के सर में ताज ।।

*

 संभावना बढ़ती बारिश की, बाढ़ नदी संकेत।

देखूं तुझको किसान बैठा ,कौन देखता खेत।।

*

दांवपेंच सब है कानूनी , फसलों को आघात।

घिसता  किसान अपनी जूती ,पागल के अनुपात ।।

*

 मारा हुआ वक्त के हाथो ,ये बचा बदनसीब।

है जिंदगी लाचार वंचित ,गिनती बढ़ा गरीब ।।

*

सुशील यादव


जाते हुए सिखा गए,ये गोरे अंग्रेज।

रखवाली सरहद करो, रख तलवारें तेज ।।

*

हिम्मत कभी न हारिए,  साहस भी मत छोड़ ।

एक करोना बात क्या, जग में रोग करोड़ ।।

*

हाथो हजार कर गया,उल्टे सीधे काम ।

मुंह ढाप  सोया अभी,दर्शन दुर्लभ राम ।।

*

किसे शिकायत हो भला ,कोई क्यूं नाराज। 

माया नगरी खेल में,सब के सर में ताज ।।

*

बारिश की संभावना, बाढ़ नदी संकेत।

तू किसान बैठा यहां,कौन देखता खेत।।

*

दांवपेंच कानून के , फसलों को आघात।

घिसता किसान जूतियां ,पागल के अनुपात ।।

*

हाथ वक्त मारा हुआ ,ये बचा बदनसीब।

वंचित है लाचार है ,गिनती बढ़ा गरीब ।।

*

सुशील यादव 

न्यू आदर्श नगर स्ट्रीट 3 जोन 1

 दुर्ग छत्तीसगढ़


 आदमियत की पहचान...

XxX

मैं खुद अपने आप का मुखबिर सा हो गया हूँ यायावर हूँ आजकल मुसाफ़िर  सा हो गया हूँ 

XxX

दरख़्त था जो शातिरों को भी छाँव देता रहा

रहमत के नाम से जग - जाहिर सा हो गया हूँ 

XxX

लोग  सभी, वजूद मेरा , नकार के, निकले यहाँ-वहाँ

लगता उनके उसूल से, लगभग, बाहिर सा हो गया हूँ

XxX

कितनी बार, आजमाने की,मुझको हुई कोशिशे

मतलबी दुनियां देख यहाँ, काफ़िर  सा हो गया हूँ

XxX

तुम्हारे हाथ आऊं,कि गैर के हिस्से गिना जाऊं तेरे कुनबे मे लौट कर , वही फिर सा हो गया हूँ

XxX

आदमियत की पहचान,जरा- जरा होने लगी

ठोकर  खा सम्हलने मे अब, माहिर सा हो गया हूँ 

XxX

मैं भी लगा था उस्तादों की कतार मे, उम्मीद से

जीतूंगा जंग मगर, आदमी आखिर सा हो गया हूँ

XxX

यूँ तो ख्याल तेरा दुरुस्त रहता है यार आजकल

शक के दायरे मे मैं ही बस शातिर सा हो गया हूँ

XxX

बंन्द हूँ, बेजान हूँ, अब तक किसी ने सुधारा नहीं  चौराहे पर नगर घड़ी मैं , स्थिर सा हो गया हूँ

XxX

 खजाना ईमान का खोल के कभी देखा भी करो

बेशकीमती हीरा -मोती जवाहिर सा हो गया हूँ

XxX



सुशील यादव दुर्ग

 दीवार साझा....


है कौन जो तन्हाई मेँ सदा देगा 

बन के सबा मुझको जरा हिला देगा

Q

 क़ोई सुने ये तल्ख़ सी हकीकत को

किस जुल्म की मुनसिफ़ मुझे सजा देगा

Q

तुम जो रहो गर उम्र भर करीब मेरे 

दिनरात चुटकी मेँ समय बिता देगा 

Q


हिलती हुई परछाई से रखो दूरी 

बेमौत कब दीवार यहीं टंगा  देगा

Q

जिस राह पर होती रही मुलाकातें 

पहरा क़ोई उस मोड़ पर बिठा देगा 

Q

गुमनाम अँधेरे से हम निकल  आये

हालात जीना,भी हमें सिखा देगा

Q

अंजान सा बैठा छिपा हुआ नासूर

कब हरकतों आकर कहीं डरा देगा

Q

मत सोचना, नक्शे कदम  मेरे चलना

ले जा बियाबान एक दिन गिरा देगा 

Q

तेरी तलब है हमको मगर करें तो क्या

बस तंज ही काफी इसे डुबा देगा 

Q

मजबूरियां है या समय फरेबी  सा 

दीवार साझा बीच कल उठा देगा 

Q

टीकमगढ़ 11.7.22

 लोग  सम्हलने नहीं देते

1222 1222     1222     1222

हमारी नजर में लोग हमे सम्हलने नहीं देते 

यहां माकूल सा माहौल तो बदलने नहीं देते 


न जाने लौट आता सोच क्या,दिल का बसन्त यहाँ 

तेरी रहगुजर होकर, कुछ हैं , बस  निकलने नहीं देते 


न कायदा है न कानूनी फिकर देखो जिसे आजकल 

हुकूमत के उसूलो से हमे बाख़बर हो चलने नहीं देते 


तलब होती, तेरे दीदार की मायूसियों में जब 

बचा के नजर सैलाब आंख में  उतरने नहीं देते


समय मिले तो ढूंढना

 

समय मिले तो ढूढना .....
##
सुख की चादर तान के, सोए रहते आप
समय मिले तो ढूंढना , आस्तीन के सांप
#
सभी समझ को भूलकर,बातें रख लो  याद
हरा -भरा भी सूखता, बिन मिट्टी बिन खाद
#
शनै-शनै छोटा  हुआ, संयम का आकार
अब तो केवल क्रोध का, फैला खरपतवार
#
छोटा अब लगने लगा, रोटी का अनुपात
आश्वासन की बेड़ियां नियमित शाम-प्रभात
#
करते-करते तंग हूं, मैं अपना किरदार
अब तो मेरे हाल पर, मुझको छोडो यार
#
गांधी मिलकर गोडसे, पूछते कुशलक्षेम
इसे नोट महिमा कहें, या मानवता प्रेम
#
शायद मेरी साधना,निहित कहीं है खोट
हर ऊंचाई नापकर,पाते रहता चोट
#
तेरा होना इतर सा ,देता था एहसास
तेरे बगैर यूं लगे, चला गया मधुमास
#
कैसे जाने  फैलता  ,जीवन का आकार
साँसों से होता नहीं ,घड़ियों का व्यापार
##
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग....

आओ  देखें चाहत के सपने
तेरे राज में राहत के सपने

कैसे जीते लेकर लोग यहाँ
बद -जुबान आदत के सपने

मुँह मेँ हो केवल राम- विराजे
रखते बगल अदावत के सपने

अपनों ने उन को छोड़ दिया है
लेकर सोच बगावत के सपने

काश कि मैं भीअब देखा करता
गाफ़िल नींद मुहब्बत के सपने

@#

खोज जारी है

 खोज जारी है ...


अब दुश्मन जाने पहचाने हैं 

यारो हम भी बहुत सयाने हैं 


है आज-जुदा फिर राम-कहानी 

समझौतों के स्याह निशाने हैं


मुस्कान पकड़ में कम आती है

गम के चौतरफा अफसाने हैं  


 परिचय  अपना, मैं तुमको क्या दूँ

 चर्चित तो नाकाम बहाने हैं


सबने जी भर  तौला-परखा मुझको 

गुजरे - बीते इतिहास  पुराने  हैं 


दिल भीतर खोज अभी है जारी 

दाल अभी तो बहुत गलाने हैं 


सुशील यादव

 हमारे शब्द......

@

ना जाने

किन पैरों पर

खड़ा रहता है आसमान

दिन -रात बिना थके हुए

?

मेरे - तुम्हारे शब्दों को

बैसाखी की होती है जरूरत

.....,

हम, यहाँ -वहाँ,

अनाप -शनाप

बेहूदगी मेँ बोलते हैं,

या कहो...

सहानुभूति की किताब

उस जगह से खोलते है

जहाँ पृष्ठ भर

हासिये क़े सिवा

होता नहीं कुछ.....

@

हमी,जिद्दी, सिऱ- फिरे

इन हाशियों मेँ भी

तलाशते हैं

क़ोई ईश वंदना

किसी बुद्ध की सोच....

जैसे,

न जाने किन पैरों पर

खड़ा रहता है आसमान...?

काश....!

हमें

बता दिया गया होता

आसमान कुछ नहीँ

एक हवा है-

धुआँ है-

शून्य है....

और हवा को

धुँआ को

 शून्य को

क़ोई बैसाखी

चाहिए भी नहीँ होती?

वैसे ही वो

अपने शाश्वत सत्य पर

टिका रहता है

दिन -रात बिना थके हुए.....

काश हमारे शब्द

हवा की तरह

धुँआ की तरह

 शून्य की तरह

होते...

अपने मूल्य पर

टिके रहने को

जरूरत नहीँ होती उनको,

बाजार मेँ बिकने वाली

बैसखियों की.......


@@@#


सुशील यादव

तमाचा वक्त का

 

1222 1222 1222
तमाचा वक़्त का...
#
किताबों में  कहां अब  फूल मिलता है
बचे लोगों  ले दे क़े उसूल मिलता है
#
सभी पाशे चले शकुनी की अब चालें
जिसे मौका सही अनुकूल मिलता है
#
विरासत को बचाने की कवायद हो
वगरना मशवरा उल जुलुल मिलता है
#
नहीँ है कायदे से कोइ रखवाला
सियासत सादगी अब धूल मिलता है
#
क़ोई कांटे बिछा क़े जब चला जाता
तमाचा वक़्त का माकूल मिलता है
#
सुशील यादव

मालूम किसे

 

2212  2212   2212 1222

मालूम किसे....
@
माथे  शिकन, या चेहरा चाहे
तनाव आ जाये
सच को कभी ना बेचिये
लाखों का भाव आ जाये
@
लोगों को तुम हो तौलते
अपनी गरज से आए दिन
मकसद बिना कब पूछते,
जब ना चुनाव आ जाये
@
उनके इशारों में  फिजूल
लाखों लुटा रहे हो क्यूं?
है बात तब,
घर,ईंट, पत्थर से लगाव आ जाये
@
क्या छोड़ क़े कुनबा,
जियोगे जिंदगी, फकीरो की
अब सोचना, इन फैसलों में
फिर कसाव आ जाये
@
बारिश भरोसे ये नदी तो,
उफनती रही हरदम
मालूम किसे  किस  तरफ ढाल
कहां रिसाव आ जाये
@
सुशील यादव दुर्ग

न्यू आदर्श नगर,जोन 1 स्ट्रीट 3 A
दुर्ग छत्तीसगढ़
मोबाईल :7000226712

@@
किताबों में दबे फूल का मौसम ..
##
ख्वाबो में खुशबू  ख्यालो ललक नहीं है
तेरी आँखों में पहली सी चमक नहीं है
#
आती कभी दूर से जो आवाज तेरी
पास वहां देखू तो गूंज गमक नहीं है
#
बीमार बंद खिड़की, खामोश दरबाजे
गलत पते पर लिखा है खत  शक नहीं है
#
किताबों में दबे फूल का मौसम गया
रिवाजो  खिले फूलों  में महक नहीं है
#
मेरी नाकामियां आओ घेर  लो मुझको
पहले सा टूटने में अब झिझक नहीं है
##
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर जोन वन स्ट्रीट 3 दुर्ग छत्तीसगढ़
7000 226712

मौसम

 

मौसम....
#
मेरे चाहने से कब बदला है मौसम
तेरे कहने पे जो चलता है मौसम
#
घुटने - घुटने पानी  जब नावें चलती
ठहरा - ठहरा  तब तो लगता है मौसम
#
नदिया बीच  भंवर  मेँ फँस कर ये जाना
खुद भी कैसे रह लेता तन्हा मौसम
#
एक दूजे की करते पूछ परख तब तक
तिरपाल तले हो कुनबा सूखा मौसम
#
सालों बाद भटकते आया है जाने
कुछ तिलस्मी, फिल्मी कुछ गोया मौसम
#
सुशील यादव

कातिलों क़े शहर में....

 

2122 2122 2122
कातिलों क़े शहर में.....
#
फूल की खुशबू  कहीं तो चमक क़े लिए
होश वालों की लड़ाई है नमक के लिए
#
वक़्त ने देखा जहर नफ़रत का घुलता
बोलते क्या- क्या रहे तुम सनक क़े लिए
#
आज मायूसी मे तेरी याद आई
आज छलका दर्द मीठी  कसक के लिए
#
एक हम  जो दे रहे हैँ आप  दस्तक
यूँ सभी लापता हैं शफक क़े लिए
#
कहने को  बाक़ी बचा  क्या पास मेरे
कातिलों क़े इस शहर में रमक़ क़े लिए
#
रहगुजर में बैठ कर देखना कभी तुम
आस तो मिटती कहां इक झलक क़े लिए
#
मयकदे में जो नसीहत पी गया हो
खैर उसकी क्या मनाएं शतक क़े लिए
#
शफक = क्षितिज की लाली
रमक़ = रही सही जान, थोड़ी सी जिंदगी
#

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर,जोन 1 स्ट्रीट 3 A
दुर्ग छत्तीसगढ़

कुछ छूट गया

 क़ोई शक ओ शुबहा नहीं रहा

पहले सा तुझपे भरोसा नहीं रहा


आसमा से परिंदे  हुए गायब

आसमा अब नीला नहीं रहा


कीमती हो  गई जब से शराब

मयकशी नशीला नहीं रहा


आहिस्ता आहिस्ता दूर सब हुए

पास क़ोई कबीला नहीं रहा


बचपने की वो फ़िसल पट्टी

बालू- बजरी  टीला नहीं रहा


सुशील यादव दुर्ग


बात तल्ख़ सी

 

2212  2212 222
बात तल्ख़ सी
#
मेरी जुबां जब भी फ़िसल जाती है
कुछ बात तल्ख़ सी बस निकल जाती है
#
खामोश हो जीने का मकसद भी क्या
खामोशियाँ गम में बदल जाती है
#
बैसाख या आषाड़ सावन भादो
मजबूरियां मौसम निगल जाती है
#
उसको तराशे  थे हमी जी जान से
हीरे की सूरत अब तो खल जाती है
#
लाखों की  चाहे हो कमाई दौलत
सरकार की नजर आजकल जाती है
##
सुशील यादव

आजकल जाने क्यों

 

आजकल जाने क्यों.....
#
एक गलत सोच, आखों की स्याही बदल देता है
समूचे शहर को बारूदी , तबाही बदल देता है
#
फर्क पड़ता नहीं तुम्हारे ऐशो- आराम में तनिक
आंकड़ो की मुनादी ही बस गवाही बदल देता है
#
रिश्तों को निभाना इतना नहीं  आसान आपस में
जुबान की जरा तलखी आवाजाही  बदल देता है
#
मजबूरी ये कि हम बदल नहीं सकते खुद पडोसी
सामने का मुल्क बातों की कड़ाही बदल देता है
#
छीन कर ले जाता था कोई मेरा चैन -करार वही
आजकल जाने क्यों तरीका उगाही बदल देता है
#
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर,जोन 1 स्ट्रीट 3 A
दुर्ग छत्तीसगढ़
मोबाईल :7000226712
2.....

गीत

 

गीत
उम्र क़े इस पड़ाव में.....
#
दर्द जहाँ मैं टांगा करता, टूटी आज वो खूंटी लगती
सारे संबल सभी आसरे,बिना असर की बूटी लगती
##
लेकर चलना उसी गली में,यादों का भरता हो मेला
बचपन खेल घरोंदे वाले,नाव डूबता रहूँ अकेला
0
अब उम्र क़े इस पड़ाव में, कितनी बातें छूटी  लगती
##
अरमानों जब पँख नहीं थे, आकाश लगा करता छोटा
उड़ने की जब ताकत आई,व्यवधानो ने अक्सर टोका
0
शेष नहीं कुछ कहने जैसा,गुम नगीना  अंगूठी लगती
##
इन बाजुओं का दम है,पहले जैसा आज भी क़ायम
आज भी  मिलने की चाहत,रत्ती भर उत्साह नहीं कम
0
चाहत की अब दुनियां तुझ बिन खाली - खाली झूठी लगती
##
उमंग उजालों की सजती,सदा रहे पहचान दिवाली
मुस्कान बांटते जाना यूँ,तमाशबीन  बजा दे ताली
0
मंहगाई की हाथ थमी हो ,विपदा की लो सूटी लगती
##
सुशील यादव

छोड़े हम बैठे होते,,,

 

छोड़े हम बैठे होते,,,,,

संभव हमको दिखता सब,आसान अगर हो जाना
छोड़े हम बैठे होते, बेमतलब  का हकलाना
#
हमको समझे होते,ऊपर से नीचे तक जिस दिन
मुमकिन उस दिन हो जाता,चाहत का और ठिकाना
#
बारिश का मौसम भी,केवल खामोशी से आता  है
यादों के जंगल भीतर तक,  पैरहन भिगा जाना
#
लेकर अपनी सूरत रोनी सी कल से बैठे हैं
खुशियों का लगता, इस दीवाली लौट नहीं आना
#
सुशील यादव

अलगू जुम्मन का rona


122२    1222  1222
वही बस्ती, वही टूटा  खिलौना है
वही अलगू,मिया जुम्मन का रोना है
#
बना जाते सलीके से मुझे लायक
ये मिटटी अगरचे ढूढो कि सोना है

कहाँ बनते यहाँ रिश्ते सलीके  से
किसे मोती कभी आया पिरोना है
#
वफा के बीज डालो ये पता तो चले
खफा मौसम रहा या नसीब बौना है
#
उसे पैगाम दे दो, खैरियत है मेरी
मिसाल के तौर सुइयां जिसे  चुभोना है
#
तरीके से मिला करती खुशी कल तक
अभी उस दौर का ख़्वाब ही सलोना है
#
सुशील यादव दुर्ग छत्तीसगढ़

वादों की रस्सी

 

वादों की रस्सी मे तनाव आ गया है
मंदिर के चर्चे हैं चुनाव आ गया है

गुस्ताख स्वागत  माफ करना हुजूर
चेहरे पे मसलन खिचाव आ गया है

रोगग्रस्त थी उफ ये नदी पांच साल से
अब की बारिश कैसा बहाव आ गया है

ये लोग उठाने से कतरा रहे परचम
इरादों मे इनके  बदलाव आ गया है

खबर हमें भी थी कोई लहर उठेगी
समुन्दर के रस्ते कटाव आ गया है

लादेन जा रहा था अपने पैरो चल के
पुतिन जो मिला ठहराव आ गया है
😁
हुकूमत की ऐसी लग गई है आदत
सच लगे बेचने कि भाव आ गया है
##

चौपाई

 चौपाई :बरसात में ....


पानी-पानी, आया पानी |

 गर्मी दूर भगाया पानी ||

सबने खूब निकाले छाते |

 रंग-बिरंगे, काले छाते ||


सुख की गिनती कौन करेगा,

अब जो भीतर भीग डरेगा | 

यूँ ना देखी  होगी बारिश ,

सहमी-विनती और गुजारिश |


लो कृषको का मन हर्षाया,

मेघ-घटा, उमड़- घुमड़ आया |  

हल लेकर ये  खेतों निकले,

मिटटी कोना- सोना पिघले |


हो जाती हर शाम-सुहानी,

देखो छेड़  अतीत कहानी |

बचपन की नावों का मिटना ,

भीगे-भीगे  आकर  पिटना | 


बारिश पानी बहता जाता ,

सूखा-नाला भी उफनाता |

किन्तु हमी-हम  ठहरे होते ,

नम रिश्ते भी गहरे होते |


सुशील यादव दुर्ग

खजाना

 

1222 1222 1222 22
गज़ल
#
जमीनों में छिपा रक्खा खजाना मिल जाए
जुदा बरसों कोई साथी पुराना मिल जाए
#
हमें ख़त क़े नहीं मिलते पढ़े होने का सबूत
फकत मजनून भाँपे हों,हर्जाना मिल जाए
#
नहीं मिलते कभी शहरों सहज रिश्ते जन्मों क़े
बनावट क़े विज्ञापन कुछ बहाना मिल जाए
#
गली में जो गुजरती शाम क्या कहने उनके
मेरी तकदीर मौसम वो सुहाना मिल जाए
#
मुकम्मल ही नहीं खाना -बदोशी क्या कीजे
खुदा की बारहा रहमत ठिकाना मिल जाए

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग छत्तीसगढ़
7. 6.22

इस जंगल मैं

 इस जंगल में आग न लगती

**

ये दिन काश हमारे होते

हम आंखों के तारे होते


दूर न होती मंजिल अपनी

पास कहीं दिल हारे होते


बचपन जाओ ढूंढ के लाओ

अक्ल के दुश्मन सारे होते


अधिकार बिना अब क्या जीना

छीन झपट के चारे होते


तुम भी अफसोस किया करती

दांव लगा जब हारे होते


हमको डूबना आ ही जाता

यदि मालूम  किनारे होते


निकले थे घर छांव छोड़कर

ऐसे ही बंजारे होते


खुली किताब समझ के पढना मन 

चाहे वारे न्यारे होते 


इस जंगल में आग न लगती

कुछ दिन और गुजारे होते


खौफ जदा पेशानी में भी

मानिंद बर्फ   नजारे होते


हमको लगता तेरी खातिर

हम नजदीक सहारे होते


@@@

वो जो

 

2122 2122 1222
वो जो मोहब्बत की तकदीर लिखता है
किसी-किसी के हाथ जागीर लिखता है
#
कोई चाहे कुछ गरम कोई ठंडा यूं
मांग के माफ़िक वो तासीर लिखता है 
#
साथ चलते भाँप लेते हवा का रुख
नाम उनके वक़्त ही समीर लिखता है
#
  हो जिसे अँधेरे का खौफ जीवन भर
  बस खुदा ही समझ तनवीर लिखता है  
#
हम रहें जिसे पाने आवेग  से आतुर
ये जमाना अब हमें अधीर लिखता है
#
दर्द के हर कोण की नाप ले जीता
वो ख़लाओ तेरी तस्वीर लिखता है

सुशील यादव

 नज्म : :हर्फ -हर्फ फूल 


अब तो वो कतरा  के निकल जाता है

जाने क्यूँ खुद शरमा के निकल जाता है


अब काटता  चक्कर  नहीं कहीं गली के

अगर मिले नजर चुरा के निकल जाता है


उसकी हालत पे मै तरस खाऊं या वो 

लम्हा लम्हा  सता के निकल जाता है


काटने दौड़ती है रात अजीब तन्हाइयाँ 

जो सिल्वट बिछा के निकल जाता है


मुझे मालुम है अपनी खता खामियाँ

यादें यूँ जंगल ऊगा के निकल जाता है


किताब मे नजर गड़ाऊं भी  मैं कहाँ

हर्फ हर्फ फूल दबा के निकल जाता है


@@#

Friday, 15 July 2022

दर्द का दर्द से

 

2122 1222 2122 22

दर्द का दर्द से जब रिश्ता बना लेता हूं

इस बहाने सभी को अपना बना लेता हूं

@

ख़ास कुछ हैं मुकर जाते बात से अपनी

आदमी मान के अलग रास्ता बना लेता हूं

@

मज़हबी दौड़ में जा के मुल्क क्या हासिल करे

खौफ में अब धमाका ज्यादा बना लेता हूं

@

धूप में ढूढ़ता मै साया किसी बरगद का

छाँव क़ोई कसीदा मन का बना लेता हूं

@

फूल से है मुझे रंज खुशबुओं से परहेज

याद में बारहा क्यूं बगीचा बना लेता हूं

@

बहलता अब नहीं आपे से जमाना बाहर

खुश वहाँ हो सकूँ घरोबा बना लेता हूँ

@

सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर

zone-1 स्ट्रीट 3 दुर्ग छत्तीसगढ़

7000 226712


---------- Forwarded message ---------

From: sushil yadav <sushil.yadav151@gmail.com>

Date: Mon, May 9, 2022, 6:46 PM

Subject: ग़ज़ल

To: ahazindagi <ahazindagi@dbcorp.in>



2122 1222 2122 22

दर्द का दर्द से जब रिश्ता बना लेता हूं

इस बहाने सभी को अपना बना लेता हूं

@

ख़ास कुछ हैं मुकर जाते बात से अपनी

आदमी मान के अलग रास्ता बना लेता हूं

@

मज़हबी दौड़ में जा के मुल्क क्या हासिल करे

खौफ में अब धमाका ज्यादा बना लेता हूं

@

धूप में ढूढ़ता मै साया किसी बरगद का

छाँव क़ोई कसीदा मन का बना लेता हूं

@

फूल से है मुझे रंज खुशबुओं से परहेज

याद में बारहा क्यूं बगीचा बना लेता हूं

@

बहलता अब नहीं आपे से जमाना बाहर

खुश वहाँ हो सकूँ घरोबा बना लेता हूँ

@

सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर

zone-1 स्ट्रीट 3 दुर्ग छत्तीसगढ़

7000 226712


छोटी उम्र मे


2221 2221 2221 212


छोटी उम्र में बड़ा तजुर्बा.....


जाकर दूर, वापस लौटना, अच्छा नहीं लगा

रिश्तों को, अचानक तोड़ना,अच्छा नहीं लगा

# $#

मातम भी जताने लोग अब इस तरह आ रहे

रस्मों को तराजू-तौलना अच्छा नहीं लगा

# $#

काबिल हो अभी माफी के दीगर बात साहबान

गिरना आसमा तेरा कभी अच्छा नहीं लगा

# $#

तुम सम्हाल लो सल्तनत ये बेखौफ आजकल

कल तो और का है बोलना, अच्छा नहीं लगा

# $#

गम के दौर में कब चलन से बाहर हुआ 'सुशील'

खोटा सिक्का बन के पिघलना अच्छा नहीं लगा

# $#

लाखों तक रटी गिनती, करोड़ कभी सुने कहाँ

छोटी उम्र में बड़ा तजुर्बा, अच्छा नहीं लगा

# $#

अपनी हैसियत अनुसार हम रहते यहाँ कहां

मन का ठोकरों से बहलना अच्छा नहीं लगा

@@

सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर zone-1 स्ट्रीट 3

दुर्ग छत्तीसगढ़




मेरे शहर me

 


मेरे शहर में

#

दूध का मेरे शहर क़ोई धुला नहीं है

आदमी सा आदमी मुझको मिला नहीं है

#

यों कभी देखे ज़रा आता क़रार तुझे

और से तू मानता हूँ ख़ुद जुदा नहीं है

#

आसमां से खींच कैसे बाँट दूँ तुझे भी

मेरे हिस्से और तो हासिल अब हवा नहीं है

#

हो क़फ़स में क़ैद रहते हम घरों में यूं

आदमी होने का सपना जो बुना नहीं है

#

बाद जाने के बहुत तू याद भी रहे यूँ

क्या कहूँ जाना दिलो -जा अखरा नहीं है

#

हो गए हालात काबू से हमारे परे

तजुर्बे में और बड़ा सा आकड़ा नहीँ है

#

क्यूँ उठा लाई हो खुशबू में पुराने दिन

मैंने जिसको आदतो क़ोई गिना नहीँ है

#

भाइयों से ख़ूब लड़ के थक गया इसीसे

सोचता हूँ अब अदावत से फ़ायदा नहीं है

#

पाँव भारी ये अंगद क़े जिधर भी बढ़ चले

शक की बुनियादें हिली हमको पता नहीं है

#

बारूदी धुए में शहर को बाँट दो तुम

मैं रहूँ बीमार मेरी मेरी दवा नहीं है

##

सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर दुर्ग छत्तीसगढ़

मोबाइल 7000 226 712

##


जी बहलता नहीँ

 

जी बहलता नहीं.....

*

क़ोई गड़ा हमको खजाना दे दो

कुछ मुस्कुराने का बहाना दे दो 

*

जी बहलता भी अब नहीँ ख्वाबों से 

यादों का मंजर सब पुराना दे दो

*

साथी निभा ले साथ भूला वादा 

या फासलों वाला जमाना दे दो

*

काटे सितम में सादगी क़े दिन -रात

लाकर कहीं से वो सताना दे दो

*

ताबीज पाने की तलब तुमसे क्या

बीमार को लेकिन ठिकाना दे दो

*

बोलो कहाँ मौजूद हो तुम भगवान 

हर आदमी में सनक सयाना दे दो 

*

बातों क़े झगड़े यूँ नहीँ सुलझेंगे

इतिहास में दर्ज अफ़साना दे दो

*

ये कातिलों की बस्तियों में शामिल

लाखों तबाही उसे निशाना दे दो 

**

सुशील यादव

 न्यू आदर्श नगर दुर्ग छत्तीसगढ़

 मोबाइल 7000 226 712


बात तल्ख़ सी

 😘

1.

2212 2212 222

बात तल्ख़ सी

#

मेरी जुबां जब भी फ़िसल जाती है

कुछ बात तल्ख़ सी बस निकल जाती है

#

खामोश हो जीने का मकसद भी क्या

खामोशियाँ गम में बदल जाती है

#

बैसाख या आषाड़ सावन भादो

मजबूरियां मौसम निगल जाती है

#

उसको तराशे थे हमी जी जान से

हीरे की सूरत अब तो खल जाती है

#

लाखों की चाहे हो कमाई दौलत

सरकार की नजर आजकल जाती है

##


सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर,जोन 1 स्ट्रीट 3 A

दुर्ग छत्तीसगढ़

मोबाईल :7000226712


@@

2.


2212 2212 2122

सनसनी....

अब तो यहाँ इस बात की सनसनी है

हाथों में पत्थर, और जान पे बनी है

#

हमने तराशा हीरे की शक्ल-सूरत

लिपटी वहीं पे तरबतर चाशनी है

#

सरकार हैं क्यूँ आग बबुला से मेरे

दब कौन सी नस गई, चढ़ी झुंझुनी है

#

खामोश हो जीने का मकसद यहाँ क्या

आसार बारिश ,मेघ परतें घनी है

#

ये फैसलों क़े बाल सारे हैं सफेद

राहत यहां कमजोर सी संगनी है

#

तुम हो कहां सब आजमाने लगे हैं

उम्मीद की हर किरण अब अनमनी है

#

रहबर मिले तो मंजिले खूब आसान

वरना तो खुल्ले आम अब रहजनी है

##

सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर,जोन 1 स्ट्रीट 3 A

दुर्ग छत्तीसगढ़


मोबाईल :7000226712


मौसम


मौसम....
#
मेरे चाहने से कब बदला है मौसम
तेरे कहने पे जो चलता है मौसम
#
घुटने - घुटने पानी  जब नावें चलती
ठहरा - ठहरा  तब तो लगता है मौसम
#
नदिया बीच  भंवर  मेँ फँस कर ये जाना
खुद भी कितना रह लेता तन्हा मौसम
#
एक दूजे की करते पूछ परख तब तक
तिरपाल तले हो कुनबा सूखा मौसम
#
सालों बाद भटकते आया है जाने
कुछ तिलस्मी, फिल्मी कुछ गोया मौसम
#
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर,जोन 1 स्ट्रीट 3 A
दुर्ग छत्तीसगढ़
मोबाईल :7000226712

हमारे shbd

 

हमारे शब्द......

@

ना जाने

किन पैरों पर

खड़ा रहता है आसमान

दिन -रात बिना थके हुए

?

मेरे - तुम्हारे शब्दों को

बैसाखी की होती है जरूरत

.....,

हम, यहाँ -वहाँ,

अनाप -शनाप

बेहूदगी मेँ बोलते हैं,

या कहो...

सहानुभूति की किताब

उस जगह से खोलते है

जहाँ पृष्ठ भर

हासिये क़े सिवा

होता नहीं कुछ.....

@

हमी,जिद्दी, सिऱ- फिरे

इन हाशियों मेँ भी

तलाशते हैं

क़ोई ईश वंदना

किसी बुद्ध की सोच....

जैसे,

न जाने किन पैरों पर

खड़ा रहता है आसमान...?

काश....!

हमें

बता दिया गया होता

आसमान कुछ नहीँ

एक हवा है-

धुआँ है-

शून्य है....

और हवा को

धुँआ को

 शून्य को

क़ोई बैसाखी

चाहिए भी नहीँ होती?

वैसे ही वो

अपने शाश्वत सत्य पर

टिका रहता है

दिन -रात बिना थके हुए.....

काश हमारे शब्द

हवा की तरह

धुँआ की तरह

 शून्य की तरह

होते...

अपने मूल्य पर

टिके रहने को

जरूरत नहीँ होती उनको,

बाजार मेँ बिकने वाली

बैसखियों की.......


@@@#


सुशील यादव

 न्यू आदर्श नगर जोन वन स्ट्रीट 3 दुर्ग छत्तीसगढ़

7000 226712



मेरे कद की तुलना me

 

मेरे कद कि तुलना मे...


सोने जैसा जो खरा लगे है

मन ही मन वो भी डरा लगे है


फीकी मुस्कानो स्वागत करता 

पगला वैसे अब जरा लगे है


हॅसते हम जिन बातो को लेकर 

गमजदा कहीं मसखरा लगे है


खौफनाक आगे मंजर सारे

हद है तुम्हे हरा हरा लगे है


मेरी अगर सलाह को मानो

दुश्मन हथियारो भरा लगे है


जो गर्दन नापे जाता अपनी

कट्टर पंथी माजरा लगे है


हिम्मत ढेर कहीं रखते आये

तेरा होना आसरा लगे है


मेरे कद की तुलना मे सारा 

बौना सा गया गुजरा लगे है



सुशील यादव 

न्यू आदर्श नगर दुर्ग छत्तीसगढ़

मोबाईल 7000226712


मालूम किसे

Thursday, 14 July 2022

 मालूम किसे....

@
माथे  शिकन, या चेहरा चाहे
 तनाव आ जाये
सच को कभी ना बेचिये
लाखों का भाव आ जाये
@
लोगों को तुम हो तौलते
अपनी गरज से आए दिन
मकसद बिना कब पूछते,
जब ना चुनाव आ जाये
@
उनके इशारों में  फिजूल
लाखों लुटा रहे हो क्यूं?
है बात तब,
घर,ईंट, पत्थर से लगाव आ जाये
@
क्या छोड़ क़े कुनबा,
जियोगे जिंदगी, फकीरो की 
अब सोचना, इन फैसलों में
फिर कसाव आ जाये 
@
बारिश भरोसे ये नदी तो,
उफनती रही हरदम 
मालूम किसे  किस  तरफ ढाल 
कहां रिसाव आ जाये
@
सुशील यादव दुर्ग

न्यू आदर्श नगर,जोन 1 स्ट्रीट 3 A
 दुर्ग छत्तीसगढ़
मोबाईल :7000226712

बात तल्ख़ सी
#
मेरी जुबां जब भी फ़िसल जाती है
कुछ बात तल्ख़ सी बस निकल जाती है
#
खामोश हो जीने का मकसद भी क्या
खामोशियाँ गम में बदल जाती है
#
बैसाख या आषाड़ सावन भादो
मजबूरियां मौसम निगल जाती है
#
उसको तराशे  थे हमी जी जान से
हीरे की सूरत अब तो खल जाती है
#
लाखों की  चाहे हो कमाई दौलत
सरकार की नजर आजकल जाती है
##
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर,जोन 1 स्ट्रीट 3 A
दुर्ग छत्तीसगढ़
मोबाईल :7000226712

आजकल जाने क्यों.....
#
एक गलत सोच, आखों की स्याही बदल देता है
समूचे शहर को बारूदी , तबाही बदल देता है
#
फर्क पड़ता नहीं तुम्हारे ऐशो- आराम में तनिक
आंकड़ो की मुनादी ही बस गवाही बदल देता है
#
रिश्तों को निभाना इतना नहीं  आसान आपस 
जुबान की जरा तलखी आवाजाही  बदल देता है
#
मजबूरी ये कि हम बदल नहीं सकते खुद पडोसी
सामने का मुल्क बातों की कड़ाही बदल देता 
#
छीन कर ले जाता था कोई मेरा चैन -करार वही
आजकल जाने क्यों तरीका उगाही बदल देता है
#

उम्र क़े इस पड़ाव में.....
#
दर्द जहाँ मैं टांगा करता, टूटी आज वो खूंटी लगती
सारे संबल सभी आसरे,बिना असर की बूटी लगती
##

लेकर चलना उसी गली में,यादों का भरता हो मेला
बचपन खेल घरोंदे वाले,नाव डूबता रहूँ अकेला
0
अब उम्र क़े इस पड़ाव में, कितनी बातें छूटी  लगती
##
अरमानों जब पँख नहीं थे, आकाश लगा करता छोटा
उड़ने की जब ताकत आई,व्यवधानो ने अक्सर टोका
0
शेष नहीं कुछ कहने जैसा,गुम नगीना  अंगूठी लगती
##
इन बाजुओं का दम है,पहले जैसा आज भी क़ायम
आज भी  मिलने की चाहत,रत्ती भर उत्साह नहीं कम
0
चाहत की अब दुनियां तुझ बिन खाली - खाली झूठी लगती
##
उमंग उजालों की सजती,सदा रहे पहचान दिवाली
मुस्कान बांटते जाना यूँ,तमाशबीन  बजा दे ताली
0
मंहगाई की हाथ थमी हो ,विपदा की लो सूटी लगती
##
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर,जोन 1 स्ट्रीट 3 A
दुर्ग छत्तीसगढ

तमाचा वक़्त का

 

1222 1222 1222
तमाचा वक़्त का...
#
किताबों में  कहां अब  फूल मिलता है
बचे लोगों  ले दे क़े उसूल मिलता है
#
सभी पाशे चले शकुनी की अब चालें
जिसे मौका सही अनुकूल मिलता है
#
विरासत को बचाने की कवायद हो
वगरना मशवरा उल जुलुल मिलता है
#
नहीँ है कायदे से कोइ रखवाला
सियासत सादगी अब धूल मिलता है
#
क़ोई कांटे बिछा क़े जब चला जाता
तमाचा वक़्त का माकूल मिलता है
#
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर जोन वन स्ट्रीट 3 दुर्ग छत्तीसगढ़
7000 226712

 

कातिलों क़े शहर में.....
#
फूल की खुशबू  वफा में चमक क़े लिए
हो नहीँ बस जंग आपसी नमक क़े लिए
#
वक़्त ने देखा जहर नफ़रत का घुलता
बोलते क्या- क्या रहे तुम सनक क़े लिए
#
आज भी तेरी कहीं से याद आती
छोड़ती है  रात  लम्बी कसक क़े लिए
#
एक हम  जो दे रहे हैँ आज  दस्तक
यूँ सभी लापता हैं शफक क़े लिए
#
कहने को  बाक़ी बचा  क्या पास मेरे
कातिलों क़े इस शहर में रमक़ क़े लिए
#
रहगुजर में बैठ कर यूँ देखता रहा
आस तो मिटती कहां इक झलक क़े लिए
#
मयकदे में जो नसीहत पी गया हो
खैर उसकी क्या मनाएं शतक क़े लिए
#
शफक = क्षितिज की लाली
रमक़ = रही सही जान, थोड़ी सी जिंदगी
#

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर,जोन 1 स्ट्रीट 3 A
दुर्ग छत्तीसगढ़
मोबाईल :7000226712

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Mausam

 

मौसम....
#
मेरे चाहने से कब बदला है मौसम
तेरे कहने पे जो चलता है मौसम
#
घुटने - घुटने पानी  जब नावें चलती
ठहरा - ठहरा  तब तो लगता है मौसम
#
नदिया बीच  भंवर  मेँ फँस कर ये जाना
खुद भी कितना रह लेता तन्हा मौसम
#
एक दूजे की करते पूछ परख तब तक
तिरपाल तले हो कुनबा सूखा मौसम
#
सालों बाद भटकते आया है जाने
कुछ तिलस्मी, फिल्मी कुछ गोया मौसम
#
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर,जोन 1 स्ट्रीट 3 A
दुर्ग छत्तीसगढ़
मोबाईल :7000226712